दिव्य व्य सत्संग के आह्लादकारी क्षणों में एक प्रबुद्ध योगी से परावाणी का विस्मयकारी *उद्घोष सुना था, 'सूक्ष्म जगत् से चयनित साधु-संतों, महात्माओं को पश्चिम में देह धारण के लिए निर्देशित किया गया है।' डॉ. संत धर्मानंद और उनकी इस पुस्तक को उसी परिप्रेक्ष्य में देखकर एक रोमांच सा होता है।
सनातन धर्म ही वह आधार है, जिस पर अनेक ब्रह्मांड अवस्थित हैं। उसके विश्वव्यापी प्रचार-प्रसार के लिए मुख्यतः हिमालयवासी ऋषि-महर्षियों को अवतरण निर्देश जहाँ एक ओर मानवमात्र के लिए अत्यंत कल्याणकारी है, वहीं उस भविष्यवाणी 'कालांतर में भारत ही विश्व गुरु बनेगा' का अद्भुत पुष्टि संकेत है।
संत धर्मानंदजी की मूल अंग्रेजी कृति का यह हिंदी अनुवाद बहु-प्रतीक्षित था। अपनी बहुमूल्य स्मृतियों का खजाना लुटाने के लिए हम संतजी के सदैव ऋणी रहेंगे, विशेषकर युवा पीढ़ी की जीवन-यात्रा एक नया दिग्दर्शन प्राप्त करेगी, ऐसा पूर्ण विश्वास है।
अनेक आध्यात्मिक, आधि-भौतिक, आधिदैविक और पारलौकिक रहस्यों से पहली बार परदा उठाती यह पुस्तक एक ऐसा संकलन है, जिसे आप एक साँस में पढ़ जाएँगे।
हिमालयवासी योगियों पर आख्यान लिखना सरल नहीं है, क्योंकि इनमें से अधिकांश पूर्णतः गोपनीय रहकर ही लोक-कल्याण में रत रहते हैं। इसके ऊपर, फिर उनकी कार्यशैली का विवेचन तो अत्यंत ही रहस्यात्मक और दुर्लभ है। ऐसे योगियों के स्वयं के आशीर्वाद के बिना यह पुस्तक लिखना संभव नहीं था। हम उनको कृतज्ञतापूर्वक नमन करते हैं।
"अलख पुरुष की आरसी, साधु का ही देह।
लखा जो चाहे अलख को, इन्हीं में तू लख लेह ।।"
अक्षर अविनाशी पूर्ण ब्रह्म दाता का निराकार और निर्विकार स्वरूप अत्यंत दुरूह, अगम्य तथा खारा है। आम मनुष्य उसको सहन ही नहीं कर पाता और न ही कोटि सूर्य के समकक्ष उनके तेज को ही। साधु-संत उनके जागतिक साकार स्वरूप हैं। इन स्वरूपों में चंद्रमा की शीतलता भी होती है। इसीलिए ये गुरु का दायित्व निभाते आए हैं। ऐसे ही गुरुओं की अत्यंत विस्मयकारी गाथा इस पुस्तक में आपको पढ़ने को मिलेगी।
भारतवर्ष में आम आदमी यह जानता है कि आत्मा अजर, अमर और अविनाशी है। अध्यात्म में मामूली सी रुचि रखनेवाला भी यह भरोसा रखता है कि गुरु की परिधि में आने के बाद उसकी आवागमन से मुक्ति निश्चित है (एक नजर, एक दृष्टि, दो जन्म, पाँच जन्म)।
गुरु संचालित पुनर्जन्म, गुरु प्रदत्त गर्भवास के प्रसंग इस पुस्तक में पढ़कर आप चकित रह जाते हैं, अभिभूत हो जाते हैं। साथ ही गद्गद और मुग्ध भी। एक ही कालखंड में होने वाले पुनर्जन्म पर ऐसा प्रामाणिक और ऐतिहासिक दस्तावेज पूर्व में न देखा गया, न सुना गया।
एक संत का बोलना कि "मैं तुम्हारे परिवार में लौट रहा हूँ," उनके पुनर्जन्म की उद्घोषणा का कितना सुंदर संकेत है। ऐसे बहुत से संकेत इस पुस्तक में मिलते हैं।
किसी देहदारी का सूक्ष्म शरीर से बाहर आ जाना तो देवभूमि भारत में आम है, लेकिन अपने पूर्वजन्म के परिजनों की पुकार पर सहायता के लिए हजारों मील दूर अपने सूक्ष्म शरीर से पहुँचकर फिर वापस लौट वर्तमान में प्रविष्ट होने का अत्यंत ही मार्मिक, संवेदनशील, लेकिन सनसनीखेज प्रसंग इस पुस्तक में पढ़कर आप चौंक जाएँगे।
