पश्यन्ती के निबन्धों में धर्मवीर भारती की एक ऐसी बहुआयामी साहित्य-दृष्टि मिलेगी जो इतिहास की हवाओं की हर हल्की से हल्की हिलोर पर संवेदनशील मुलायम पीपल पात की तरह काँप उठे, ग्रीक वीणा की तरह झंकार भी दे, और खुले हुए पाल की तरह तनकर, तेज़ हवाओं को आत्मस्थ कर, तूफ़ानों को चीरने का साहस-पथ भी निर्दिष्ट करे।
भारती जी ने समय-समय पर अनेक विषयों पर लिखा है, और जब जो भी लिखा है वह अत्यन्त विचारोत्तेजक रहा है। इसीलिए उसकी व्यापक चर्चा भी हुई है। पश्यन्ती उनके ऐसे ही कुछ निबन्धों का संकलन है। इन निबन्धों में मुखर व्यापक अध्ययन, प्रखर विश्लेषण, गहन चिन्तन, पैनी और ज्वलन्त शैली और मौलिक विवेचन का साहस-सब मिलकर एक अनूठे रस का संचार करते हैं।
प्रस्तुत है इस बहुचर्चित कृति का एक और नया संस्करण ।
बहुचर्चित लेखक एवं सम्पादक डॉ. धर्मवीर भारती 25 दिसम्बर, 1926 को इलाहाबाद में जनमे और वहीं शिक्षा प्राप्त कर इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अध्यापन-कार्य करने लगे। इसी दौरान कई पत्रिकाओं से भी जुड़े। अन्त में 'धर्मयुग' के सम्पादक के रूप में गम्भीर पत्रकारिता का एक मानक निर्धारित किया।
डॉ. धर्मवीर भारती बहुमुखी प्रतिभा के लेखक थे। कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक, निबन्ध, आलोचना, अनुवाद, रिपोर्ताज आदि विधाओं को उनकी लेखनी से बहुत-कुछ मिला है। उनकी प्रमुख कृतियाँ हैं : साँस की कलम से, मेरी वाणी गैरिक वसना, कनुप्रिया, सात गीत-वर्ष, ठण्डा लोहा, सपना अभी भी, सूरज का सातवाँ घोड़ा, बन्द गली का आख़िरी मकान, पश्यन्ती, कहनी अनकहनी, शब्दिता, अन्धा युग, मानव-मूल्य और साहित्य और गुनाहों का देवता ।
भारती जी 'पद्मश्री' की उपाधि के साथ ही 'व्यास सम्मान' एवं अन्य कई राष्ट्रीय पुरस्कारों से अलंकृत हुए।
4 सितम्बर, 1997 को मुम्बई में देहावसान ।
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