मिथिला के प्राचीन संस्कृत-आचार्यों की यह एक प्रमुख विशेषता रही है कि वे संस्कृत के साथ-साथ अपनी, मातृभाषा 'मैथिली' के साहित्य-भण्डार की भी श्रीवृद्धि करते रहे हैं। उमापति उपाध्याय मिथिला के ऐसे ही प्राचीन संस्कृत-आचार्यों में अग्रणी थे। उनकी एकमात्र उपलब्ध कृति 'नव पारिजात-मंगल', जो साहित्य-जगत् में 'पारिजातहरण' के नाम से प्रसिद्ध है, उनके संस्कृत-मैथिली-प्रेम का मृर्तिमान् प्रतीक है।
उमापति के 'नव पारिजात-मंगल' को जयदेवकृत 'गीत-गोविन्द' की परम्परा में, 'संगीत-नाटक' ही कहना कई अंशों में अधिक उपयुक्त होगा। यदि थोड़ी देर के लिए भाषा का अन्तर भुला दिया जाय, तो उक्त दोनों कृतियों के कलेवर में भी कोई अन्तर नहीं मिलेगा। जहाँ 'गीत गोविन्द' के गीत संस्कृत में लिखित हैं, वहाँ 'नव पारिजात मंगल' के गीत मैथिली में रचित हैं। दोनों कृतियों में आये गीतों की संख्या भी लगभग एक ही है। 'गीत गोविन्द' में कुल चौबीस और 'नव पारिजात-मंगल' में कुल इक्कीस-गीत आये हैं। 'गीत-गोविन्द' में मुख्य पात्रों की संख्या तीन और 'नव पारिजात-मंगल' में पाँच है। दोनों कृतियों के कथानक में भी बहुत कुछ साम्य स्वीकार करना पड़ता है। यों, तुलनात्मक दृष्टि से, जयदेव के 'गीतगोविन्द' में संगीत-तत्त्व का आधिक्य है और उमापति के 'नव पारिजात-मंगल' में नाटकीय तत्व का ।
आचार्य पं० विश्वनाथप्रसाद मिश्र ने महाकवि विद्यापति को हिन्दी का 'आदिकवि' कहा है। उमापति के ललित-पद विद्यापति के कोमलकान्त-पदों के समकक्ष ही हैं। अतः विद्यापति के पूर्ववर्ती होने के कारण, मेरी समझ में तो यह श्रेय उन्हें ही मिलना चाहिए ।
इधर, पं० बलदेव उपाध्याय ने उमापति को हिन्दी का प्रथम वैष्णव-पदकर्त्ता होने का गौरव दिया है। मिथिला के लोकजीवन में प्रचलित 'कीर्त्तनियाँ-नाटकों' के जनक तो वे थे ही। ऐसे महत्वपूर्ण साहित्य-स्रष्टा एवं उनके साहित्य के सर्वांगीण अध्ययन की योजना बहुत पहले ही मेरे सामने आई थी, जो कार्यान्वित होकर ग्रंथ-रूप में आज आपके हाथों में है।
सन् १९५५ ई० में, जब बिहार-राष्ट्रभाषा-परिषद् में, बिहार-सरकार के शिक्षा-विभाग की ओर से, महाकवि विद्यापति सम्बन्धी साहित्यानुसंधान की दृष्टि से, स्व० डॉ० अमरनाथ झा की अध्यक्षता में 'विद्यापति अनुसंधान विभाग' की स्थापना हुई, तब पहले-पहल मैंने ही उस विभाग का कार्यभार सँभाला था। फिर, उस विभाग की ओर से मुझे कई बार विद्यापति-साहित्यानुसंधान के सिलसिले में पश्चिम बंगाल और बिहार के सम्बद्ध स्थानों की यात्राएँ करनी पड़ीं। ये यात्राएँ उमापति सम्बन्धी मेरे प्रस्तुत अध्ययन में बहुत ही लाभदायक सिद्ध हुईं। इन यात्राओं में मुझे उमापति और उनके साहित्य से सम्बद्ध प्रभूत दुर्लभ सामग्री प्राप्त हुई, जिसका उपयोग मैंने प्रस्तुत ग्रंथ में किया है।
