भूमिका
'नवदीप' कविता संग्रह प्रकाशित कर आपके कर कमल में रखते हुए मुझे आनंद हो रहा है। इस कविता संग्रह के माध्यम से दक्षिण गुजरात जैसे अहिन्दी भाषी प्रदेश में हिंदी की रचना करने वाले कवियों की कविता को हिंदी के विशाल फलक पर लाने की कोशिश है। यह इस प्रदेश में कविता विधा में ही नहीं, हिंदी साहित्य की सभी विधा में इस प्रकार का संपादन होनेवाला संभवतः प्रथम प्रयास है। गुजरात प्रान्त में हिंदी साहित्य की रचनाएँ प्रकाशित होती रही हैं, पर इसका प्रमाण और प्रभाव कम रहा है। यहाँ हिंदी साहित्य पढ़ा जाता है, लिखा जाता है पर कई कारणों से प्रकाशित नहीं हो पाता। जिसके कारण उसकी लेखन कला को प्रोत्साहन नहीं मिल पाता। कवि जब रचना करता है तो उसकी रचनाएँ प्रकाशित भी होनी चाहिए। जिससे उसका उत्साह बना रहे और वह नित-नित नव सर्जन करने में रत रहे। आज सोशियल मीडिया या ई-पब्लिकेशन होने के बावजूद भी साहित्यकार को पुस्तक रूप में प्रकाशित होने का आनंद अधिक होता है। सोशियल मीडिया की लाईक और कमेंट से उसे संतोष नहीं मिलता। क्षणिक वाहवाही मिलने भर से उसे कवि रूप में परिचय नहीं मिलता। सोशियल मीडिया की विश्वसनीयता भी संदिग्ध है। सोशियल मीडिया के साहित्य को गंभीरता से नहीं लिया जाता। हिंदी साहित्य की मुख्यधारा को भारत के भिन्न भिन्न प्रदेश में रचित साहित्य की ओर अपना ध्यान देना होगा। प्रोत्साहित कर नई - नई दिशाएँ देनी होगी, तभी हिंदी साहित्य का विस्तार होगा। कवि जिस समाज, समय और स्थिति में जीता है उसका प्रभाव रचनाओं में परिलक्षित होता है। कोरोना ने विश्वभर को प्रभावित किया। भारत में भी कोरोना का कहर भारी रहा। कवि के संवेदनशील हृदय को लाखों लोगों की जान गवाने के दर्द ने दहला दिया। देशव्यापी और विश्वव्यापी घटनाएँ सहजता से साहित्य का विषय बन जाती हैं। प्रत्येक व्यक्ति की निजी अनुभूति और अनुभव होते हैं। जब तक यह निजी रहती है कविता नहीं बनती। कविता तब जन्म लेती है जब कवि की स्वानुभूति परानुभूति बनती है। कवि के स्वानुभव परानुभव में परिवर्तित होते हैं। निजानंद परानंद बने तो कविता श्रेष्ठ बनती है। कवि का भोगा हुआ यथार्थ केवल कवि का नहीं होना चाहिए। कविता वैयक्तिकता से निर्वियक्तिकता की ओर आगे बढ़ती है। कवि जब अपने अहम को गलित कर देता है तब समस्त मनुष्य संवेदन का प्रतिनिधित्व करता है। कवि अपनी विशेषता लेकर चलते हुए भी निजी भावाभिव्यक्ति होते हुए भी व्यक्तिगत भाषाभिन्नता होते हुए भी समान रूप से हमें अपनी ओर आकर्षित करते हैं। इस संग्रह के कवियों को काव्य कला का पूर्ण ज्ञान नहीं है। छंद और अलंकार की ओर उनका ध्यान नहीं गया। भावों की सुमधुरता ही इसकी जान है। सरस, सरल भाषा में आडम्बरहीन अभिव्यक्ति इसकी विशेषता है। इन कविताओं की भाषा पर गुजराती भाषा का प्रभाव भी कहीं-कहीं देखा जा सकता है। यह स्वाभाविक ही है कारण कि हिंदी उनकी मात्र भाषा नहीं है। उनकी प्रथम मात्र स्थानीय आदिवासी भाषा या गुजराती भाषा है। सहृदय पाठक के मन को अभिभूत करने की क्षमता पर कविता को देखा जाय। इन कवियों ने अभी लिखने का आरंभ मात्र किया है। ये कवि अभी चलना सीख रहे हैं और पा पा पगली भर रहे हैं। संभव है कि उनकी तुतलाती भाषा में दोष हो, शैली में शिथिलता के कहीं दर्शन हो जाय, पर संवेदना की सहज अभिव्यक्ति सभी कविता में दिखाई देगी। कवि आनंद डोंगरकर संकलित कविता में अपनों का जीवन में महत्व ऑकते हैं। कोरोना की महामारी में विवशता और दुःख के कारण दिवाली उत्सव का आनंद कम हो गया है। ऐसे हालात में भी कवि आनंद मानव का हित देखते हैं और विश्वास रखते हैं कि कोरोना की महामारी का नाश हो। बचपन जीवन का अविस्मरणीय, प्रेम और खेल से भरा काल है। आनंद ने बाल्यकाल का सुंदर चित्रण किया है। जीवन में आये मुसीबतों का डटकर सामना करने का वे संदेश देते हैं। यादें मनुष्य की अमूल्य नीधि हैं। अच्छी यादें जीवन को सुखमय बनाती हैं। वे यादों की महिमा गाते हैं
लेखक परिचय
दिपेश कामडी 'अनीस' जन्म-07/06/1986, घोडमाल वांसदा, नवसारी, गुजरात शिक्षा- एम०ए०, एम० फिल०, पी-एच०डी० शोधरत वीर नर्मद दक्षिण गुजरात विश्वविद्यालय, सूरत, गुजरात । प्रकाशन- 1. कुंकणा लोकगीतो, (कमलेश गायकवाड के साथ संपादन) 2012, आदर्श साहित्य सदन, अहमदाबाद। 2. कुंकणा देवकारें (कमलेश गायकवाड के साथ संपादन) 2014, ज्ञानमंदिर प्रकाशन, अहमदाबाद। 3. मृत प्यार (हिंदी काव्य संग्रह) 2020, चिंतन प्रकाशन कानपुर। 4. शुकरे कहानी (वार्ता) गुजराती अनुवाद के साथ 'मारी भाषामां मारी वार्ता' सं. कमलेश आर. गायकवाड, रोशन पी चौधरी, प्रितेश सी, चौधरी और महेंद्र पटेल पुस्तक में प्रकाशित। 5. 'जयद्रथ वध में मानवीयता' लेख, 'जयद्रथ-वध एक समीक्षात्मक अध्ययन' सं. डॉ. जितेन जे. परमार पुस्तक में प्रकाशित। 6. 'मोहन राकेश का व्यक्तित्व और कृतित्व' लेख पाँच पर्देः समीक्षात्मक अध्ययन', सं. डॉ. जितेन जे. परमार डॉ. मेरगसिंह यादव पुस्तक में प्रकाशित। * रीति, वही, शब्दसर, आदिलोक और विद्यावार्ता पत्रिका में संपादित गीतों, लेख और कविता प्रकाशित । सम्प्रति- प्राध्यापक हिंदी, सरकारी आर्ट्स एण्ड कॉमर्स कालेज, भीलाड,
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