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रामविलास शर्मा की आलोचना दृष्टि: Ramvilash Sharma Ki Alochna Drishti

$24
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Specifications
Publisher: Sasta Sahitya Mandal Prakashan
Author Krishnadutt Paliwal
Language: Hindi
Pages: 120
Cover: PAPERBACK
8.5x5.5 Inch
Weight 160 gm
Edition: 2025
ISBN: 9789348765277
HCB780
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Book Description

प्राक्कथन

     

 

प्रस्तुत पुस्तक में कृष्णदत्त जी के डॉक्टर रामविलास शर्मा पर लिखे गए पाँच निबंध संगृहीत हैं जो सन् 2004 से 2012-13 के दौरान लिखे गए थे। यदि वे मौजूद रहे होते तो संभवतया इस दिशा में आगे और काम करते। रामविलास शर्मा के लेखन में उनकी गहरी आस्था थी जो 'निराला की साहित्य साधना' आने के बाद उत्तरोत्तर गहराती गई। रामविलास जी हिंदी के उन बिरले मार्क्सवादियों में से हैं जिन्होंने विचारधारा को स्वदेशी भाव-भूमि, परंपरा और संस्कृति पर दृढ़ता से खड़े हो कर गहा और अपनाया है। पश्चिमी ज्ञान-परंपरा का अवगाहन करते हुए भारतीय परंपरा उनकी दृष्टि से कभी ओझल नहीं हुई है। मार्क्सवाद का आधार ग्रहण करते हुए वे पूँजीवादी, फासीवादी, साम्राज्यवादी, उपनिवेशवादी, नस्लवादी गुलामी मानसिकता से मुक्ति दिलाने के लिए कड़ा संघर्ष करते हैं। इस प्रक्रिया में उन्होंने भारतीय समाजिक-सांस्कृतिक संदर्भों को निगाह में अवश्य रखा है भले हो ऐसा करते हुए उन्हें मार्क्सवाद की लीक तोड़नी पड़ी हो, मार्क्सवादियों का विरोध बर्दाश्त करना पड़ा हो। रामविलास जी मानते हैं कि संस्कृति का गहरा संबंध अर्थ-तंत्र से होता है-मार्क्स को यूनानी, रोमी, फ्रांसीसी दर्शन और हीगल के दर्शन की पृष्ठभूमि मिली थी जबकि भारतीय रचनाकारों (प्राचीन और आधुनिक दोनों) को भारत की यथार्थवादी दार्शनिक परंपरा मिली जिसने इन्हें यथार्थवाद की अपनी निजी पहचान दी। अतः रामविलास जी का साहित्य-चिंतन और भाषा-चिंतन विदेशी विद्वानों के विश्लेषण और निष्कर्षों से मुक्त देशी जमीन पर खड़ा है। फलतः भारतीय संस्कृति की, संस्कृत साहित्य की मानवतावादी परंपरा और हिंदी की जातीय परंपरा को प्रतिष्ठित करने के महाभियान में उन्होंने मार्क्सवादी अथवा गैर-मार्क्सवादी आलोचकों द्वारा फैलाई गई भ्रांतियों का निराकरण किया है। भले ही इस प्रक्रिया में उन्हें दक्षिण और वाम दोनों पंथियों का विरोध क्यों न सहना पड़ा हो, वे दृढ़ता से विचार को ठोस प्रमाणों के आधारों पर प्रतिष्ठित करने में संलग्न रहे। हिंदी आलोचना में नवजागरण की अवधारणा को, हिंदी जाति की संकल्पना को प्रतिष्ठित करने वाले डॉ. रामविलास शर्मा एक ओर तो साम्राज्यवाद विरोध में संलग्न रहे दूसरी ओर "आचायों के सिर भिड़ाते हुए एक को दूसरे से बड़ा सिद्ध करने की" जो प्रवृत्ति हिंदी आलोचना में सक्रिय हो गई थी उसके विरोध में। रचना और रचनाकार की बारीक से बारीक अर्थ-ध्वनि पकड़ लेने की डॉक्टर रामविलास शर्मा की अद्भुत क्षमता और साहित्य की प्रगतिशील परंपरा के अवगाहन में उनकी निष्ठा के प्रति कृष्णदत्त जी में गहरी आस्था थी। प्रस्तुत पुस्तक के निबंध उसी आस्था एवं निष्ठा का परिणाम हैं।