उमापतिविषयक प्रस्तुत अध्ययन का समापन आज से बहुत पहले ही हो जाना चाहिए था। किन्तु, कतिपय अनिवार्य कारणवश ऐसा न हो सका। इसके समापन में जो विलम्ब हुआ, वह एक प्रकार से, इसके लिये लाभदायक ही सिद्ध हुआ। इस बीच, प्रस्तुत ग्रंथ में सम्पादित 'नव पारिजात-मंगल' के संस्कृत-प्राकृत-अंश को 'पटना-विश्वविद्यालय' के भूतपूर्व संस्कृत विभागाध्यक्ष स्व० डॉ० तारापद चौधरी और गवर्मेंट संस्कृत-कॉलेज, पटना के तत्कालीन प्राचार्य पं० जटाशंकर झा पूर्ण मनोयोगपूर्वक देख गये। उन्होंने कई स्थलों पर पाठ सम्बन्धी बहुत ही आवश्यक सुझाव दिये। मैथिली गीतों के पाठ और उसकी हिन्दी टीका को पं० जटाशंकर झा. के अतिरिक्त 'पटना-विश्वविद्यालय' के तत्कालीन मैथिली-विभागाध्यक्ष डॉ० सुधाकर झा शास्त्री तथा प्रसिद्ध मैथिली-विद्वान बाबू लक्ष्मीपति सिंह ने भी देखा। कुछ आवश्यक सामग्री प्राप्त करने में 'बिहार रिसर्च सोसाइटी' के ज्योतिषाचार्य पं० बलदेव मिश्र भी सहायक सिद्ध हुए की PF के हाँ, 'पटना-विश्वविद्यालय' के भूतपूर्व हिन्दी विभागाध्यक्ष एवं हिन्दी-जगत के मान्य विद्वान स्व० आचार्य नलिनविलोचन शर्मा ने भी अपने महाप्रयाण के पूर्व, पूरे ग्रंथ की पाण्डुलिपि का आद्योपान्त अवलोकन कर अपने बहुमूल्य सुझाव दिये। और, इसके 'परिशिष्ट-अंश में आई राग-रागिनियों की 'परिचय-तालिका' प्रस्तुत करने में, वयोवृद्ध संगीत-साधक स्व० श्रीअलखनारायण प्रसादजी ने भी अपनी बहुमूल्य सम्मतियों से मुझे उपकृत किया। और किन किए
बिहार-सरकार के तत्कालीन शिक्षा-मंत्री माननीय कुमार श्रीगंगानन्द सिंह द्वारा उन्हीं दिनों एक 'सम्पादक मण्डल' का निर्माण हुआ था, जो बिहार-राष्ट्रभाषा-परिषद् के तत्वावधान में, कई खण्डों में प्रकाशित होनेवाली 'विद्यापति-पदावली' का सम्पादन आज भी कर रहा है। शिक्षा मंत्री के आदेशानुसार ही, उसी समय परिषद् के 'विद्यापति-अनुसंधान विभाग' के क्षेत्रीय कार्यकर्ता तथा विद्यापति-साहित्य के अनुरागी विद्वान् पं० शशिनाथ झा और मैं उक्त 'सम्पादक-मण्डल' के सहायतार्थ सहायक-सम्पादक के रूप में नियुक्त हुआ था। बिहार-राष्ट्रभाषा-परिषद् से प्रकाशित 'विद्यापति-पदावली' (प्रथम-खण्ड) के सम्पादनार्थ उक्त मण्डल की बैठकें उन दिनों सप्ताह में चार दिन हुआ करती थीं। मैंने अपने प्रस्तुत अध्ययन के सिलसिले में, अन्तिम बैठक तक उक्त विद्वतमंडल के सम्पर्क का पर्याप्त लाभ उठाया। ऊपर जिन विद्वानों का मैंने उल्लेख किया है, वे इसी मण्डल के सदस्य थे।
विश्वविख्यात भाषाविद्, पद्मविभूषण डॉ० सुनीतिकुमार चाटुर्ज्या और कलकत्ता-विश्वविद्यालय के 'तुलनात्मक भाषा-विज्ञान विभाग' के विभागाध्यक्ष डॉ० सुकुमार सेन ने भी मेरे इस अध्ययन का अद्योपान्त अवलोकन कर और यत्रतत्र आवश्यक परामर्श देकर इसके महत्त्व की निश्चय ही अभिवृद्धि को है।
'पटना-विश्वविद्यालय' के पूर्व हिन्दी विभागाध्यान और अनेक भारतीय और भारतीयेतर-भाषाओं एवं उनके साहित्य के प्रकाण्ड पण्डित स्व० आचार्य पं० देवेन्द्रनाथ शर्मा और 'बिहार-राष्ट्रभाषा परिषद्' के विद्वान् निदेशक तथा संत-साहित्य के मर्मज्ञ स्व० डॉ० भुवनेश्वरनाथ मिश्र 'माधव' के आर्शीवचन और प्रोत्साहन के स्नेह-सिक्त शब्द भी मेरे इस प्रस्तुत अध्ययन की सफलता के मूल में रहे हैं।
मैं आज उन सभी गुरुजनों एवं साहित्य-महारथियों का, श्रद्धानत-भाव से स्मरण करते हुए, उनके प्रति हार्दिक आभार प्रकट करता हूँ, जिन्होंने उमापति सम्बन्धी प्रस्तुत अध्ययन में किसी भी रूप में मेरी सहायता की है या अपनी स्नेहिल शुभाशंसाओं से मुझे अनवरत उत्साह प्रदान किया है।
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