पुस्तक परिचय
रस सिद्धांत काव्यशास्त्रीय चिंतन की धुरी है और इसके केन्द्र में है-सहदय, सामाजिक। जितना महत्त्वपूर्ण रस सिद्धांत है, उतना ही महत्त्वपूर्ण सहदय सामाजिक है। रस की व्यष्टि से समष्टि में व्याप्ति का रसैयता और अनुभविता भी यही सहृदय-सामाजिक है। वही प्रेक्षक-दर्शक श्रोता-पाठक की भावभूमि पर सक्रिय रहता हुआ लोक के धरातल पर व्यापक समाज के निर्माण में अपनी भूमिका निभाता है। इस रूप में यदि रस की व्याप्ति सहृदय-समाज में झंकृति पैदा नहीं करती, तो वह व्याप्ति निरर्थक है। यदि यह मान लिया जाए कि 'कहीं भी खत्म कविता नहीं होती' तो उत्तर-आधुनिकता के माल रोड पर खड़ा सामाजिक अब भी रसाभिलाषी है। कविता को साहित्यिक विधाओं के पर्याय के रूप में मानते हुए रस से शास्त्रीयता की केंचुली उतार कर कहा जाए तो कहना होगा कि काव्य अथवा साहित्य के माध्यम से जिस विशिष्ट अनुभव का निर्माण समाज अथवा सामाजिक में होता है, वही रस है। रस शाश्वत है, उसका आस्वाद युग की चित्तवृत्तियों के अनुरूप भिन्न-भिन्न हो सकता है। सहदय के चित्त का रस चर्वणा की प्रक्रिया में अहं स्थान है। सारी शास्त्रीय मंथन क्रिया अन्ततः सहृदय की साक्षी रूपता में ही अपना निहितार्थ प्राप्त करती है। इस अर्थ में कहा ज उठता है कि जब तक साहित्य का मूल सरोब ज का परिष्कार रहेगा, रस चिंतन की प्रासंगित रहेगी।
लेखक परिचय
डॉ. वीरेन्द्र भारद्वाज शैक्षिक उपलब्धियाँ एम.ए. (हिन्दी), दिल्ली विश्वविद्यालय एम. फिल., दिल्ली विश्वविद्यालय पी-एच. डी., दिल्ली विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग, शिवाजी कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय में दस शैक्षिक वर्षों से अध्यापनरत प्रकाशन अग्नि सागर : संवेदना और शिल्प रस की सामाजिक भूमिका हिन्दी के मिथक केन्द्रित प्रबंध काव्यों में मानव मूल्य काव्य गौरव, दिल्ली विश्वविद्यालय द्वारा निर्धारित बी. काम (पास) हिन्दी 'ख' की पाठ्य पुस्तक (सम्पादित) गद्य सुबोध दिल्ली विश्वविद्यालय द्वारा निर्धारित नये पाठ्यक्रम बी.ए. (प्रोग्राम) प्रथम वर्ष की हिन्दी अनुशासन की पाठ्य पुस्तक (सम्पादित) 'मूल्य चिंतन और हिन्दी काव्य' विषय पर विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की बृहत् शोध परियोजना पर शोधरत विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं एवं पुस्तकों में लेख/साक्षात्कार प्रकाशित
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