गढ़वाल, हिमालय की गोद में बसा भूभाग है, जिसकी अपनी एक जीवंत भाषा है- गढ़वाली। यह सिर्फ आपसी बातचीत का माध्यम नहीं बल्कि यहाँ की सभ्यता, संस्कृति, लोक-जीवन और सदियों के अनुभवों का आईना है। इस क्षेत्र की कहानियाँ इसी आईने को प्रतिबिंबित करती हैं, जिनमें गाँव की, खेतों की और घर-आँगन की बातें गूंजती हैं।
गढ़वाली भाषा उत्तराखंड के गढ़वाल क्षेत्र में ही बोली जाती है। वृहद पाठकों तक इसकी पहुंच बनाने के लिए अनुवाद एक सशक्त माध्यम है क्योंकि यह अलग-अलग संस्कृतियों और भाषा के बीच सेतु का काम करता है। इसके माध्यम से साहित्य एक भाषा से दूसरी भाषा में जाकर व्यापक जनमानस तक पहुंचता है, साथ ही पाठक जब किसी अन्य देश या समाज की कहानियों से रूबरू होते हैं तो उन्हें उस समाज की सोच व दृष्टिकोण को समझने का मौका मिलता है। इससे आपसी समझ व सहिष्णुता तो बढ़ती ही है साथ ही दुनिया को भी व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखने का अवसर मिलता है।
अनुवाद करना मेरी अभिरुचि में शामिल है। फिर भी मैं कहूंगी कि यह बहुत ही श्रम साध्य और खासा मुश्किल काम है। खासकर जब आप किसी और की कहानी और भावनाओं को अपनी भाषा में उतार रहे हों। क्योंकि इसमें एक भाषा में रची रचना के प्राण बचाकर दूसरी भाषा में डालने होते हैं। सरल शब्दों में कहें तो अनुवाद एक भाषा से दूसरी भाषा में प्राणप्रतिष्ठा करने का प्रयास होता है।
अनुवाद करते समय सबसे बड़ी चुनौती शब्दावली और भाषाई बारीकियों की आती है। गढ़वाली की शब्द-सम्पदा अन्य भाषाओं की अपेक्षा बहुत समृद्ध है। इसमें बहुतायत शब्द ऐसे हैं जिनका सीधा अनुवाद दूसरी भाषाओं में नहीं मिलता। गढ़वाली से हिंदी अनुवाद के दौरान भी इस तरह के शब्दाभाव की समस्या आती है और इसके लिए शब्द ढूँढना भी नामुमकिन होता है जिससे अनूदित कार्य में मौलिकता का अभाव या शब्दों में हल्कापन महसूस होता है।
दूसरी चुनौती व्याकरणिक संरचना की है। गढ़वाली की वाक्य संरचना कभी-कभी हिंदी से अलग होती है और यह सुनिश्चित करना जरूरी होता है कि अनुवादित पाठ सहज और स्वाभाविक लगे। इसके अलावा कहानियां गढ़वाली की गहरी समझ के साथ सांस्कृतिक संवेदनशीलता की भी मांग करती हैं ताकि केवल उनमें मौजूद शब्दों का ही नहीं, बल्कि उनके पीछे छिपे भावों और संदर्भका भी सही अनुवाद हो सके।
यह पुस्तक गढ़वाली कहानियों को हिंदी के माध्यम से पाठकों तक पहुँचाने का एक विनम्र प्रयास है। अनुवाद करते समय मैंने इस बात का विशेष प्रयास किया है कि इनकी मूल आत्मा और पहाड़ीपन खो न जाए। इनमें पाठकों को वह सादगी मिलेगी जो पहाड़ और पहाड़ी जीवन की पहचान है, वह संघर्ष मिलेगा जो यहाँ के लोगों ने प्रकृति के साथ मिलकर किया है, और वह हास्य भी मिलेगा जो हर मुश्किल को हँसकर सहने की शक्ति देता है।
