भूमिका
वास्तु को एक ललित कला माना गया है। इसका विशेष संबंध ज्योतिष तथा कल्प के साथ जोड़ा गया है। क्योंकि भारतीय वास्तु के निर्माण में ज्योतिष में मुहर्त व शुभ समय प्रत्येक वास्तु निर्माण के लिये जानना वा देखना अनिवार्य है। तिथि एवं वार देखकर कार्य प्रारम्भ करना चाहिए। कल्प का भूगोल एवं भूगर्भ विद्या तथा गणित से घनिष्ट संबंध है। भूमि के गंध, वर्ण, रस (स्वाद) एवं स्पर्श से प्रचीन स्थापत्यकार भौगर्भिक परीक्षा से भवन निर्माण का स्थान निश्चित करते थे। स्थापत्य भवन, गुफा, चैत्य, मन्दिर, विहार, स्तूप इत्यादि निर्माण की कला है जबकि वास्तुविद्या उस भवन, गुफा, विहार, इत्यादि में रहने वाले प्राणी के सुखी जीवन की गारंटी देता है। इसी प्रकार वास्तुविद्या से निर्मित मन्दिर, चैत्य एवं स्तूप जागृत होते हैं और उस मन्दिर, स्तूप एवं चैत्य में पूजा करने वाले भक्तजनों की मनोकामना पूरी होती है। इस प्रकार स्थापत्य कला एवं वास्तुविद्या दो भिन्न-भिन्न वस्तुएँ हैं। यदि मन्दिर, गुफा, चैत्य, भवन, इत्यादि में से वास्तुविद्या को निकाल दिया जाये तो वह मात्र एक साधारण भवन रह जायेगा। इस प्रकार वह भवन केवल ईंट, पत्थर, लोहे, सीमेंट, इत्यादि का मात्र संग्रह रह जायेगा और कुछ नहीं। जिस प्रकार कोई मूर्तिकार कितना भी सुन्दर मूर्ति क्यों न बना दे, लेकिन उस मूर्ति में भाव नहीं, तो वह मूर्त्ति मात्र शारीरिक ढाँचा होकर रह जायेगी। प्रागैतिहासिक युग से मानव को जीवन रक्षा के लिए किसी न किसी आश्रय की आवश्यकता पड़ी थी। प्रारम्भ में तरूमूल, उनकी शाखाएँ अथवा पर्वतों की कन्दराएँ आदिम जन के आश्रय बने। इनमें पहाड़ों की गुफाएँ अधिक सुविधा जनक थी। अधिकांश गुफाएँ प्राकृतिक निर्मित थी। कालान्तर में मानव द्वारा पहाड़ों को काट-छाँटकर निवास के लिए गुफाएँ बनायी जाने लगी। प्राचीन काल में भवन मिट्टी, बाँस, लकड़ी के बनते थे। बाँस को त्ताकार के रूप में गाड़ देते थे और उसके ऊपर घास-फुस डाल देते थे। सके बाद घर मिट्टी तथा कच्ची ईंटों से बनने लगे। मौर्य काल से पूर्व ईंट के उपर ईंट रखकर दीवार बनाया जाता था और यह दीवार गुरुत्वाकर्षण के कारण टिका रहता था। लेकिन मौर्य काल आते-आते घर बनाने में ईंट को जोडने के लिए नीली मिट्टी का प्रयोग होने लगा। इस प्रकार गुप्त काल आते हीं आग में पक्की ईंटों का प्रयोग घर बनाने में होने लगा। भवन निर्माण एवं शिल्प-विज्ञान का नाम वास्तुकला है। वास्तु का विकास मानव सभ्यता के विकास के साथ हुआ, ऐसी कल्पना स्वभावतः की जा सकती है। संसार के प्राणिमात्र में आत्मरक्षा और सुख-साधन का भाव नैसर्गिक रूप में पाया जाता है। हम देखते हैं कि पक्षी घोंसले बनाते हैं, चूहे बिल खोद लेते हैं और दीमक भीटें बनाती है। इस प्रकार बुद्धि-शून्य कहे जाने वाले जीव-जन्तुओं, पशु-पक्षियों में भी आत्मरक्षा के लिए सुन्दर से सुन्दर कलापूर्ण निवास बनाने की भावना पायी जाती है, तो यह कल्पना स्वाभाविक है कि मानव में यह भावना, यह आकांक्षा और भी तीव्र रही होगी। उसने अपने जन्म के साथ ही सर्दी, गर्मी, बरसात, धूप आदि अनेक प्रकार की प्राकृतिक असुविधाओं से अपनी रक्षा की आवश्यकता का अनुभव किया होगा और उसी दिन वास्तुकला का जन्म हुआ होगा। मनुष्य का आरम्भिक जीवन अस्थिर था। वह एक स्थान से दूसरे स्थान घूमता, शिकार करता, गाय