प्रस्तुत 'न्यायप्रकाश' पुस्तक न्यायशास्त्र के (प्राचीनन्याय के) सभी मुख्य ग्रन्थों के मतों की समीक्षा पूर्वक लिखी गयी। इस शास्त्र के सभी विषय अति सरल रीति से क्रमबद्ध समझाये गये हैं। इसके मूल आधार ग्रन्थ न्यायसूत्र-भाष्य-वार्तिक तात्पर्य-परिशुद्धि-प्रकाश ग्रन्थ हैं। न्यायमञ्जरी एवं तर्कभाषा का भी बहुत सहारा लिया गया है। इन ग्रन्थों में परम्पर समागत विचारभेदों की समीक्षा की गई है। यथावसर बौद्धनैयायिक एवं पाश्चात्य तार्किकों के मत भी समीक्षित हुए हैं। प्राचीनन्याय के ही कालभेद से प्राचीन (वाचस्पति, उदयन आदि) एवं नवीन (केशर्वामश्र आदि) के परस्पर मतभेदों को भी उल्लिखित किया गया है ।
न्यायशास्त्र से निःश्रेयस (मोक्ष) की प्राप्ति ही है। इन सोलहों पदार्थों में क्रमसंगति एवं इनका यथार्थ परिचय तथा उपयोगिता जिस प्रकार इस ग्रन्थ में हिन्दी भाषा के माध्यम से वर्णित है, वैसा अन्यत्र नहीं है। यहाँ प्रत्येक विन्दु पर अपना निर्णय दिया गया है। इस ग्रन्थ के अध्ययन एवं मनन से न्यायशास्त्र का अनुगम सरलता से किया जा सकता है । सर्वसाधारण व्यक्ति को भी न्यायदर्शन से परिचय कराने के उद्देश्य से ही इसे राष्ट्रभाषा में प्रस्तुत किया गया। सभी ग्रन्थों के सारसंक्षेपण एवं समीक्षा के कारण विद्वानों के लिये भी इस ग्रन्थ की महती उपयोगिया है।
ग्रन्थ की भाषा बहुत ही संयत है, अर्थात् इसे पूर्णतः हिन्दी की शैली में रखा गया है, संस्कृत के कठिन शब्दों से बचने का प्रयास किया गया है। फिर भी कतिपय शास्त्रीय शब्द आ ही गये हैं जो अपरिहार्य थे । इसी प्रकार उर्दशब्दों से भी बचा गया है, तथापि कतिपय शब्द आ ही गये हैं-निस्वत (पृ. १७,२५), सबूत, साबित, जबरदस्त, जरूरत, ठीक, खाली आदि । खाली शब्द का 'केवल' अर्थ में प्रयोग मैथिली भाषा में जैसा होता है, वैसा ही यहां हुआ है। कुछ ऐसे असामान्य (पिकुलियर) प्रयोग भी हैं जैसे-'देखलाया हैं' (पृ. १६) इस विषय की चर्चा स्वयं लेखक ने इसकी भूमिका में की है कि कतिपय सज्जन इसकी भाषा को किसी हिन्दी विशेषज्ञ से संशोधित कराने की सलाह दिये थे. पर इन्हें यह इसलिये स्वीकार्य नहीं हुआ कि संशोधित भाषा लेखक की अभिव्यक्ति रह नहीं जाती ।
तेरहवीं शताब्दी में संस्कृत के प्रत्येक शास्त्र में शास्त्रार्थोपयोगी एक नवीन धारा प्रवाहित हुई। विशेषतः न्यायदर्शन में गंगेशांपाध्याय ने 'न्यायतत्त्वचिन्तामणि' लिखकर नव्यन्याय की आधार शिला रखी । इसकी व्याख्या परम्परा की विशालता सर्वविदित ही है । जहाँ प्राचीनन्याय में 'प्रमाण' विचार की अपेक्षा 'प्रमेय' विचार पर अधिक बल दिया गया है, वहीं नव्यन्याय में प्रमाणविवेचन की ही प्रधानता दी गयी है, अतएव इसे प्रमाणशास्त्र भी कहते हैं। इसीलिये तत्त्चिन्तार्माण में चार खण्ड-प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान और शब्द विद्यमान है. अवच्छेदकतायुक्त भाषा इसे दुष्प्रवेश बनायी हुई है।
प्रस्तुत 'न्यायप्रकाश' केवल प्राचीन न्याय के अनुसार विवेचन करता है, फिर भी ग्रन्थ का आधा भाग प्रमाण विवेचन में ही लग गया है।
