सच्चिदानन्दधन परमात्मा परब्रह्म का अंश होने पर भी जीवात्मा मायाजवनिका के कारण अज्ञानवश स्वयं को मायापरिच्छिन्न मानता हुआ अपने स्वरूप का विस्मरण कर बैठता है। यद्यपि परमात्मा पर-ब्रह्म की भौति जीवात्मा पिण्डविशिष्ट स्वयं की चिरकालिक सत्ता को अनुभवगम्य नहीं बना पाता, तथापि 'आत्मा वै जायते पुत्रः' इस श्रुतिवचन तथा 'स पूर्वेषामपि गुरुः कालेनानवच्छेदात्' इस योगसूत्रवचन के प्रमाणानुसार परम्परया उसे अपने चिरकालिक सत्यस्वरूप का भान तो हो ही जाता है। जीवात्मा की चेतनता उसे आजीवन आप्यायित करती रहती है। परमात्मा, परन्ब्रह्म के चिद्घनत्व का साक्षात्कार जीवात्मा को होता रहता है। वह अस्ति एवं भाति के त्रिकालाबाधितत्व को परम्परया अनुभूत करता रहता है। यदि अनुभूति पक्ष का निरन्तर निरवच्छिन्न पथिक नहीं बन पाता है, तो वह है आनन्द। कभी-कभी झलक भर मिल जाती है इसकी हमें। 'सजूः' नहीं बन पाता है यह चेतना की भाँति। प्रकृति में अनवरत रूप से जायमान षड्भावविकार का चक्र परिवर्तन की एक प्रक्रिया है। जिसके प्रति सांसारिक राग उत्पन्न होता है, रागी में उसके अपाय की आशंका से ही द्वेष आविर्भूत हो जाता है। राग और द्वेष एक सिक्के के दो पटल हैं। इन्हीं का नाम द्वन्द्व है। जीवात्मा राग से सुख तथा द्वेष से दुःख की अनुभूति करता है। ये दोनों स्थिर नहीं हैं। दुःख सुख में और सुख दुःख में परिवर्तित होता रहता है। सुख और दुःख दोनों चिरस्थायी नहीं हैं। जीवात्मा जिस पक्ष में सुखप्राप्ति की मान्यता निर्धारित करता है, उसके प्रति मित्रभाव तथा जिस पक्ष से दुःखप्राप्ति की मान्यता ठहराता है, उसके प्रति उसका शत्रुभाव बन जाता है। इसी प्रकार जीवात्मा को जय-पराजय, लाभ-हानि, शीतोष्ण इत्यादि द्वन्द्वों की चपेट में घर दबाती है प्रकृति। फलतः जीवात्मा सुख की अजस्त्र अनुभूति से वंचित रह जाता है बेचारा। यद्यपि राजा-महाराजाओं के निकट सुख प्रदान करने वाले साधनों का प्राचुर्य रहा आया है, तथापि त्रिकालाबाधित सुख की अजस्त्र अनुभूति तो उन्हें भी खपुष्पायित बनकर ही रह गई। इसी त्रिकालाबाधित सुख का नाम है- आनन्द। इसे प्राप्त कर जीवात्मा धन्यधन्य हो जाता है। किन्तु वह तो भ्रान्तिवश द्वन्द्वात्मक सुख के अन्वेषण द्वारा आत्मतृप्ति करना चाहता है। फलतः कालान्तर में सुख का प्रतिद्वन्द्वी दुःख उसके सम्मुख उपस्थित हो जाता है। महाकवि कालिदास ने सुख एवं दुःख के निरन्तर परिवर्तन की उपमा चक्र के अरों की चलायमान गति के साथ दी है, जो समान भाव से ऊपर या नीचे स्थिर नहीं रह पाते हैं- 'चक्रवत् परिवर्तन्ते दुःखानि च सुखानि च'। परमात्मा परब्रह्म आनन्दमय है। आनन्द का कोई प्रतिद्वन्द्वी भाव नहीं रहता। यह त्रिकालाबाधित है। यह प्राकृतिक सम्पदाओं से अप्राप्य है। यह इन्द्रियजन्य नहीं है। कोई क्षण ऐसा आता है जब जीवात्मा इसकी अनुभूति सच्चिदानन्दघन परमात्मा परब्रह्म से जुड़कर कर लेता है।
इसी आनन्द को पाने के लिए जीवात्मा में बाल्यावस्था से लेकर मरणपर्यन्त व्याकुलता बनी रहती है। वह क्रीडनक, सुन्दर भार्या एवम् अतुल सम्पत्ति में आनन्दानुसन्धान करता है। अनेकजन्मसंसिद्ध साधक को ही आनन्दप्राप्ति का सत्य मार्ग दृष्टिपथ में आता है। प्रत्येक जीवात्मा अपने में किसी अज्ञात न्यूनता एवम् असन्तोष का निरन्तर अनुभव करता रहता है। यही कारण है कि वह एक वस्तु को छोड़ दूसरी का अवलम्बन करने हेतु प्रयत्न करता आया है। शिशु-पीड़ा की भाँति उसे विदित नहीं होता कि उसकी तड़प कहाँ और किसके लिए है। वह कौन सा तत्त्व है जिसे वह पाना चाहता है, जिसे पाकर उसकी सभी अपूर्णताएँ समाप्त होंगी और वह पूर्णता की सीमा का संस्पर्श कर आप्यायित हो सकेगा।
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