पुस्तक परिचय
नारी का सम्मान, देश का अभिमान" अमृता श्रीवास्तव का दूसरा उपन्यास है। लेखिका ने इस उपन्यास में नारी के सम्मान पर विशेष बल दिया है। आज नारी मात्र भोग्या ही समझी जाती है। पुराणों में वर्णित "यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता" को भुलाकर उसका अपमान किया जाता है। प्रस्तुत उपन्यास का नायक कबीर प्रारम्भ से अन्त तक नारी सम्मान की लड़ाई लड़ता रहता है परन्तु अपने ही घर में अपने आपको न्याय दिलाने में असमर्थ रहता है। मैं अमृता श्रीवास्तव की साहित्यिक अभिरुचि से विशेष प्रभावित रहा हूँ। विशेषकर उपन्यासों के प्रति उनका लगाव प्रशंसा के योग्य है। आधुनिक समाज चाहे कितनी ही प्रगति क्यों न कर ले आज भी नारी को स्वयं का वर चुनने की इजाजत नहीं देता। प्रस्तुत उपन्यास में अभिलाषा ऐसी ही पात्रा है। अभिलाषा की डायरी से यह कटु सत्य उभरकर सामने आता है, "उन्हीं दिनों माँ ने मेरी शादी एक अधिक आयु वाले चरित्रहीन व्यक्ति के साथ तय कर दी। ये सह पाना मेरे लिए बहुत कठिन था। जिसे मैं देखना भी नहीं चाहती थी उस गन्दे व्यक्ति के साथ मेरी जिन्दगी को बाँधने के विषय में सोच रही थी।" इतना ही नहीं सामाजिक मूल्यों का पूरी तरह से हास हो चुका है। जिस व्यक्ति के सम्बन्ध मों से हो माँ उसी को बेटी के पति-रूप में बनाना चाहे तो बात असहनीय हो जाती है। ऐसे समाज का पतन निश्चित ही है।
लेखक-परिचय
अमृता श्रीवास्तव जन्मतिथि : 20 जुलाई, 1990 माता का नाम : श्रीमती ममता श्रीवास्तव पिता का नाम : श्री सन्तोष श्रीवास्तव जन्म स्थान : ग्राम-सेमरी, महादेव, जिला-सिद्धार्थ नगर, उत्तर प्रदेश शिक्षा : बी. ए. लेखन विधाएँ : कविता, लघुकथा, उपन्यास, कहानी । प्रकाशन : प्रेम एक परीक्षा (उपन्यास) सम्प्रति : अध्यापन
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