 

लेखक परिचय

 

कृष्णादत पालीवाल (4 मार्च 1943-8 फरवरी 2015) जन्म: सिकंदरपुर, जिला फर्रुखाबाद, उत्तर प्रदेश। दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष रहे जापान के तोक्यो यूनिवर्सिटी ऑफ फरिन स्टडीज में विजिटिंग प्रोफेसर तथा सस्ता साहित्य मण्डल प्रकाशन के सचिव रहे। प्रमुख पुस्तकें महादेवी की रचना प्रक्रिया सर्वेश्वर और उनकी कविता रामचंद्र शुक्ल का चिंतन जगत् भवानी प्रसाद मिश्र का काव्य संसार हिंदी आलोचना के सैद्धांतिक आधार हिंदी आलोचना के नए वैचारिक सरोकार डॉ. अंबेडकर और समाज व्यवस्था सीय राम मय सब जग जानी जापान में कुछ दिन डॉ. अंबेडकर, भारतीय समाज और दलित साहित्य उत्तर आधुनिकता की और भक्ति काव्य से साक्षात्कार अज्ञेय होने का अर्थ नवजागरण और महादेवी वर्मा की रचना कर्म: स्वी विमर्श के स्वर अज्ञेय कवि-कर्म का संकट सृजन का अंतर्पाठ उत्तर आधुनिकतावाद और दलित साहित्य अज्ञेय विचार का स्वराज दलित साहित्य के बुनियादी सरोकार हिंदी आलोचना का उत्तर आधुनिक विमर्श हिंदी का आलोचना पर्व आलोचक अज्ञेय की उपस्थिति अज्ञेय: अलीकी का आत्मदान अज्ञेय (प्रकाशन विभाग, भारत सरकार, 2012) निर्मल वर्मा : उत्तर औपनिवेशिक विमर्श अज्ञेय स्वातंत्र्य की खोज अज्ञेय के सामाजिक- सांस्कृतिक सरोकार हिंदी आलोचना का समकालीन परिदृश्य दलित साहित्य विमर्श हमारे समय में गांधी शास्त्र से ऊपर लोक आधुनिक हिंदी साहित्य सामाजिक-सांस्कृतिक विमर्श उत्तर समय और रचनाकर्म का संकट । साहित्य अकादेमी की भारतीय साहित्य के निर्माता ग्रंथमाला के अंतर्गत सुमित्रानंदन पंत; सर्वेश्वरदयाल सक्सेना; गिरिजा कुमार माथुर, निर्मल वर्मा तथा मनोहर श्याम जोशी पर विनिबंध। मैथिलीशरण गुप्त रचनावली (12 खंड) तथा अज्ञेय रचनावली (18 खंड) का संपादन। पुरस्कार/सम्मानः राममनोहर लोहिया अतिविशिष्ट सम्मान, 2005, उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान सुब्रह्मण्यम भारती सम्मान, 2005, केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा साहित्यकार सम्मान 2006-2007, हिंदी अकादमी, दिल्ली विश्व हिंदी सम्मान 2007- आठवाँ विश्व हिंदी सम्मेलन, न्यूयॉर्क, अमेरिका राइटर इन रेजीडेंसी फैलोशिप, साहित्य अकादेमी, दिल्ली माखनलाल चतुर्वेदी सम्मान, 2011, मध्य प्रदेश हिंदी अकादेमी, भोपाल प्रमोद वर्मा आलोचना सम्मान, 2010, छत्तीसगढ़।

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