यह ग्रन्थ काशी की नागरी प्रचारिणी सभा के अनुरोध पर १९१६ ई. में रचित हुआ, जिसे सभा ने १९२० में प्रकाशित किया । वस्तुतः सभा का अनुरोध था कि 'प्राच्यदर्शनप्रदीप' नाम से सभी भारतीय दर्शनों का विवेचन हिन्दी में २५० पृष्ठों का बनाया जाय, परन्तु केवल न्याय एवं वैशेषिक दर्शनों के विचार में ही उनते पृष्ठ लग गये । अतः 'प्राच्यदर्शन प्रदीप' के दो ही अंश न्यायप्रकाश एवं वैशेषिकप्रकाश प्रस्तुत किये गये और इन्हीं दोनों का प्रकाशन हो सका। बाद में डॉ. झा अन्य कार्य में लग गये और वेदान्तादि दर्शन सम्बन्धी ग्रन्थ लिख नहीं सके या सभा की योजना ही स्थगित हो गयी ।
न्याय प्रकाश के रचयिता स्वनामधन्य म. म. डॉ. सर् गंगानाथ झा (१८७२-१९४१ ई.) मैथिलश्रोत्रिय वंश के 'पलिवार महिषी' नामक शाखा में उत्पन्न हुए थे। इनके पिता सरिसव-पाही ग्रानिवासी 'धरानाथ' प्रसिद्ध पं. तीर्थनाथ झा थे। दरभंगा के महाराज लक्ष्मीश्वर सिंह ने इन्हें संस्कृत के साथ-साथ अंग्ग्रेजी पढ़ने की सुविधा प्रदान की और ये दरभंगा राजस्कूल से १४ वर्ष की अवस्था में इन्ट्रेन्स परीक्षा में उत्तीर्ण होकर काशी के क्वीन्स कालेज में अध्ययन कर दर्शनशास्त्र में स्नातक एवं संस्कृत में एम. ए. परीक्षा में सर्वप्रथम स्थान प्राप्त करने में सफल हुए । इन्होंने काशी में म. म. शिवकुमार शास्त्री, म. म. जयदय मिश्र, म. म. गंगाधर शास्त्री आदि विद्वानों से संस्कृत का गहन अध्ययन किया. साथ ही अंग्रेजी के उत्कृष्ट विद्वानों से उसका भी परिश्रम पूर्वक अध्ययन किया । इस प्रकार प्राच्य एवं पाश्चात्य विद्याओं का इनमें मणिकाञ्चन संयोग हो गया। इनका विवाह मिथिला के प्रकाण्ड पण्डित म. म. हर्षनाथ झा की कन्या से हुई ।
सर्वप्रथम इन्हें दरभंगा के महाराज लक्ष्मीश्वर सिंह ने अपना पुस्तकालयाध्यक्ष नियुक्त किया जहाँ इन्होने म. म. चित्रधर मिश्र से मीमांसा का अध्ययन किया । १९०० ई. में प्रयाग विश्वविद्यालय ने इन्हें "प्रभाकर स्कूल ऑफ मीमांसा" विषय पर डी. लिट् की उपाधि प्रदान की १९०१ ई. में भारत सरकार ने इन्हें महामहोपाध्याय की पदवी दी । १९०२ ई. में डॉ. थीबो साहब ने इन्हें काशी के एक कालेज में संस्कृत प्राध्यापक पद पर नियुक्त किया । १९१८ ई. में ये राजकीय संस्कृत महाविद्यालय, काशी के प्राचार्य पद पर नियुक्त होने वाले प्रथम भारतीय व्यक्ति थे । इन्होंने प्रयाग विश्वविद्यालय के उपकुलपति पद पर ९ वर्ष रहने के पश्चात् उस पद पर सरकार द्वारा नियुक्त डॉ. अमग्नाथ झा को प्रभार सौंपा था जो इनके पुत्र थे। डॉ. गङ्गानाथ झा को अंग्रेज सरकार ने बहुत सम्मान देते हुए 'सर्' की पदवी दी थी। इनकी रचनायें -
१. संस्कृत व्याख्या ग्रन्थ मण्डन मिश्रकृत मीमांसानुक्रमणी की व्याख्या, न्यायसूत्र व्याख्या, शाण्डिल्यसूत्र व्याख्या एवं प्रसन्नराघवनाटक व्याख्या।
२. संस्कृत के उच्चकोटि के १४ ग्रन्थों का अंग्रेजी अनुवाद, यथा-काव्यप्रकाश, वात्स्यायनभाष्य, शाबरभाष्य, योगभाष्य आदि ।
३. चार मौलिक हिन्दी ग्रन्थ न्यायप्रकाश, वैशेषिक प्रकाश, कविरहस्य, हिन्दू लॉ ।
४. चार अंग्रेजी ग्रन्थ ।
५. मैथिली भाषा में वेदान्तदीपक ।
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