प्रस्तावना
'ढोल, गंवार, शूद्र, पशु, नारी यह सब तारन के अधिकारी। कभी तुलसीदास ने ऐसे पद रचकर भारतीय नारी की अवधारणा को बेहद संकीर्ण कर दिया था। आज इस पद को लेकर भले ही विभिन्न दृष्टिकोण बन रहे है, किंतु यह सच है कि सदियों तक इसकी व्याख्या पुरुषवादी सोच के उस संकुचित दायरे में होती रही, जहां स्त्रियों और दलितों में कोई फर्क नहीं रहा। नारी चाहे किसी भी जाति अथवा धर्म की हो उसकी औकात सभी जगह लगभग कमतर करके ऑकी गई। सच से कोसों दूर के यह पैमाने भारतीय नारी की अवधारणा की गलत व्याख्या करते हैं। भारतीय नारी की अवधारणा के व्यापक रूप में समझने के लिए यह आवश्यक है कि हम इतिहास के पन्नों को दोबारा पलटे और वहां नारियों की भूमिकाओं की दोबारा पड़ताल करें। मूल्य, अनुशासन और अनुभव किसी भी समाज की प्रगति को इच्छित उद्देश्य तक पहुंचाने की आकांक्षा सूचित करते हैं। सभ्यता के विकास का प्रकाश जो मनुष्य जाति ने अर्जित किया है, उसमें अनुभव, अनुशासन और मूल्यों का सर्वाधिक महत्व रहा है। मूल्य ही हमारे सामने हमारे व्यवहार और चरित्र को रुपाकार देते हैं। यह ऐसी नैतिक बाध्यताएं प्रस्तुत करते हैं जो यह निर्धारित करती है कि हमें किन परिस्थितियों में कैसे आचरण करना चाहिए। मूल्य किसी भी जाति की विशिष्टता का कूट होता है। सूक्ष्म तौर पर देखा जाए तो भारतीय मूल्यों के वाहक के रूप में हम पुरुषों से कहीं अधिक स्त्रियों की भूमिका को महत्वपूर्ण पाते हैं। यह और बात है कि पुरुष समाज ने यौन सुचिता का ऐसा मूल्य निर्धारित कर रखा है, जिसे सदियों से पुरुष वर्चस्व को बनाए रखने हेतु अमोघ अस्त्र की भांति प्रयोग किया जाता रहा है। प्राचीन काल से लेकर आधुनिक काल तक यानी आज तक इस मूल्य ने पुरुष की अपेक्षा मात्र नारी को बुरी तरह जकड़ रखा है। आर्थिक स्वतंत्रता अर्जित करके भी नारी आज भी इस बेड़ी को काट नहीं पाई है। हालांकि ज्यों-ज्यों शिक्षा और साक्षरता बढ़ती गई इस विचार श्रेणी में भी विस्तार होता गया और आज ज्ञान विज्ञान और सूचनाओं के बीच वैश्विक विस्तार के साथ इसकी अवधारणा और स्वरूप काफी बदल चुके हैं। जिस प्रकार हम कभी श्रम विभाजन और सामाजिक संतुलन के नाम पर बनी वर्ण व्यवस्था क्रमशः दरकती धसकती हुई जा रही है. उसी प्रकार कभी घर की मान मर्यादा और समृद्धि के लिए बनी गृहिणी और अर्धागिनी बनी नारी के रूप क्रमशः खंडित हो रहे हैं। भारतीय मिथकों में दुर्गा, पार्वती, द्रौपदी, कुंती आदि चरित्रों को तो सराहा जाता है, किंतु सीता, सावित्री और अहिल्या जैसे चरित्रों को नारीवादी दृष्टि से नकारा जाता है। सूक्ष्म विश्लेषण करने पर हम पाते हैं कि यह सीता, सावित्री अहिल्या आदि ना तो पुरुषों के हाथों की कठपुतलियां थी और ना मुऊक समर्पिता। वर्जिन मेरी और शकुंतला की तरह सीता ने भी एकल अभिभावक का दायित्व निभाया और राम के इस धोबी संसार के सामने इतने होनहार बच्चों लव-कुश को एक चुनौती के रूप में खड़ा किया कि लोग देखते ही रह गए। किसी को प्रायश्चित का मौका दिए बिना सीता जो धरती में समा गई वह भी एक मुखर प्रतिरोध ही था पति के साथ वन जाना और लक्ष्मण रेखा को लांघना भी उसके चरित्र की अद्भुत विलक्षणता है। किसी को प्रायश्चित का मौका दिए बिना सीता धरती में समा गई, वह भी एक मुखर प्रतिरोध ही था । पति के साथ वन जाना और लक्ष्मण रेखा की को लांघना भी उसके चरित्र की अद्भुत विलक्षणता है। सीता संभवत है पहली भारतीय महिला थी, जिन्होंने पति के साथ ही सही घर की चौखट लांघकर अपनी आंखों से