भूमिका
भारत में स्वाधीनता के लिए संघर्ष का इतिहास स्वर्णिम अक्षरों में उसी दिन से लिखना आरम्भ हो गया था जिस दिन विदेशी आततायियों ने भारत की पावन भूमि पर पहली बार कदम रखा था और यह सतत चलता रहा 1947 में स्वाधीनता की प्राप्ति तक। इस देश की सांस्कृतिक जीवंतता और समृद्धि को बनाये रखने के लिए न जाने कितने वीर वीरांगनाएं इस पर न्यौछावर हो गए जिनके बलिदान की गाथाएं इस देश की स्मृति में व्याप्त हैं। भारत पर कितने भी आक्रमण हुए हों, कितनी भी बार विदेशी आक्रांताओं ने इसे झुकाने या तोड़ने की कोशिश की हो, पर ये देश कभी झुका नहीं, हर बार नवीन चेतना के साथ उठ खड़ा हुआ और उनका सामना किया। राष्ट्रीय एकता और अखंडता को बचाये रखने के लिए इस देश ने अप्रतिम बलिदान दिए हैं। जब हम कहते हैं कि "माता भूमि पुत्रोऽहं पृथिव्या" अर्थात् पृथ्वी मेरी माता है और मैं उसकी संतान हूँ, तब हम इस देश के संस्कार को जी रहे होते हैं। राष्ट्रीय चेतना के लिए यह मंत्र पर्याप्त है क्योंकि हम उससे भावनात्मक रूप से जुड़ चुके होते हैं और यही कारण है कि भारतीय स्वातंत्र्य समर केवल राजनीतिक क्रांति नहीं था, बल्कि यह सांस्कृतिक आक्रमण के विरुद्ध सबल भारतीय प्रतिरोध था जो राष्ट्रीय चेतना से अनुप्राणित था। जब भी भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का उल्लेख आता है तो सबसे पहले मस्तिष्क में 1857 की क्रांति, महात्मा गांधी, भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, सुभाष चंद्र बोस जैसे स्वतंत्रता सेनानियों के चित्र कौंधने लगते हैं लेकिन उससे शताब्दियों पहले भी इस देश में अलग-अलग स्थानों पर भिन्न-भिन्न आक्रमणकारियों के साथ सतत संघर्ष चल रहा था। ऐसे ही एक संघर्ष की नायिका बनीं उल्लाल की रानी अब्बक्का चौटा, जिन्होंने 16वीं शताब्दी में पुर्तगालियों के आक्रमण का सफल प्रतिकार किया। 15वीं शताब्दी में चौटा वंश स्वतंत्र तटीय शक्ति के रुप में सामने आया। उससे पहले उल्लाल पर अलुपा वंश ने शासन किया। 10वीं से 13 वीं शताब्दी के दौरान उल्लाल में जैन धर्म का प्रभाव बढ़ा। 14वीं-15वीं शताब्दी में उल्लाल पर विजयनगर साम्राज्य का नियंत्रण हो गया। विजय नगर साम्राज्य दक्षिण भारत का सबसे शक्तिशाली राज्य था जो अपनी समृद्धि, वास्तुकला और व्यापार के लिए प्रसिद्ध था। इसकी नींव 1336 ई. में हरिहर तथा बुक्का नामक दो भाइयों ने स्वामी विद्यारण्य की प्रेरणा से रखी थी। राजा कृष्णदेव राय ने इसे चरमोत्कर्ष तक पहुँचाया। वे विजय नगर साम्राज्य के पाँचवें शासक थे। उनका शासनकाल तेलुगु साहित्य और स्थापत्य कला का स्वर्ण युग था। विजय नगर साम्राज्य में हिन्दू संस्कृति, कला और व्यापार को बढ़ावा मिला। इस दौरान यहाँ मंदिरों के निर्माण हुए। व्यापार और प्रशासनिक व्यवस्थाएं मजबूत हुई। कृष्णदेव राय के शासन के पश्चात् अच्युतदेव राय ने इसकी प्रशासनिक स्थिरता को संजोये रखा। विजय नगर साम्राज्य के अंतिम शासक सदाशिव राय थे लेकिन सत्ता आलिया रामराय के हाथों में रही, जो कृष्णदेव राय के दामाद थे। आलिया राम राय का वास्तविक नाम अरविदु रामराय था।
प्रस्तावना
