लेखक परिचय
डॉ० राघवेन्द्र नारायण सिंह उत्तर आधुनिक साहित्यकारों में अपनी विशिष्ट पहचान स्थापित कर चुके हैं। एक जनवरी, सन् 1960 में वाराणसी के बैजलपट्टी, हरहुआ वाराणसी में पिता चन्द्रमा सिंह और माता श्रीमती केवलपत्ती देवी के घर में प्रथम सन्तान के रूप में आपका जन्म हुआ। आपने अंग्रेजी के महान कवि डब्ल्यू०एच०ऑडेन पर अपना शोधकार्य काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से सन् 1985 में सम्पन्न किया। आपने अंग्रेजी के प्रोफेसर के रूप में अपनी सेवायें उत्तर प्रदेश के विभिन्न महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में देते हुए जून 2021 में महात्मा गाँधी काशी विद्यापीठ वाराणसी से सम्बद्ध श्री एस०बी० पी०जी० कॉलेज से अंग्रेजी विभागाध्यक्ष के पद से सेवानिवृत्ति प्राप्त की। आपकी आज की अवधि तक तिरसठ पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं जिनमें बारह उपन्यास, सात कहानी संग्रह, बीस कविता संग्रह, चार निबन्ध संग्रह, तीन अनूदित पुस्तकें तथा अंग्रेजी में भी उपन्यास, कविता तथा निबन्ध विधा में रचनायें सम्मिलित हैं। दहशत, जुर्म, नेपथ्य के अतिथि, खोया हुआ आकाश, अंधेरा चुभता है और टेढ़ा चाँद आपके प्रमुख प्रकाशित उपन्यास हैं। मिट्टी का मकान, प्लीज बिहेव योरसेल्फ, एक दार्शनिक की चूक, खामोश, नीली झील, वह लड़की कहाँ गई और उपन्यास की नायिका आपके प्रमुख कहानी संग्रह हैं। डॉ० राघवेन्द्र नारायण सिंह अनेक प्रमुख सामाजिक साहित्यिक और शैक्षणिक संस्थानों द्वारा विभूषित किये जा चुके हैं। आप वर्तमान समय में ए-55, 212, गौतम गार्डेन कालोनी, शिवपुर बाईपास, वाराणसी, उत्तर प्रदेश में सपरिवार रहते हुए अपनी काव्य साधना में निरन्तर प्रवृत्त हैं। डॉ० राघवेन्द्र नारायण सिंह की कृतियाँ निबन्ध संग्रह: अस्तित्व के शाश्वत आयाम परमेश्वर से साक्षात्कार मेरी सोच: मेरी दृष्टि सृजन के वैचारिक आधार जिन्दगी के दस्तावेज मार्क्स का अजायबघर मुहावरे टूट रहे हैं कहानी संग्रह: प्लीज बिहेव योरसेल्फ मिट्टी का मकान एक दार्शनिक की चूक खामोश नीली झील वह लड़की कहाँ गई? उपन्यास की नायिका उपन्यास : दहशत • हस्तक्षेप विक्षोभ अँधेरा चुभता है रास्ते कभी खत्म नहीं होते नेपथ्य के अतिथि जुर्म परिन्दे खोया हुआ आकाश वसन्त की प्रतीक्षा में टेढ़ा चाँद कैंचीधाम के सहयात्री आलोचना : डॉ० राघवेन्द्र नारायण सिंह : सर्जना और आलोचना पुस्तकें बोलती हैं किस देवता की उपासना करें हम ईश्वर उदास है कविता संग्रह : परियों के उस मधुर द्वीप पर पागलों की भीड़ में आकाश को अधिकार जब हम नहीं होंगे है आओ कहीं और चलते हैं फिर उगेंगे पंख मेरे अजनबी इस शहर में जहाँ पर झील बहती है शहर से दूर थी वह झील करो मत झील तुम कलुषित झील के उस पार क्या है कभी तुम झील से मिल लो कहो मत झील से कुछ भी समन्दर बन गई वह झील उसे बस झील मत समझो तुम्हारे पक्ष में नीला आकाश अपना है अँधेरों की खिलाफत मे
पुस्तक परिचय
सामयिक वरिष्ठ साहित्य डॉ० राघवेन्द्र नारायण सिंह ने कविता, उपन्यास, निबन्ध, अनुवाद और समीक्षा के माध्यम से हिन्दी-साहित्य में अपना विशिष्ट योगदान दिया है। तिरसठ से अधिक पुस्तकों के लेखक डॉ० राघवेन्द्र नारायण सिंह द्वारा सृजित 'मुहावरे टूट रहे हैं' उनके नवीनतम निबन्धों का संग्रह है। साहित्य में निबन्ध-विधा लेखकों को स्वतन्त्र रूप में अपने विचारों को अभिव्यक्ति देने का सशक्त माध्यम है। लेखक की स्वतन्त्रता इस विधा में साहित्य की अन्य समस्त विधाओं में इस अर्थ में असीमित रहती है कि वह किसी भी विषय पर अपनी लेखनी चलाने के लिए अधिकृत रहता है। डॉ० राघवेन्द्र नारायण सिंह के ही शब्दों में 'निबन्ध का कोई विशेष आकार-प्रकार नहीं रहता है। यह कुछ शब्दों से लेकर अनेक पृष्ठं तक का अपने विस्तार में हो सकता है। मेरे निबन्ध अधिकांशतः उन मुद्दों पर लिखे गये हैं जो समाज से सीधे तौर पर जुड़े हुए हैं। "मुहावरे टूट रहे हैं' में संकलित सभी निबन्ध जीवन के विविध पक्षों पर केन्द्रित हैं। जीवन के प्रति सही दृष्टिकोण उपलब्ध कराते हुए ये निबन्ध जीवन की तथ्यपरक विवेचना करते हैं। इनमें जीवन के वास्तविक सौन्दर्य और उसके अर्थ को रेखांकित करते हुए जीवन के उलझे हुए रेशों को सुलझाने का प्रयास किया गया है। इस निबन्ध संग्रह में चिन्तन और मनन का अटूट सिलसिला निबन्ध दर निबन्ध देखने को मिलता है। डॉ० राघवेन्द्र सिंह के निबन्धों का अपना विशिष्ट शिल्प है। विभिन्न सामाजिक, राजनीतिक, साहित्यिक, आर्थिक और मानवीय मुद्दों पर इन निबन्धों में लेखक ने अपना दृष्टिकोण संवाद की शैली में रोचक ढंग से प्रस्तुत किया है। डॉ० राघवेन्द्र नारायण सिंह के ये निबन्ध अपनी उत्कृष्टता और श्रेणी के स्वतः निर्धारक हैं।
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