दुनिया देखी। सीता को हम अब तक मुऊक आज्ञाकारिता के कटघरे में रखकर देखे आए हैं कि तू हमें यह नहीं भूलना चाहिए की सीता का सबसे बड़ा सच है लक्ष्मण रेखा लांघ जाना। यहां सीता का स्व विवेक और साहस झलकता है। जब स्त्री होकर भी आपात स्थिति में वह अपनी समझ के हिसाब से समाज निर्मित नियमावलियों में परिवर्तन का साहस करती है। सावित्री के चरित्र का सूक्ष्म विश्लेषण भी ऐसी ही विलक्षणता को उजागर करता है। यम वास्तव में एक पर पुरुष ही तो था, कायदे से उसकी छाया भी जीते जी सावित्री की पर नहीं पड़नी चाहिए थी। उसने हिम्मत की, नियमावलियों को ताक पर रखी, यम के पीछे गई बहस में हराया और अंततः अभीप्सित प्राप्त करके लौटी। संसार के किसी भी प्राचीन दर्शन में स्त्रियों के प्रति पारंपरिक दृष्टि अच्छी नहीं रही है। मनु आदि भारतीय आर्य ऋषियों तक के स्त्री संबंधी दृष्टिकोण अत्यंत नकारात्मक रहे हैं। भारतीय नारी की अवधारणा का मूल्यांकन इसलिए भी जरूरी है
लेखक परिचय
डॉ० निशा कुमारी जन्म तिथि - 26/11/1971 पिता - स्व० प्रो० कमलेश्वर साह माता - स्व० कमला साह शिक्षा - बी.ए. (प्रतिष्ठा) - टी.एन.बी कॉलेज, भागलपुर विश्वविद्यालय बी. एड. क्षेत्रीय शिक्षा संस्थान, भुवनेश्वर, उड़ीसा (भारत) एल. एल. बी. टी.एन.बी लॉ कॉलेज, भागलपुर एम. ए. हिंदी स्नातकोत्तर विभाग, तिलका मांझी भागलपुर विश्वविद्यालय NET-2015
पुस्तक परिचय
देश या समाज रूपी गाड़ी के दो पहिए होते हैं पुरुष और स्त्री। जब तक दोनों में सामंजस्य नहीं होगा तब तक देश या समाज आगे नहीं बढ़ सकता। किसी भी साहित्यकार का नारी संबंधी लेखन आधी आबादी का लेखन होता है इस दृष्टि से रचनाकार की नारी संबंधी सोच का अध्ययन अपने में महत्वपूर्ण है ।नारी ही वह कड़ी है जो परिवार के सदस्यों को और समाज के विभिन्न लोगों को आपस में जोड़ती है। वह बच्चों को केवल जन्म ही नहीं देती उसे संस्कार भी देती है। पुस्तक के आरंभ में वैदिक काल से लेकर आधुनिक काल तक की नारियों की पारिवारिक, सामाजिक दशा और जीवन मूल्यों की विस्तृत व्याख्या की गई है। फणीश्वर नाथ रेणु हिंदी के सर्वोत्कृष्ट कथाकारों में रहे हैं। बिहार जैसे पिछड़े राज्य के एक छोटे से गांव औराही हिंगना में जन्मे रेणु केवल बिहार में ही नहीं विश्व में भी विख्यात हुए।गांव की जिंदगी को उन्होंने बहुत ही करीब से देखा था ।यही कारण है कि उनकी रचनाओं में लोक जीवन उभर कर सामने आता है। रेणु जी का व्यक्तित्व और उनके जीवन उन पर विविध विचारकों गांधी, लोहिया मार्कुस, फ्रायड आदि का व्यापक प्रभाव पड़ा। अतः इन विचारों का अध्ययन भी समीचीन है। रेणु जी के कथा साहित्य में आए चरित्र कई दृष्टियों से बहुत आकर्षक, जीवंत और स्वाभाविक रहे हैं। जहां तक नारी चरित्र का प्रश्न है वह तो काफी वह वैविध्यपूर्ण और आकर्षणयुक्त रहे हैं। संबंध सापेक्षता की दृष्टि से भी ये अद्भुत है ।इन नारी चरित्र में अनूठी संबंध सापेक्षता है। वे एक साथ एकाधिक मानवीय संबंधों को निभाने की चुनौती को स्वीकार भी करती है और उन्हें निभाकर एक आदर्श भी प्रस्तुत करती है। रेणु जी के इन नारी चरित्र यथा मां बहन बेटी, पत्नी, प्रेयसी और सखा आदि रूपों के अध्ययन से नारी मनोविज्ञान को समझा जा सकता है। अतः रेणु जी के कथा साहित्य में वर्णित नारी भावना का अध्ययन न केवल उसमे वर्णित समाज और संस्कृति का अध्ययन है बल्कि रेणु जी के नारी विषयक दृष्टिकोण को समझने का उपयुक्त साधन भी है।
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