चराता और विचरण करता रहा। ऐसी अवस्था में उसने अपने चारों ओर रहने वाले पक्षियों की देखा-देखी अपने लिए घास-फूस की अस्थायी झोपड़ियाँ बनायी होंगी। इसके पश्चात् धीरे-धीरे उसने स्थायी एवं सुदृढ़ निवास बनाने की ओर ध्यान दिया होगा। सम्भव है कि मनुष्य ने अपने निवास में पशुओं का भी अनुकरण किया हो और अपने रहने के लिए भूमि में मांद बनाये हों और पर्वतों की गुफाओं और कन्दराओं की शरण ली हो। उसके बाद निवास ने सुदृढ़ रूप लिया और धीरे-धीरे सामूहिक निवास का रूप धारण करते-करते वह नगर के रूप में परिवर्तित हुआ। सभ्यता के विकास के साथ-साथ नगर की आवश्यकता और उपयोगिता के विस्तार ने सुचारू निर्माण की भावना को उद्दीप्त किया और मनुष्य ने उसे वैज्ञानिक रूप दिया। इसके पश्चात् उसने अपनी प्रत्येक आवश्कयता के लिए अनेक प्रकार के स्वतंत्र भवनों का निर्माण किया और उनकी वास्तुविद्या ने स्वतंत्र रूप धारण किया। वास्तुकला 'वस' धातु से बना है, जिसका अर्थ होता है एक स्थान पर निवास करना। क्योंकि निवास के लिए भवन की आवश्यकता होती है अतएव 'वास्तु' से तात्पर्य है
पुस्तक परिचय
वास्तुकला वस धातु से बना है, जिसका अर्थ होता है एक स्थान पर स्थिर रहना। इस कला के अन्तर्गत गृह, मन्दिर, स्तूप गुफा निर्माण इत्यादि आते हैं। वास्तुविद्या के अनुसार बने भवन में रहने वाले मुनष्य सुखी एवं शान्तिपूर्वक रहते हैं। इस प्रकार वास्तुकला एवं वास्तुविद्या दो भिन्न वस्तु हैं। प्रस्तुत पुस्तक के प्रथम अध्याय में यह दिखाया गया है कि गृह अर्थात घर का द्वारा किस दिशा में किस जगह रहने पर गृह में रहने वाले को धन, सुख, शान्ति इत्यादि मिलेगी। द्वितीय अध्याय में दिखाया गया है कि स्तूप का निर्माण वैदिक काल से हो रहा था लेकिन पुरातात्विक साक्ष्य बुद्ध काल से मिलना शुरू हुआ है। यह हो सकता है कि प्राचीन काल के सभी वस्तु सड़-गल गया, उसका अवशेष नहीं मिलता है तो इसमें आश्चर्य की क्या बात है? लेकिन साहित्यिक स्रोत में जैसे ऋग्वेद में स्तूप का वर्णन मिलता है। तृतीय अध्याय में राजप्रसाद का वास्तुविद्या का वर्णन किया गया जिसमें यह दिखाया गया है कि राजप्रसाद में तीन प्रकार के प्रमुख द्वार होते थे जिनमें गोपुर द्वारों का प्रथम स्थान है। चतुर्थ अध्याय में गुफा के वास्तुविद्या का वर्णन किया गया है। गुफा वास्तु का प्रथम भेद विहार था। इसमें निक्षु रहते थे एवं दूसरा भेद चैत्य था, इसमें भिक्षु पूजा करते थे। पंचम अध्याय में मन्दिर का वास्तुविद्या का वर्णन किया गया। इसमें यह दिखाया गया है कि विष्णु का मन्दिर पूर्व दिशा की ओर क्यों होता है? इस तरह के बहुत से तथ्यों का वर्णन किया गया है जो इस पुस्तक में वर्णित है।
लेखक परिचय
संजय प्रसाद इन्होंने राँची विश्वविद्यालय से 2007 में एम०ए०, 2008 में बी०एड० पास करने के पश्चात् "प्राचीन भारतीय निर्माण कार्यों में वास्तुविद्या : एक ऐतिहासिक अध्ययन (वैदिक काल से गुप्त काल तक)" शीर्षक शोध-प्रबन्ध पर राँची विश्वविद्यालय से 2011 ई० में पीएच०डी० की उपाधि प्राप्त की। जून, 2013 में राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा (नेट) में उत्तीर्ण हुए। आपके अनेक शोध लेख विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए हैं।
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