यही है योगियों का 'इनर-नेट', और आज का नहीं, सदियों पुराना। जबकि आज का अत्याधुनिक तकनीक आधारित इंटरनेट स्काइप दृश्य और श्रव्य तक ही सीमित है। 'स्काइप' शब्द वास्तव में हिमालयी योगियों की पुरातन चमत्कारी 'स्काई-पीपिंग', जिसमें वे असीम आकाश को लाँघते रहे हैं, से बना है। इसी संदर्भ में हिमालयवासी योगियों का हृदय एक टावर के समान है, जो संत धर्मानंदजी के अंतरतम में स्थित 'सेलफोन' में तरंगें भेजता रहता है और मानवमात्र को उनकी करुणा का स्पंदन वितरित करता रहता है।
"सब घट मेरा साइयाँ, सुनो सेज न कोय।
बलिहारी वा घट्ट की, जो घट परगट होय ।।
मनुष्य और ईश्वर के बीच में केवल अहंकार ही बाधा है। यों तो ईश्वर कण-कण में व्याप्त है, लेकिन किसी-किसी हृदय में वे प्रखर हो उठते हैं। कभी-कभी आध्यात्मिक स्थितप्रज्ञ संन्यासी भी सूक्ष्म- अति सूक्ष्म- अहं से ग्रसित हो जाते हैं। प्रबुद्ध गुरु से कुछ छिपता नहीं और वह भक्त के हृदय से अपना कार्य कराते रहने के लिए इस कंटक-क्लेश को तुरंत मिटा देते हैं।
हृदय में स्थित गुरु तत्त्व ने संकेत किया कि परसादी भोजन में शोरबा है। संतजी ने यह बात सबको बताते हुए कहा कि अब इसे सबके लिए शुद्ध करना पड़ेगा। दूर बफेलो में गुरु के पास लौटते ही फटकार लगी कि संत, यह तुम्हारा सूक्ष्म अहं था। बिना बताए उपचार करना चाहिए था।
आंतरिक जागृति का मंत्रमुग्ध करने वाला यह व्यावहारिक ज्ञान संतजी ने खोलकर ही रख दिया, जो अत्यंत ही प्रेरणादायी है। ऐसा पूर्व में कम ही पढ़ने को मिला है। हर आध्यात्मिक पिपासु के लिए यह एक संजीवनी का काम करेगा। प्रस्तुत पुस्तक के 'अंतर्यामी योगी' अध्याय में इसे पढ़कर आपकी आंतरिक उद्देश्यों के प्रति सजगता बढ़ेगी।
तत्त्वमसि (तत् त्वम् असि) वेदों के इस सनातन महावाक्य को संत धर्मानंदजी ने 'बूँद ही सागर है' के आभूषण से परिभाषित किया है और इस गूढ़ विषय का आशा नयाल ने अपने सरल शब्दों में विषयवस्तु पर दृढ़ रहकर जैसे गागर में सागर ही भर दिया है। मुमुक्षु जीव के लिए यह आश्वासन है और परमानंद का स्रोत भी।
यों तो आध्यात्मिक भारत में 'ध्यान' पर अनेक टिप्पणियाँ लिखी गई हैं। लेकिन हिमालयवासी प्रबुद्ध योगी से उदग्रहित विषयवस्तु को संतजी ने 'मछली पकड़ना और ध्यान' में अनोखे अंदाज में प्रस्तुत किया है। किसी भी अध्यात्म-प्रेमी को इसे पढ़कर उद्दीपन जरूर होगा। यह पाठ योगियों की सहज समाधि अवस्था का द्योतक है। अवगुणकारी मछली पकड़ने के कृत्य को भी ईश्वरीय ध्यान से जोड़ दिया गया है।
हिमालय पर्वतश्रृंखला उस कहे जानेवाले सूक्ष्म जगत् का भी पर्यायवाची है। धर्म संस्थापनार्थ इसकी गुफाओं और कंदराओं में ऐसे निर्णय लिये जाते हैं, जो चयनित व्यक्ति के हृदय की स्फूर्णा बनने के लिए तरंगों के रूप में भेजे जाते हैं। योगियों का यह कार्य पूर्णतः निस्स्वार्थ प्रेम से भरा होता है और वास्तव में वे तो सिर्फ ईश्वरीय संरचना की एक कड़ी मात्र होते हैं। ऐसे में अप्रत्याशित चमत्कारी घटनाएँ विश्व के किसी हिस्से में भी घट जाती हैं। ऐसी ही एक तरंग हिमालय से उठी और प्रसिद्ध निर्माता-निर्देशक रामानंद सागर के हृदय की स्फूर्णा बन गई। उन्होंने टी.वी. पर प्रसारण के लिए पवित्र ग्रंथों पर आधारित आध्यात्मिक धारावाहिक बनाने का निश्चय कर लिया। लोगों ने अनेक बाधाएँ पहुँचाई और तब एक दिन उनके समक्ष हिमालयी योगी प्रकट होकर बोले, 'घबराओ नहीं, तुम्हें चुना गया है। सब ठीक हो जाएगा।
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