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पुराणिक अभिलेखों में हिन्दू विधान और रीतियाँ: Puranik Abhilekhon Mein Hindu Vidhan aur Reetiyan

$44
Includes any tariffs and taxes
Specifications
Publisher: Parimal Publication Pvt. Ltd.
Author R. C. Hazra
Language: Hindi
Pages: 454
Cover: HARDCOVER
10.0x7.5 Inch
Weight 1.04 kg
Edition: 2026
ISBN: 9788171109609
HCI124
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Book Description

लेखक परिचय

 

डॉ. आर.सी. हाजरा (राजेन्द्र चन्द्र हाजरा) संस्कृत और पुराणों के एक उच्च कोटि के विद्वान् थे। उनका जन्म 1905 ई० में अविभाजित बंगाल के ढाका में हुआ था। उन्होंने अपनी बी.. और एम.. संस्कृत से ही प्रथम श्रेणी से ढाका विश्वविद्यालय से क्रमशः सन् 1929 और 1931 ई० में पूर्ण की। 1936 में जगन्नाथ इण्टरमीडिएट कॉलेज के तत्कालीन संस्कृत के प्रवक्ता श्री एस. के. डे के मार्गनिर्देशन में उन्हें पीएच. डी. की उपाधि प्राप्त हुई। उनका शोधग्रन्थ 'Studies in the Puranic Records on Hindu Rites and Customs' सर्वप्रथम ढाका विश्वविद्यालय से ही 1940 में पुस्तक के रूप में प्रकाशित हुआ। 1939 से 1951 तक डॉ. हाजरा ढाका विश्वविद्यालय में ही कार्यरत रहें जहाँ उनकी पदोन्नति संस्कृत विभाग के अध्यक्ष के रूप में भी हुई। अपने समय में उन्होंने अपने साथी प्रवक्ता आर. सी. मजूमदार के साथ मिलकर स्वतंत्रता सेनानियों को ढाका हॉल में शरण देकर भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में भी अपना योगदान दिया। 1951 में हाजरा भारत विस्थापित हो गएं और उन्होंने संस्कृत कॉलेज, कलकत्ता में पोस्ट ग्रेजुएट विभाग में अपनी सेवाएँ प्रदान कीं। तत्पश्चात् अपनी सेवानिवृत्ति से पहले 1972 तक उन्होंने स्मृति और पुराण विभाग में अपनी सेवाएँ दीं।

डॉ. हाजरा ने भण्डारकार ऑरिएण्टल रिसर्च इंस्टीट्यूट, एसिआटिक सोसाइटी कलकत्ता, गंगानाथ झा रिसर्च इंस्टीट्यूट और साहित्य अकादमी के रिसर्च प्रोजेक्ट्स में भी अपना श्रेष्ठ योगदान दिया जहाँ उन्होंने एस. के. डे, आर. सी. मजूमदार, पी. वी काणे, . डी. पुलस्कर, यू. एन. घोषाल, वी. राघवन जैसे विद्वानों के साथ मिलकर उल्लेखनीय शोधकार्य पूर्ण कियें | अपने 40 वर्षों के गौरवशाली लेखन इतिहास में उन्होंने लगभग 10 पुस्तकें और 200 से अधिक रिसर्च आर्टिकल्स स्मृति, वेद, व्याकरण, काव्य, न्याय-वैशेषिक, पुरातत्त्व एवं पुरालेखविद्या जैसे जटिल विषयों पर लिखें।

 

पुस्तक परिचय

 

पुराणिक अभिलेखों में हिन्दू विधियाँ और रीतियाँ ग्रन्थ के माध्यम से डॉ. आर. सी. हाजरा ने भारतीय पुराण विद्या और उनकी विषय वस्तु को बड़ी गंभीरता से पहचाना और धर्मशास्त्रीय समान रूप वाली सामग्री को अपने अध्ययन का आधार बनाया। उन्होंने भारत में डेढ़ शताब्दी पूर्व के संस्कृत विद्वानों द्वारा अपनाई गई विधि से अधिक वैज्ञानिक तरीके से अपना कार्य पूर्ण किया है। सुनिश्चित योजना और उद्देश्य के अनुसार डॉ. हाजरा ने अपनी पुस्तक को पहले और दूसरे भाग में विभाजित किया है। पहला भाग महापुराणों से सम्बन्धित है। वह प्रमुख पुराणों (मार्कण्डेय, वायु, ब्रह्माण्ड, विष्णु, मत्स्य, भागवत और कूर्म) के पुराणिक अध्यायों के कालक्रम के साथ-साथ लघु पुराणों से भी सम्बन्धित है। दूसरे भाग में २०० .पू. से पहले हिन्दू समाज का स्वरूप है। यह तीसरी से छठी शताब्दी . तक और सम्बद्ध विषयों जैसे पुराणिक शिक्षाओं में ब्राह्मणिक तत्त्वों और पुराणिक रीतियों और रिवाज़ों पर याजकीय वर्ग के आर्थिक और सामाजिक आवश्यकताओं के प्रभाव से सम्बन्धित है। पुराणिक रीतियों और रिवाज़ों द्वारा तांत्रिकवाद का अवशोषण अगली चर्चा है। इसके बाद बहुत उपयोगी परिशिष्ट जिसमें श्लोक और उद्धरणों की एक लम्बी सूची है जो डॉ. हाजरा ने विद्यामान पुराणों में खोजी है। साथ ही टीकाओं और निबन्धों में महत्त्वपूर्ण अज्ञात पुराणिक छंदों की सूची भी है। प्रस्तुत हिन्दी संस्करण इस पुस्तक में रही कमियों और एक शताब्दी में आई नवीन पुस्तकों, पांडुलिपियों और पुरातात्विक खोजों के आधार पर परिवर्धित रूप में है। स्वयं हाजरा और पुराणों के अध्येता ऐसा चाहते थे। इसमें जहाँ दुर्लभ मूल पुस्तकों के अधिकाधिक श्लोकों को जोड़ा गया है वहीं सर्वाधिक प्रमाण वाले कृत्य कल्पतरु में उपलब्ध पुराणों के संदर्भों के लिये अलग से परिशिष्ट भी तैयार किया गया है। पुराणों के विद्वान डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू' ने अपनी विस्तृत भूमिका से पिछली सदी के पुराणिक कार्यों को विवेचित कर बड़ी आवश्यकता की पूर्ति की है।

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