परिवार और समाज की टूटती हुई परम्पराओं को जोड़ने के लिए ध्यान में रखकर विशेषरूप से ग्रन्थ तैयार किया है। जिससे समाज में प्रत्येक व्यक्ति शुभकर्मों में प्रेरित होकर कर्मसिद्धान्त में आस्था रखकर सुख और शान्ति से जीवन व्यतीत कर सके।
योग एवं अध्यात्म में, भारतीय संस्कृति में, लेखन में तथा शोध में रुचि होने के कारण आपके राष्ट्रीय तथा अन्तर्राष्ट्रीय और यूजीसी केयर लिस्टेड शोध-पत्रिकाओं में अनेक शोध-पत्र तथा आलेख प्रकाशित हो चुके हैं। इसी लेखन-श्रृंखला का परिणाम यह 'पुनर्जन्म' नामक ग्रन्थ का सम्पादन भी है। आपका संकल्प 'योगयुक्त तो रोगमुक्त' का है, आप अनेक नगरों तथा संस्थानों में योग-शिविर लगाती रहती हैं। राष्ट्रीय/अन्तर्राष्ट्रीय शोध-सम्मेलनों में शोधपत्रों के माध्यम से योगविद्या का प्रचार-प्रसार करती हैं। अतएव विद्वत्-मण्डली ने आपको अनेकत्र सम्मानित किया है।
वेदोऽसि येन त्वं देव वेद देवेभ्यो वेदोऽभवस्तेन महां वेदो भूयाः।
देवा गातुविदो गातुं वित्त्वा गातुमित। मनसस्पतऽइमं देव यज्ञं स्वाहा वाते धाः ॥ वेदेन रूपे व्यपिबत् सुतासुतौ प्रजापतिः। ऋतेन सत्यमिन्द्रियं विपानं शुक्रमन्ध-सऽइन्द्रस्येन्द्रियमिदं पयोऽमृतं मधु॥ तस्माद्यज्ञात्सर्वहुत ऋचः सामानि जज्ञिरे।
छन्दो ह जज्ञिरे तस्माद्यजुस्तस्मादजायत।।
एवं वेदों की महिमा और उनका वर्णन बहुत विशाल है। न केवल वेदसंहिताओं के अन्तर्गत ही वेदों की महिमा का वर्णन है, अपितु ब्राह्मणादि वैदिकग्रन्थों में तथा लौकिक काव्यों में भी वेदों के सर्वज्ञानमय होने के कारण स्थान-स्थान पर उनकी महत्ता दिखायी गयी है।
इसमें सन्देह नहीं कि कहा जाता है इस देश में विशेषतः हिन्दु (आर्य) जाति में कर्म-सिद्धान्त, पुनर्जन्म और परमात्मा की सत्ता आदि विषय जाति के घरेलू जीवन के अंग से बन गये हैं। किन्तु कितने आश्चर्य का विषय है कि जिस जाति ने संसार में सबसे पहले कर्म-सिद्धान्त का आविष्कार किया, जो जाति अपने को समष्टिरूप से आस्तिक कहती है, वही इस समय संसार में सबसे अधिक अकर्मण्य जाति समझी जाती है। इसका कारण यही है कि हम दार्शनिक सिद्धान्तों को अपने नैतिक जीवन में कोई स्थान नहीं देते। हमसे कहीं अधिक उत्तम उन पाश्चात्य भौतिकवादियों का जीवन है, जो भौतिक जगत् के अतिरिक्त अन्य किसी प्रकार की सत्ता स्वीकार नहीं करते। किन्तु जिसकी सत्ता स्वीकार करते हैं, उसके ज्ञान के लिये पूर्णरूप से प्रयत्न करते हैं। यही नहीं, किन्तु भौतिक विज्ञान के पीछे कितने ही सत्यनिष्ठ व्यक्तियों ने अपने जीवन अर्पण कर दिये। एक हम हैं कि कहने को तो ब्रह्म से इधर की बात भी नहीं करेंगे, किन्तु ब्रह्म क्या है, इसे जानने के लिये दिन रात में 5 मिनिट समय भी नहीं देंगे। इसका नाम सत्यनिष्ठा नहीं है।
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