इतिहास केवल तिथियों, युद्धों अथवा विजयों की श्रृंखला नहीं होता वह एक सभ्यता की स्मृति होता है जो किसी भी देश को उसकी मुख्य धारा, उसकी जड़ों से अवगत करवाता रहता है। भारतवर्ष का इतिहास ऐसे ही वीर वीरांगनाओं की गाथाओं से सुसज्जित है जिन्होंने अपने अदम्य साहस, तेजस्विता और राष्ट्रभक्ति से इतिहास के पृष्ठों में अमिट छाप छोड़ी है लेकिन भारतीय इतिहास की यह विडंबना रही है कि औपनिवेशिक तथा उपनिवेशोत्तर इतिहास लेखन में उन क्षेत्रीय नायक नायिकाओं की भूमिका को या तो उपेक्षित किया गया अथवा उन्हें परिधीय विमर्शों तक सीमित कर दिया गया जिन्होंने अपनी भौगोलिक परिधियों के अंतर्गत ही सही परन्तु स्थानीय समाज को संगठित कर राष्ट्रीय चेतना का बीजारोपण किया। इन अल्पज्ञात स्वतंत्रता सैनानियों में ही एक रानी थी रानी अब्बक्का चौटा, जो 16वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में दक्षिण भारत के तटीय क्षेत्र तुलुनाडु की शासिका थीं। 16वीं शताब्दी भारत के लिए निर्णायक कालखंड था। यह वह युग था जब पश्चिम से आई व्यापारिक शक्तियाँ धीरे-धीरे भारत की समुद्री सीमाओं पर नियंत्रण स्थापित कर रही थीं। विशेषतः पुर्तगालियों ने गोवा, कोच्चि, कालिकट जैसे बंदरगाहों पर आधिपत्य जमाया और 'समुद्री कर' जैसे अकल्पनीय नियम लागू किए। इन विदेशी आक्रांताओं के सामने भारतीय तटीय राजाओं में से बहुतों ने या तो आत्मसमर्पण कर दिया या संधियों के माध्यम से अपनी स्वतंत्रता को गिरवी रख दिया। परंतु उल्लाल की रानी अब्बक्का इस अपवाद का प्रतीक बनी। रानी अब्बक्का केवल एक शासक नहीं थीं. वे एक दूरदर्शी रणनीतिकार, सांस्कृतिक रक्षक और धार्मिक सहिष्णुता की मिसाल थीं। उनका शासन, सैन्य संगठन, सामाजिक समरसता और पुर्तगालियों के खिलाफ लंबे समय तक चले संघर्ष, उन्हें एक महान राजनीतिक नेतृत्व के रूप में स्थापित करते हैं। उनकी रणनीतियाँ आज भी गुरिल्ला युद्ध कौशल, सागरी प्रतिरोध, और स्थानीय नेटवर्किंग की दृष्टि से अध्ययन योग्य हैं। अब्बक्का का सबसे महत्वपूर्ण गुण यह था कि उन्होंने अपनी स्वतंत्रता को आत्मगौरव से जोड़ा, और वह भी उस समय जब एक महिला का राजनीतिक और सैन्य नेतृत्व असाधारण माना जाता था। वे भारत की उन पहली महिलाओं में थीं जिन्होंने औपनिवेशिक ताकतों को संगठित रूप से चुनौती दी और लंबे समय तक उन्हें अपने राज्य से दूर रखा। रानी अब्बक्का का ऐतिहासिक मूल्यांकन केवल एक वीरांगना के रूप में किया जाना सीमित दृष्टिकोण होगा। वे एक दूरदर्शी शासिका थीं, जिन्होंने अपने शासन में धार्मिक सहिष्णुता, सामुदायिक एकता और प्रशासनिक दक्षता का परिचय दिया। उनका सैन्य प्रतिरोध केवल बलप्रयोग नहीं था, बल्कि उसमें रणनीतिक संयोजन, समुद्री शक्ति का उपयोग, स्थानीय व्यापारियों और बहुजातीय समुदायों के सहयोग जैसी संरचनाएं भी शामिल थीं। उनका संघर्ष यह स्पष्ट करता है कि भारत में उपनिवेशवाद के विरुद्ध संगठित प्रतिरोध केवल 18वीं-19वीं शताब्दी तक सीमित नहीं था, बल्कि उसकी जड़ें कहीं गहरे इतिहास में थीं।
लेखक परिचय
अर्पणा चित्रांश ने स्नातकोत्तर की शिक्षा डॉक्टर भीमराव अम्बेडकर विश्वविद्यालय, आगरा से ग्रहण की है। वाणिज्य की विद्यार्थी होने के साथ ही साहित्यिक रूचि के चलते सामाजिक व समसामयिक विषयों पर छुटपुट लेखन। दूरदर्शन द्वारा निर्मित 'स्वराज' धारावाहिक की शोधकर्ता के रूप में आपने प्राथमिक व महत्त्वपूर्ण स्रोतों पर कार्य किया। सम्प्रति दिल्ली में संस्कृति मंत्रालय व सेंटर फॉर एडवांस्ड रिसर्च ऑन डेवलपमेंट एंड चेंज के तत्वावधान में चल रहे 'क्रान्तितीर्थ' परियोजना में शोधकर्ता के रूप में भी आपका संबद्ध है। स्वाधीनता के अमृत महोत्सव ने देश के लिए अपना सर्वस्व लुटाने वाली महिलाओं की जीवनगाथा का अवगाहन करने का अवसर प्रदान किया। इनमें से कुछ चयनित यशस्वी महिलाओं के जीवनवृत्त को संकलित कर पुस्तकाकार देने का लेखिका का यह प्रथम प्रयास है।
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