प्रस्तावना
उत्तर प्रदेश में नक्सली आंदोलन का अध्ययन करने से पहले नक्सलवादी आंदोलन के उभार की परिस्थितियों, तत्कालिक विचारधाराओं और विद्रोह की परिस्थितियों को भी समझना आवश्यक है क्योंकि उत्तर प्रदेश में नक्सली आंदोलन तो पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी जन आंदोलन के उभार के स्वरूप ही प्रारम्भ हुआ था जिसे चीनी अखबार 'पीपुल्स डेली' ने बंसत के वजनाद की संज्ञा दी। नक्सलवादी आंदोलन न केवल 'वर्गसंघर्ष और 'सफाया अभियान' तक सीमित नही था। अपितु, इसने भारतीय समाज, जन आंदोलन तथा साहित्य को भी काफी हद तक प्रभावित किया था। भारत के ग्रामीण इलाकों से प्ररम्भ हुआ विद्रोह देखते ही देखते 70 के दशक में गरीब, शोषित एवं दबे कुचले वर्ग के लिए संघर्ष का हथियार बन गया। इसने न केवल तत्कालीन भारतीय समाज को प्रभावित किया, देश की आन्तरिक सुरक्षा पर भी व्यापक प्रभाव डाला। इन्ही प्रभावों एवं उत्तर प्रदेश में नक्सली आंदोलन का अध्ययन करने से पूर्व नक्सलवादी आंदोलन के उभार को समझना आवश्यक ही नहीं अनिवार्य है।' नक्सलवादी आंदोलन के महत्व के वस्तुगत आकलन के लिए यह जानना जरूरी है कि भारतीय कम्युनिस्ट आन्दोलन में ये हालात क्यों और किस प्रकार तैयार हुए कि पश्चिम बंगाल के एक सुदूर तराई अंचल में सथानीय कम्युनिस्ट संगठनकर्ताओं के नेतृत्व में किसानों का हथियारबन्द जन-विद्रोह शुरू हुआ (जो बमुश्किल तमाम सिर्फ ढाई माह तक ही चला) और उसके पक्ष-विपक्ष में पूरे देश का कम्युनिस्ट आन्दोलन बॅट गया तथा वह घटना संशोधनवाद से निर्णायक विच्छेद का मानक, प्रस्थान-बिन्दु, रूपक और प्रतीक चिन्ह बन गयी। नक्सलबाडी, तेलंगाना के छूटे हुए सिरे को पकड़कर आगे विस्तार दे सकता था, पर ऐसा नहीं हो सका। कई रूपों में नक्सलबाड़ी के बाद, मा.ले. आन्दोलन की मुख्य धारा ने रणदिवे-कालीन "वामपन्थी" संकीर्णतावाद को ही और अधिक विकृत भोंड़े रूप में दुहराया। मजदूर आन्दोलन संशोधनवादी पाप की कीमत अतिवामपन्थी भटकाव के दण्ड के रूप में चुकाता है। लेनिन की इस उक्ति को चरितार्थ करते हुए 17 वर्षों लम्बे संशोधनवादी दौर की प्रतिक्रिया नक्सलबाडी किसान उभार के दो वर्षों बाद वामपन्थी" आतंकवाद के रूप में सामने आयी। नक्सलबाडी के ऐतिहासिक महत्व, उसकी ऐतिहासिक सफलता और विफलता को ही समझने के लिए यह चर्चा जरूरी है। नक्सलबाडी स्वातन्त्रोत्तर भारत के इतिहास के एक ऐसे दौर में हुआ जब नेहरू की पूँजीवादी नीतियों के समाजवादी मुखौटे की असलियत उजागर हो चुकी थी। महँगाई और बेरोजगारी से त्रस्त आम लोग सड़कों पर उतर रहे थे। छात्र-युवा आन्दोलन, मजदूर आन्दोलन और महँगाई-विरोध ती जनान्दोलनों का अविराम क्रम जारी था। पूँजीवादी संसदीय राजनीति के दायरे के भीतर इस व्यापक मोहभंग और जनाक्रोश की अव्यिक्ति 1967 के आम चुनावों के बाद, पहली बार देश के नौ राज्यों में गैरकांग्रेसी सरकारों के गठन के रूप में सामने आयी। लेकिन अहम बात यह थी कि 1947 के बाद के वर्षों में और तेभागा-तेलंगाना पुनप्रा-वायलर और नौसेना-विद्रोह के दिनों के बाद, पहली बार देशव्यापी स्तर पर जनसमुदाय में व्यवस्था-विरोधी भावनाएँ और क्रांन्तिकारी परिवर्तन की आकांक्षाएँ उमड़-घुमड़ रही थीं जिन्हें दिशा और नेतृत्व देने वाली कोई क्रान्तिकारी शक्ति राजनीतिक रंगमंच पर मौजूद नहीं थी। स्मरणीय है कि यही वह समय था जब वियतनामी क्रान्ति अमेरिका साम्राज्यवादी के विरूद्ध विजयोन्मुख थी और पूरी दुनिया में, यहाँ तक कि पश्चिमी देशों में भी छात्र-युवा, बुद्धिजीवी और मेहनतकश सड़कों पर उतरकर उसका समर्थन कर रहे थे। अफ्रीकी देशों में राष्ट्रीय मुक्ति संघर्ष एक के बाद एक जीतें हासिल कर रहे थे और लातिन अमेरिका में भी सैनिक जुण्टाओं के विरूद्ध प्रतिरोध संघर्ष उफान पर थे फ्रांस में छात्र आन्दोलन और अमेरिका में अश्वेतों, स्त्रियों और युवाओं के आन्दोलनों तथा युद्ध-विरोधी आन्दोलन का अविराम सिलसिला जारी था। सोवियत संशोधनवाद के विरूद्ध चीन की कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा चलायी गयी 'महान बहस' के बाद, 1966 से चीन में महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति का तूफान शुरू हो चुका था, जो न केवल पूरी दुनिया के मेहनतकशों और कम्युनिस्ट कतारों को संशोधनवाद के विरूद्ध संघर्ष करने और क्रान्ति का मार्ग चुनने के लिए प्रेरित कर रहा था
लेखक परिचय
डॉ० सत्यम चौधरी प्रवक्ता राजनीति विज्ञान राजकीय आश्रम पद्धति बालिका विद्यालय गोदान रोड, लखनऊ उ०प्र० समाज कल्याण विभाग उ०प्र० जन्म - 17 सितम्बर 1984 माता - श्रीमती बशान्ती देवी पिता स्व० मोहन लाल पता - सबरी, नई दशमी पोस्ट – सदर जिला - मीरजापुर उ० प्र० शिक्षा - स्नातक 2004 के बी० पी० जी० कालेज मीरजापुर परास्नातक - 2006 राजनीति शास्त्र बी० एड 2007 आर० के० एस० पी० जी० कालेज कलवारी मीरजापुर UGC-NET/JRF- 2013 राजनीति शास्त्र Ph.-D. - 2024 लखनऊ विश्वविद्यालय उ० प्र० विषय- उत्तर प्रदेश में नक्सली आन्दोलन का अध्ययन
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