मंच पर मेरा प्रथम पदार्पण वर्ष 1975 में हायर सेकेण्डरी के दौरान हुआ था। तब मैंने विद्यालय के वार्षिकोत्सव समारोह में महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' की 'भिक्षुक' कविता का पाठ अपनी वाणी में प्रस्तुत किया था। उसी वर्ष अर्थात् 1975 में मैंने कालेज आफ वोकेशनल स्टडीज में स्नातक डिग्री के लिए प्रवेश प्राप्त कर लिया था। धीरे-धीरे मैं वहां के प्रांगण में निर्धारित समयावधि पर आयोजित कराई जाने वाली हिन्दी वाद-विवाद प्रतियोगिताओं एवं साहित्यिक गतिविधियों में सहभागिता दर्ज कराने लगा था। उन्हीं दिनों कालेज की हिन्दी साहित्य परिषद के परामर्शदाता डॉ. हरीश नवल ने मेरे सीनियर श्री तरुण चडढा को अपने साथ हिन्दी की अंतर महाविद्यालय वाद-विवाद प्रतियोगिताओं में सहभागी बनाकर ले जाने को निर्देशित किया था और यह सफर अगले ही पल से कुलांचें भरने के साथ गतिमान हो चला था। इन प्रतियोगिताओं के दौरान अन्य कालेजों से आने वाले प्रतिभागियों में श्री दिनेश लखनपाल, श्री दिनेश शाकुल सक्सेना, श्री विवेकानंद, श्री रजत शर्मा, श्री नानक चंद, श्री राकेश तिवारी, सुश्री पिंकी आनंद, श्री देवेन्द्र रस्तोगी प्रमुख थे। द्वितीय और तृतीय वर्षों के दौरान मुझे कालेज की हिन्दी साहित्य परिषद के सचिव पद पर नियुक्त कर दिया गया था। इस दौरान कालेज के प्रांगण में आयोजित की जाने वाली हिन्दी की सभी प्रतियोगिताओं, गोष्ठियों एवं परिचर्चाओं के आयोजन संबंधित प्रक्रियाओं के नियोजन, संयोजन, निरूपण तथा क्रियान्वयन की जिम्मेदारी मेरे सुपुर्द थी। इस दौरान हिन्दी साहित्य जगत की नामचीन हस्तियों श्री शमशेर बहादुर सिंह, श्री जैनेन्द्र कुमार, डॉ. विजयेन्द्र स्नातक, बाबा नागार्जुन, श्री हजारी प्रसाद द्विवेदी, श्री कन्हैयालाल नंदन, डॉ. शेरजंग गर्ग, डॉ. अजित कुमार, श्री रमानाथ अवस्थी, श्री मधुर शास्त्री इत्यादि को सुनने और उनका साक्षात्कार पाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था। हमारे महाविद्यालय में आयोजित की जाने वाली प्रतियोगिताओं में निर्णायकों की भूमिका का निर्वहन अक्सर आकाशवाणी और दूरदर्शन से आए अधिकारी किया करते थे। डॉ. हरीश नवल ने मुझे उनके अधिकार क्षेत्र में आने वाले कार्यक्रमों के सिलसिले में उनसे जाकर मिलने के लिए प्रोत्साहित किया था। बस फिर क्या था? जहां एक ओर, दिल्ली विश्वविद्यालय के कालेजों में होने वाली अंतर महाविद्यालय वाद-विवाद प्रतियोगिताओं तथा अपने कालेज में आयोजित की जाने वाली काव्य गोष्ठियों एवं परिचर्चाओं में सहभागिता बढ़ती जा रही थी। वहीं दूसरी ओर, आकाशवाणी दूरदर्शन पर प्रत्येक माह उनके द्वारा दिए गए विषयों पर स्क्रिप्ट लेखन तथा अपनी ही वाणी में उनकी प्रस्तुति का क्रम तेजी से गति पकड़ता जा रहा था। विभिन्न क्लिष्ट और विचित्र विषयों पर कार्यक्रम के प्रसारण के लिए 23-25 मिनट का समय तय रहता था। धीरे-धीरे मैंने अपनी योग्यता के आधार पर प्रोड्यूसर्स के मध्य एक विशिष्ट स्थान बना लिया था। अब मेरे अधिकतर कार्यक्रमों की रिकॉर्डिंग वीआईपी स्टाइल में होने लगी थी। ऐसा इसे इसलिए कहा जाता था कि जिस दिन कार्यक्रम के प्रसारण का दिन तय होता था, उसी दिन उसकी रिकार्डिंग प्रक्रियाओं को परिपूर्ण करने के साथ उसे ब्रोडकासटिंग अर्थात् प्रसारण के लिए तैयार करके प्रस्तुत कर दिया जाता था। मुख्यतः आकाशवाणी में डॉ. कमला भारती, डॉ. अचला शर्मा और श्रीमती करूणा श्रीवास्तव तथा दूरदर्शन में श्री आनंद शिवपुरी (फिल्म अभिनेता श्री ओम शिवपुरी, ज्ञान शिवपुरी एवं हिमानी शिवपुरी के सगे भाई) मेरे कार्यक्रमों के प्रोड्यूसर्स थे। इस दौरान मैंने कई नामचीन हस्तियों का साक्षात्कार भी लिया था, जिनमें सुविख्यात फिल्म अभिनेता श्री बलराज साहनी के भाई और भविष्य में कालजयी 'दमन' और 'तमस' से ख्याति प्राप्तकर्ता साहित्यकार