ये कहानियाँ सिर्फ मन बहलाव का साधन नहीं हैं, बल्कि ये पहाड़ के सामाजिक ताने-बाने, वहाँ के रीति-रिवाजों और लोक विश्वासों का भी परिचय कराती हैं। मुझे उम्मीद है कि पाठक महसूस करेंगे कि कैसे ये कहानियाँ उनको उनकी जड़ों से जोड़ेंगी और बताएंगी कि भले ही भाषा में विभेद हो, पर भावनाएँ सबकी एक जैसी ही होती हैं।
इसमें मौजूद कुछ कहानियाँ पाठकों को वर्षों पहले पीछे छूट चुके समय में ले जाएंगी और उन्हें वही आत्मीयता मिलेगी, जिस आत्मीयता से रचनाकारों ने इन्हें रचा है। मेरा यह मानना भी है कि ये कहानियाँ भाषा की सीमाओं को तोड़कर एक पुल का काम करेंगी, जो गढ़वाली संस्कृति को व्यापक हिंदी पाठक वर्ग से जोड़ेगा।
यह पुस्तक सिर्फ कहानियों का संग्रह नहीं, बल्कि एक संस्कृति से दूसरी संस्कृति को जोड़ने का एक पुल है। यह उन लोगों के लिए एक सौगात है जो गढ़वाल की धरती से दूर हैं, और उन लोगों के लिए भी जो यहां की संस्कृति को जानना चाहते हैं।
मैंने मूल कहानियों के भाव के साथ और सार और संदर्भ को यथावत बनाए रखने की पूरी कोशिश की है, भले ही इसके लिए कहीं-कहीं पर शब्दों को थोड़ा फेर-बदल करना पड़ा।
ये कहानियाँ पहाड़ों में रहने वाले लोगों के सीधे और सरल जीवन को प्रतिबन्धित करती हैं। साथ ही उनके संघर्ष, आपसी रिश्ते और रोजमर्रा की जिंदगी को भी करीब से चित्रित करर्ती हैं। और जीवन की छोटी-छोटी खुशियों और मुश्किलों को दर्शाती हैं।
इनमें पहाड़ की लोक संस्कृति, रीति-रिवाज, परम्परा, सामाजिक सहिष्णुता, समरसता के साथ-साथ सामाजिक विसंगतियाँ, बोझिल परम्पराएं, रूढ़िवादिता, ऊंच-नीच, छुआछूत आदि मानवीय कमजोरियां भी देखने को मिलती हैं। इन कहानियों को पढ़ते वक्त पाठक इनमें मौजूद चरित्रों की दुविधा, बेचैनी और सुख-दुखों से जुड़ाव महसूस करेंगे ऐसा मेरा मानना है।
इन कहानियों को अनूदित करने का उद्देश्य पहाड़ और गढ़वाल को व्यापक पाठकों तक पहुँचाना है। साथ ही नयी पीढ़ी के साथ-साथ उन गढ़वाली भाषी लोगों के लिए भी यह एक सौगात है जिन्हें इसमें पढ़ना-लिखना बोझिल और मशक्कत भरा काम लगता है।
इस संग्रह में 1913 में प्रकाशित गढ़वाली भाषा की पहली कहानी से लेकर वर्तमान समय के कहानीकारों की कहानियाँ संकलित की गयी हैं। अधिकतर कहानियाँ मदन मोहन डुकलाण जी एवं गिरीश सुन्द्रियाल जी द्वारा संपादित कथा संग्रह 'हुंगरा' से ली गयी हैं। इसके अलावा गणेश खुगशाल जी द्वारा संपादित मासिक पत्रिका 'धाद' के नये पुराने अंकों से भी कुछ कहानियाँ इसमें संकलित की गयी हैं। मैं समय साक्ष्य प्रकाशन को शुभकामनाएं एवं साधुवाद देती हूँ कि उन्होंने मुझे इन कहानियों को अनूदित करने का दायित्व सौंपा।
मैंने कोशिश की है कि इन कहानियों की आत्मा को जीवित रख सकूँ। उम्मीद है कि आप इन्हें पढ़कर वही खुशी महसूस करेंगे जो मुझे इन्हें पढ़ने और अनूदित करने के दौरान हुई।
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