जिज्ञासा, कौतूहल, आश्चर्य एवं दुःख, कष्ट, पीड़ा आदि समस्याओं के समाधान के लिए मनुष्य जिस चिन्तन की खोज करता हैं, प्रायः इसी प्रकार के अनुसंधित चिन्तन को ही दर्शन अथवा Philosophy कहा जाता है। चिन्तन की इस प्रकिया में मनुष्य जितने भी तरीकों की खोज करता है, ओग चलकर ये तरीके ही दर्शन की शोध प्रविधियों का रूप ले लेते है। चूंकि सभी मनुष्यों के सोचने के ढंग एक समान नहीं होते इसीलिए प्रविधियों के तरीके भी विभिन्न प्रकार के हो जाते है अथवा विभिन्न प्रकार की चिन्तन पद्धतियां हमे दिखाई देती है। ऐसे चिन्तन के प्रतिपादक के रूप में हम यूनान के दार्शनिकों में सुकरात, अरस्तू, प्लेटो एवं अन्य पश्चिमी दार्शनिक देकार्त, लाइबनित्ज, स्पिीनोजा और कान्ट, हेगेल, कार्ल मार्क्स जैसे यूरोपीयन चिन्तकों का नाम ले सकते है और महर्षि बृहस्पति, तथागत बुद्ध, वर्द्धमान महावीर, महर्षि कपिल, महर्षि पतन्जलि, महर्षि कणाद, महर्षि जैमिनी, आदिगुरू शंकराचार्य, महर्षि रामानुज जैसे एशीयन लोगों को इस श्रेणी में रख सकते है। इन सभी दार्शनिकों ने अपने बुद्धि बल से दर्शन को अनेक प्रकार की शोद्ध पद्धतियां प्रदान की है, जिनका उपयोग करके मानव प्राचीन काल से तत्त्वमीमांसीय, ज्ञानमीमांसीय एवं आचारमीमांसीय इत्यादि समस्याओं का समाधान करता आया है। दर्शन की प्रायः सभी शाखाओं का अध्ययन पद्धतियों के द्वारा ही किया जाता है, जैसे भारतीय दर्शन का अध्ययन भारतीय दर्शन की पद्धतियों के द्वारा किया जाता है तथा पाश्चात्य दर्शन का अध्ययन पाश्चात्य दर्शन की पद्धतियों के द्वारा किया जाता है। इसी प्रकार समाज दर्शन एवं धर्म दर्शन का अध्ययन भी इनकी विशेष पद्धतियों के द्वारा किया जाता है। इस प्रकार दर्शन के क्षेत्र में अध्ययन एवं अनुसंधान करने के लिए इन पद्धतियों की भूमिका बड़ी महत्त्वपूर्ण है। प्रस्तुत पुस्तक में भारतीय दर्शन, पाश्चात्य दर्शन, समकालीन पाश्चात्य दर्शन, समाज दर्शन एवं धर्म दर्शन की प्रमुख शोध पद्धतियों का वर्णन किया गया है।
यदि कोई विद्यार्थी दर्शन शास्त्र के क्षेत्र में शोध करना चाहता है, तो उसको दर्शन की इन पद्धतियों का अध्ययन अवश्य करना चाहिए, क्योंकि इनके समुचित अध्ययन से ही उसके शोध कार्य में गुणात्मकता आयेगी और उसको यह भी ज्ञान होगा कि दर्शन में सोचने एवं शोध करने के कौन-कौन से तरीके हो सकते है। प्रस्तुत पुस्तक में यही प्रयास किया गया है कि दर्शन शास्त्र विषय में शोध करने वाले शोधार्थी दर्शन की प्रमुख पद्धतियों से परिचित हो जाये और एक उत्तम शोध का चयन करके एक उत्तम शोध कार्य कर सके और इस पुस्तक के द्वारा विभिन्न विश्वविद्यालयों में पी०एच डी कार्यक्रम के अन्तर्गत संचालित कोर्स वर्क के पाठ्यक्रम को समाहित करने का प्रयास किया गया है, ताकि शोधार्थी इस पुस्तक से लाभ उठाकर अपने कोर्स वर्क को अच्छी श्रेणी के साथ उत्तीर्ण कर सके। और यहां मैं यह बात भी कहना चाहता हूँ कि संभवतः अभी तक पी० एच-डी कार्यक्रम के लिये कोई भी पाठ्यपुस्तक उपलब्ध नहीं हैं।
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