श्री भीष्म साहनी, सुविख्यात समीक्षक डॉ. विजयेन्द्र स्नातक, सुप्रसिद्ध कहानीकार डॉ. लक्ष्मी नारायण लाल, डॉ. श्रीलाल शुक्ल, शिक्षाविद् एवं लेखक डॉ. वेदज्ञ आर्य, उस समय भारत सरकार में केंद्रीय निर्माण एवं आवास मंत्री श्री राम किंकर, राम मनोहर लोहिया अस्पताल के मेडिकल सुपरिटेंडेंट डॉ. पाठक, हैंडिक्राफ्ट कमीशनर तथा अनेकानेक जाने-पहचाने विविध क्षेत्रों के प्रमुख हस्ताक्षर सम्मिलित थे। उस समय से काफी वर्षों की समयावधि तक इन सभी कार्यक्रमों की रिकॉर्डिंग मेरे पास आडियो कैसेट के रूप में सुरक्षित थी। समय के अंतराल में यह आडियो कैसेट के भीतर की टेप आपस में चिपक कर खराब हो गई थी।
कुमार सुबोध 1. दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक डिग्री (1975-78) 1 2. निरंतर दो वर्षों तक अपने महाविद्यालय की हिंदी साहित्य परिषद् का चयनित सचिव (1976-78) 1 3. स्नातक (1975) के प्रारंभिक वर्ष से ही आल इंडिया रेडियो के युववाणी विभाग तथा दिल्ली दूरदर्शन पर निरंतर 20 वर्षों तक विभिन्न विषयों पर स्क्रिप्ट लेखन एवं उनकी अपनी वाणी में प्रस्तुति। 4. वर्ष 1980 में 'कुमार सुबोध' के नाम से दैनिक 'नवभारत टाइम्स' के रविवारीय परिशिष्ट में पहला लेख प्रकाशित हुआ था। वर्तमान में भी विषय प्रतिपादित स्वतंत्र लेखन का यह उपक्रम विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से जारी है। 5. निजी बैंकिंग क्षेत्र के अग्रणी आई सी आई सी आई बैंक से 35 वर्षों की सेवा पश्चात् सीनियर अधिकारी के पद से वर्ष 2016 में सेवानिवृत्त । 6. चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय से विधि संकाय में स्नातक डिग्री LL.B (2015-2018) 1 7. तत्पश्चात, वर्ष 2019 से भारतीय अधिवक्ता संघ में पंजीकृत अधिवक्ता । 8. कोरोना महामारी के दौरान अपने ही महाविद्यालय के विद्यार्थियों को डिजिटल कक्षा के माध्यम से बैंकिंग लॉ तथा टैक्सेशन के विषयों में अध्यापन किया (2020-2021)1 9. वर्ष 2021 से नरेशचंद्र जोशी द्वारा निर्देशित 'दि मैजिक मैन एन चंद्रा' पटल पर व्यंग्य-ऋषि डॉ. हरीश नवल की अध्यक्षता में निरंतर प्रदर्शित हो रहे डिजिटल साप्ताहिक कार्यक्रम 'गजब साहित्यकारों के अजब किस्से' में सहभागिता रही थी, जिसकी 114 कड़ी पूर्ण हुई थी। इसने एक विश्व कीर्तिमान बना लिया था। 10. अब यह श्रृंखला एक नए कलेवर में नए शीर्षक 'साहित्य कला संस्कृति के रंग, डॉ. हरीश नवल के संग' के अंतर्गत प्रत्येक सप्ताह एक नवीन विषय आधारित चर्चा के माध्यम से 120 कड़ी पूर्ण कर चुकी है और निरंतर यह कार्यक्रम आज भी जारी है, तथा जिसमें देश-विदेश से हिंदी जगत के गणमान्य विद्वतजन हर सप्ताह बृहस्पतिवार को आनलाइन कार्यक्रम में जुड़ते हैं। 11. प्राप्त सम्मान :- हिंदी कल्चरल सेंटर, टोक्यो द्वारा वर्ष 2023 का 'विश्व हिंदी गौरव सम्मान' । विश्व कीर्तिमान प्राप्त पटल 'दि मैजिक मैन एन चंद्रा फाउंडेशन' द्वारा 'साहित्य रत्न सम्मान' । 'स्वर साघना मंच' द्वारा 'स्वर साधना गौरव सम्मान' । 'दि मैजिक मैन एन चंद्रा फेसबुक पेज एवं यूट्यूब चैनल' द्वारा 'प्रबुद्ध श्रोता सम्मान' । जापान से प्रकाशित अंतरराष्ट्रीय त्रैमासिक पत्रिका 'हिंदी की गूंज' द्वारा वर्ष 2024 का जापानी हिंदी सेवा सम्मान। नाटिंघम, यूके की 'काव्य रंग' संस्था द्वारा वर्ष 2024 में सम्मानित । जापान से प्रकाशित अंतरराष्ट्रीय त्रैमासिक पत्रिका 'हिंदी की गूंज' का वर्ष 2025 से नामित संवाददाता। 12. विशेषत :- कार्यक्रमों की मीडिया एवं पत्र-पत्रिकाओं के लिए निरंतर डिजिटल रिपोर्टिंग, विभिन्न विषयों पर केंद्रित चर्चाएं, परिचर्चाएं, साक्षात्कार, वाद-विवाद, सामूहिक चर्चाओं में सहभागिता, समीक्षा एवं विवेचनात्मक वार्तालाप, किसी भी संदर्भित विषय पर एकल वार्ता ।
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