भूमिका
'कुछ ख़्वाब है कुछ अस्ल है कुछ तर्जे अदा है' असगर हुसैन असगर, उर्फ असगर गोंडवी (1884-1936) उर्दू शायरी के नवोत्थान युग की एक महत्त्वपूर्ण, किन्तु किंचित उपेक्षित कड़ी हैं। भिन्न-भिन्न स्वतंत्र लेखों के अतिरिक्त उनकी शायरी पर कोई सुनियोजित काम नहीं हो सका। हिंदी साहित्य में भी उनकी शायरी देहरी पर ही ठिठकी रही जिसका प्रमुख कारण उनकी समग्र शायरी का देवनागरी लिपि में उपलब्ध न होना है। असगर गोंडवी ने जब गजल के मैदान में कदम रखा तो उर्दू शायरी का वर्गापसरण हो रहा था। वह राजाओं के राज्याश्रय से विरहित छोटे-छोटे नवाबों की महफ़िलों तक सीमित होकर रह गई थी। उधर एक ओर साम्राज्यवादी रास्ते से आधुनिकता पंख पसार रही थी तो दूसरी ओर रुग्ण सामंती रुचि को बिलोने की जी-तोड़ कोशिश जारी थी। स्थूल, पार्थिव आवेगों की अभिव्यक्ति को शायरी से उलझाने में दिल्ली और लखनऊ, दोनों ही घराने अनुपात-भेद से अपना-अपना योगदान दे रहे थे। सामान्य रूचि के गुनीजन' की तृषानिवारण के लिए 'गुलगुली गिलमों और गलीचों' पर सुरा -चषकों की क़तार के बीच अपरिष्कृत रुचि की शायरी के दौर चल रहे थे। इस परिदृश्य को भाँपते हुए ग़ालिब जैसे उस्ताद शायर तथा हाली जैसे प्रखर चिंतक आलोचक की ग़ज़ल सम्बन्धी ऋणात्मक टिप्पणियों के पश्चात इस विधा की सम्भावनाएँ निःशेष होती प्रतीत हो रही थीं। ग़ालिब ने ग़ज़ल की 'तंग' गली को 'शौक़' की अभिव्यक्ति के लिए अपर्याप्त घोषित कर दिया था, तो हाली ने उसकी आवृत्तिमूलक प्रवृत्ति को देखते हुए उसमें 'दुर्गन्ध' अनुभव की। पद्य की सकेितिक भाषा में ही नहीं, गद्य में स्पष्टवादिता के साथ ग़ालिब अपने फ़ारसी दीवान (शायरी संग्रह) की भूमिका में स्वयं अपनीशायरी के सम्बन्ध में अनेक गर्वोक्तियों के पश्चात् लिखते हैं:- जिस दीवान पर मैंने इस कदर फ़रत्र किया है, उसका एक हिस्सा लालच यानी सजलगोई में गुजरा है और दूसरा हिस्सा लोगों की बेजा तारीफ में। मुझे अपनी इस बात पर शर्म आती है कि मैंने इतनी बड़ी सलाहियत यूँ ही ज़ायः कर दी। (हाली द्वारा फ़ारसी का भावानुवाद) इस उद्धरण में 'लालच' शब्द की संदर्भ सहित व्याख्या करने के लिए अरबी मूल के शब्द ग़ज़ल का शाब्दिक अर्थ देना पर्याप्त होगा- 'औरतों से लगावट की बातें करना।' ग़ालिब के शागिर्द अल्ताफ़ हुसैन हाली ने संभवतः राजल के आवृत्तिमूलक विषय चयन के कारण उसमें दुन्धि की शिकायत की थी। आगे चल कर उर्दू की तरक़्क़ीपसंद तहरीक (प्रगतिशील आंदोलन) के जमाने में जिगर मुरादाबादी जैसे शायर ने भी ग़ज़ल पर कटाक्ष किया- ज़िक्रे जमील ख़्वाबे परीशाँ है आजकल शायर नहीं है वो जो ग़ज़लख्वाँ है आजकल ग़ज़ल की विधा के लिए यह कुकर चुनौतियों भरा युग था। फ़िराक़ गोरखपुरी के शब्दों में यह ग़ज़ल के 'रिवाइवल' (पुनरुत्थान) का नहीं 'सर्वाइवल' (संभाल) की जद्दोजहद का जमाना था जिसपर आगे चलकर जिगर मुरादाबादी ने उपर्युक्त फ़िक़रा कसा था 'शायर नहीं है वो जो ग़ज़लख्वाँ है आजकल' । साहित्य में अभूतपूर्व रस्साकशी का दौर दौरा था। एक ओर राष्ट्रवाद की क़दमताल आरम्भ हो चुकी थी तो दूसरी ओर समुद्र पार से लौटकर आए, अल्लामा इक़बाल नीत्शे के 'सुपरमैन' को उर्दू जगत में उतारने का नवाचार कार्यक्रम पूरे उत्साह से चला रहे थे। एक दूसरी दिशा में अकबर इलाहाबादी राष्ट्रवाद की ओट में 'पुराने नुस्खों की खरल घोंट रहे थे। पंच के सुदूर कोने से चकबस्त की जवाबी स्पष्टोक्तियाँ जनमानस पर दस्तक दे ही थीं
लेखक परिचय
सुषमा भटनागर का लेखन विस्तार की अपेक्षा गहन शोध, अध्यवसाय एवं सूक्ष्म विश्लेषण का हामी रहा है। दिल्ली विश्वविद्यालय से एम. ए. और पी एच.डी. की उपाधि प्राप्त कर कुछ वर्ष लेडी श्री राम कॉलेज में अध्यापन। लोक सभा सचिवालय की समानांतर भाषांतरण सेवा में अधिकारी और फिर निदेशक के रूप में सेवानिवृत्त । तदुपरांत क्रमशः लेडी श्री राम कॉलेज एवं दिल्ली विश्वविद्यालय में अतिथि प्राध्यापक के रूप में साहित्य एवं भाषांतरण का अध्यापन । तीन आलोचनापरक पुस्तकों के अतिरिक्त उर्दू के विख्यात कहानीकार अली बाक़र के उर्दू कहानी संग्रह 'खुशी के मौसम' का हिंदी में अनुवाद, वाणी प्रकाशन से प्रकाशिता उर्दू, हिंदी ग़ज़ल पर विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में लेख एवं समीक्षाएं प्रकाशित। छात्र जीवन से ही उर्दू साहित्य में गहन रुचि होने के नाते आकाशवाणी दिल्ली की युववाणी एवं उर्दू सेवा के लिए उर्दू में फ़ीचर-लेखन, वार्ता एवं चर्चाओं में सक्रिय। पिछले अनेक वर्षों से असगर की शायरी का गहन अध्ययन एवं लेखन। उनकी शायरी पर क्रमशः दो आलेख प्रकाशित, 'लुत्फ़ जब है अपनी दुनिया आप पैदा कीजिए' (समकालीन भारतीय साहित्य, जुलाई-अगस्त 2002) तथा 'ज़माना आ रहा है जब उसे समझेंगे सब असग़र' (वाक्, वर्ष 2007, अंक2)। प्रस्तुत पुस्तक 'सब तर्जे नज़र है' उर्दू शायरी के कुछ कम पहचाने, कुछ अधिक विवादित शायर असगर गोंडवी की समग्र ग़ज़लों का प्रथम शब्दार्थ सहित संचयन है।
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