भूमिका
मारवाड़ अथवा जोधपुर राज्य स्वतन्त्रता पूर्व राजस्थान के 19 देशी राज्यों तथा 02 स्वायत्तशासी (लावा तथा कुशलगढ़) ठिकानों में क्षेत्रफल की दृष्टि से सबसे बड़ा राज्य तो था ही समस्त भारत के सैंकड़ों राज्यों में दक्षिण हैदराबाद तथा जम्मू कश्मीर के पश्चात् देश का तीसरा सबसे बड़ा राज्य था। जोधपुर राज्य केवल क्षेत्रफल की दृष्टि से ही बड़ा नहीं था बल्कि इसके यशस्वी नागरिकों ने अपने गर्व योग्य कृतित्व एवं अनुकरणीय कार्यों के कारण इसे राजस्थान का पर्याय ही बना दिया। जोधपुर राज्य की ख्याति का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि आज तक सुदूर पूर्व तथा दक्षिण के भारतीय राजस्थान के किसी भी कोने के व्यक्ति को मारवाड़ी कह कर सम्बोधित करते हैं। 'मारवाड़ के रत्न' के लेखक श्री शमीम मोहम्मद खान ने अत्यन्त ही गहरी सूझ और प्रयत्नपूर्वक पश्चिमी राजस्थान के मारवाड़-जोधपुर के रत्नों में से कुछ को छांटकर अपनी पुस्तक के कलेवर में समाहित किया है। यह चयन आवश्यक था क्योंकि आरंभ से ही मारवाड़ के विभिन्न क्षेत्रों में उल्लेखनीय कार्य करने वालों को एक पुस्तक में सम्माहित करना असंभव था। मांडू ऋषि द्वारा मंडोर की स्थापना तथा 12 मई 1459 को राव जोधा द्वारा जोधपुर नगर और दुर्ग की स्थापना के पश्चात् असंख्य योग्यजनों ने मारवाड़ राज्य के सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, आध्यात्मिक, शौर्य तथा खेलकूद के क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान से मारवाड़ के गौरव में अभिवृद्धि की है। राव जोधा के पश्चात्, राव मालदेव, सूरसिंह, गजसिंह (प्रथम), जसवंतसिंह (प्रथम) ने सुदूर दक्षिण तथा काबुल कंधार तक मारवाड़ की धाक जमाई तो महाराजा मानसिंह ने कला, साहित्य और संगीत के क्षेत्र में मारवाड़ की महिमा में श्रीवृद्धि की। वर्तमान पूर्व नरेश गजसिंह (द्वितीय) भी मारवाड़ की सर्वांगीण विकास के लिए सदैव तत्पर रहते हैं। बल्लू, जोरजी चंपावत तथा अमरसिंह राठौड़ ने इस वीर भूमि को आन-बान के नये आयाम प्रदान किये हैं। एक ओर मीरा ने भक्ति-सरिता बहाई तो दूसरी ओर लोक देवताओं ने नवीन आध्यात्मिक ऊँचाइयाँ प्रदान की। यहाँ आसोप के ठाकुर कुशालसिंह जैसे अंग्रेजों के घोर विरोधी हुए तो अनेक स्वतन्त्रता सेनानियों ने अंग्रेजों के विरुद्ध आवाज उठाई।
लेखक परिचय
शमीम मोहम्मद खान जन्म तिथि : 25 अक्टूबर 1952, जोधपुर पिता : श्री ऐश मोहम्मद खान माता : जमीला बेगम शिक्षा : बी.एस-सी. एम.एस-सी. (वनस्पति शास्त्र) बी.एड. जोधपुर विश्वविद्यालय से एवं एम.एड. हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय, शिमला से किया। व्यवसाय : शिक्षा विभाग-राजस्थान में 1976 से 2012 तक वरिष्ठ-अध्यापक (विज्ञान), व्याख्याता (जीव-विज्ञान) प्रधानाध्यापक (माध्यमिक), उप-प्रधानाचार्य, प्रधानाचार्य, अति. जिला-शिक्षा अधिकारी (विधि) (प्रारंभिक एवं माध्यमिक शिक्षा) एवं जिला-शिक्षा अधिकारी (माध्यमिक) पदों पर जालौर, अलवर, पाली, बाड़मेर और जोधपुर जिले में सेवाएँ दीं। सेवानिवृति उपरान्त वर्ष 2015 से 2017 तक जिला अल्पसंख्यक कल्याण अधिकारी, जोधपुर के पद पर संविदा सेवा की। प्रकाशन : स्कूली शिक्षा के दौरान वर्ष 1966 में पहली बार भारत-पाक युद्ध 1965 की पृष्ठभूमि पर आधारित कहानी- "कश्मीर के आँचल में" नई दिल्ली के समाचार-पत्र साक्षी में प्रकाशित हुई एवं यह कहानी राष्ट्रीय स्तर पर द्वितीय स्थान पर पुरस्कृत हुई। इसके अतिरिक्त कुछ कहानियाँ एवं वैज्ञानिक-वार्ताएँ आकाशवाणी जोधपुर एवं जयपुर से भी प्रसारित हुईं। शिक्षा विभाग राजस्थान सरकार की शैक्षिक-पत्रिका "शिविरा" में भी कुछ शैक्षिक लेख प्रकाशित हुए। सम्मान : लायन्स क्लब, मरू पर्यावरण संरक्षण संस्था, माध्यमिक शिक्षा बोर्ड-राजस्थान एवं राष्ट्रीय-युवा-योजना एवं राजस्थान-शिक्षक संघों द्वारा शिक्षक दिवस पर सम्मानित ।
पुस्तक परिचय
मारवाड़ अथवा जोधपुर राज्य स्वतन्त्रता पूर्व राजस्थान के 19 देशी राज्यों तथा 02 स्वायत्तशासी (लावा तथा कुशलगढ़) ठिकानों में क्षेत्रफल की दृष्टि से सबसे बड़ा राज्य तो था ही समस्त भारत के सैंकड़ों राज्यों में दक्षिण हैदराबाद तथा जम्मू कश्मीर के पश्चात् देश का तीसरा सबसे बड़ा राज्य था। जोधपुर राज्य केवल क्षेत्रफल की दृष्टि से ही बड़ा नहीं था बल्कि इसके यशस्वी नागरिकों ने अपने गर्व योग्य कृतित्व एवं अनुकरणीय कार्यों के कारण इसे राजस्थान का पर्याय ही बना दिया। जोधपुर राज्य की ख्याति का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि आज तक सुदूर पूर्व तथा दक्षिण के भारतीय राजस्थान के किसी भी कोने के व्यक्ति को मारवाड़ी कह कर सम्बोधित करते हैं। 'मारवाड़ के रत्न' के लेखक श्री शमीम मोहम्मद खान ने अत्यन्त ही गहरी सूझ और प्रयत्नपूर्वक पश्चिमी राजस्थान के मारवाड़-जोधपुर के रत्नों में से कुछ को छांटकर अपनी पुस्तक के कलेवर में समाहित किया है। यह चयन आवश्यक था क्योंकि आरंभसे ही मारवाड़ के विभिन्न क्षेत्रों में उल्लेखनीय कार्य करने वालों को एक पुस्तक में सम्माहित करना असंभव था। मांडू ऋषि द्वारा मंडोर की स्थापना तथा 12 मई 1459 को राव जोधा द्वारा जोधपुर नगर और दुर्ग की स्थापना के पश्चात् असंख्य योग्यजनों ने मारवाड़ राज्य के सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, आध्यात्मिक, शौर्य तथा खेलकूद के क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान से मारवाड़ के गौरव में अभिवृद्धि की है।
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