प्राक्कथन
भारत का हृदय स्थल मध्यप्रदेश सबसे अधिक समृद्ध और प्राचीन माना जाता है यह सम्पूर्ण क्षेत्र सभ्यता और संस्कृति का जननी रहा है। यहाँ विपुल पुरातत्त्वीय सम्पदा विद्यमान है। यहाँ के प्राकृतिक सम्पदा ने प्राचीन मानव की संस्कृतियों को पनपने के लिए अनुकूल परिवेश प्रदान किया। परिणाम स्वरूप मानव ने अपने विकास की प्रारम्भिक यात्रा इसी क्षेत्र से प्रारम्भ की यही कारण है कि, इस क्षेत्र पर आज भी प्राचीन संस्कृतियों के साक्ष्य पुरावशेषों के रूप में विद्यमान है। यह प्राचीन संस्कृतियां भारतीय ज्ञान परम्परा का अभिन्न अंग हैं अतः यह सम्पूर्ण क्षेत्र ज्ञान पनम्परा के प्रमाणों की दृष्टि से अत्यन्त समृद्य है। किसी भी देश के सांस्कृतिक विकास की जानकारी उस देश की स्थापत्य एवं मूर्तिशिल्प के प्रमाणों से होती है। भारतीय कला, धर्म एवं संस्कृति की मूर्त अभिव्यक्ति रही है, जहाँ व्यक्ति की सोच नहीं वरन् भारतीय समाज का सामूहिक अनुभव और चिन्तन भी व्यक्त हुआ है। कला के विभिन्न माध्यमों में मूर्तिकला निःसंदेह सर्वाधिक सशक्त और बहुआयामी रही है, जिसमें धर्म की सदैव प्रधानता रही है। भारतीय जीवन में धर्म के समान कुछ भी नहीं है, यहाँ समय-समय पर ब्राह्मण, बौद्ध, जैन आदि विविध धर्मों का विस्तार होता रहा है। भारतीय स्थापत्य एवं मूर्तिकला का इतिहास अत्यन्त प्राचीन है. जिसमें केवल देवी-देवताओं की ही नहीं वरन् अनेक धर्मेत्तर मूर्तियों को भी निर्मित किया गया है। जिन्हें भारतीय कला, धर्म एवं संस्कृति की विशेषता के रूप में पहचाना जाता है। सम्पूर्ण भारत के समान मध्य प्रदेश के सागर जिले में भी समय-समय पर विभिन्न धर्मों से संबंधित स्थापत्य एवं मूर्तिशिल्प का विकास होता रहा है, जिनमें एरण का विष्णु मंदिर, मढपिपरिया का शिव मंदिर, रहली का सूर्य मंदिर एवं इन स्थलों पर स्थापित प्रतिमाएँ, प्राचीन कला, धर्म एवं संस्कृति के जीवन्त प्रमाण हैं। उपरोक्त प्राचीन मंदिरों एवं उनमें स्थापित प्रतिमाएँ इस बात को प्रमाणित करते हैं कि सागर जिले में प्राचीन स्थापत्य एवं मूर्तिशिल्प के अन्य केन्द्र भी विद्यमान हो सकते हैं। उपर्युक्त प्रमाणों को आधार मानते हुए लेखक द्वारा सागर जिला मुख्य रूप से रहली एवं देवरी अंचल में विद्यमान प्राचीन स्थापत्य एवं मूर्तिशिल्प का अध्ययन करने हेतु उक्त शीर्षक का चयन लेखन कार्य के लिए किया गया। सागर जिले की रहती तहसील सागर जिला मुख्यालय के दक्षिण-पूर्व दिशा में जिला मुख्यालय से लगभग 42 किलोमीटर की दूरी पर 23°38'27' उत्तरी अक्षांश तथा 79°04'17 पूर्वी देशातर के मध्य में स्थित है. जो सागर-जबलपुर सड़क मार्ग पर स्थित है। इसके अतिरिक्त देवरी-गढ़ाकोटा सड़क मार्ग भी रहली तहसील से गुजरता है। रहली तहसील के उत्तर में सागर जिले की गढ़ाकोटा तहसील, उत्तर-पश्चिम में सागर तहसील, दक्षिण में सागर की देवरी एवं दमोह की तेंदूखेडा तहसील, पूर्व में दमोह तहसील तथा पश्चिम में सागर की केसली तहसील स्थित हैं। सुनार और देहार नदियों रहली तहसील के मध्य से प्रवाहित होती है। सागर जिले की देवरी तहसील सागर जिला मुख्यालय के दक्षिण दिशा में जिला मुख्यालय से लगभग 64 किलोमीटर की दूरी पर 23′2320° उत्तरी अक्षांश तथा 79°00′58″ पूर्वी देशान्तर के कय में स्थित है। देवरी तहसील के उत्तर में सागर जिले की रहली तहसील, उत्तर-पश्चिम में सागर तहसील, दक्षिण में नरसिंहपुर जिले की तेंदूखेडा, करेली एवं नरसिंहपुर तहसीलें, पूर्व में सागर जिले की केसली तहसील एवं पश्चिम में दमोह जिले की तेंदूखेडा तहसील स्थित है। देवरी तहसील के मध्य से झुनकु एवं सुखचैन नदियों प्रवाहित होती हैं। लेखक द्वारा रहली एवं देवरी तहसील के प्राचीन स्थापत्य एवं मूर्तिशिल्प का लेखन कार्य. आरम्भ करने से पूर्व उक्त क्षेत्र विशेष पर पूर्व में किये गये शोध एवं लेखन कार्यों का अध्ययन किया गया, जिसके अंतर्गत इण्डियन आर्कियोलॉजी ए रिव्यु एवं श्री एम. डी. खरे, श्री सी. बी. त्रिवेदी तथा प्रो. कृष्णदत्त बाजपेयी आदि विद्वानों के द्वारा रहली नगर, देवरी नगर, बीना, बारहा, नढ़पिपरिया आदि के कला अवशेषों पर केन्द्रित शोध कार्य प्रस्तुत किये गये। उपर्युक्त के अतिरिक्त डॉ. रायबहादुर हीरालाल जी के द्वारा रचित सागर सरोज में रहली एवं देवरी तहसीलों के पुरात्तत्त्व की संक्षिप्त जानकारी मिलती है। सागर जिला गजेटियर से रहली एवं देवरी क्षेत्रों के पुरास्थलों की संक्षिप्त जानकारी प्राप्त होती है। सागर में उपलब्ध शैव प्रतिमाओं का अध्ययन पर मंजू गौर के शोध प्रबंध एवं सागर जिले में उपलब्ध वैष्णव प्रतिमाएँ नामक शोध प्रबंध में चन्द्रभान सिंह गौर ने रहली व देवरी की मूर्तिकला का वर्णन किया है। मढ़पिपरिया के कलावशेष पर रेणु वाजपेयी द्वारा लघुशोध प्रबंध एवं बीना-बारहा के कलावशेष पर एस्तर वामला मैथ्यू द्वारा लघुशोध प्रबंधों में रहली व देवरी तहसील के प्राचीन स्थापत्य एवं मूर्तिशिल्प का संक्षिप्त वर्णन किया गया है। डॉ. मनीष मिश्र के द्वारा लिखित ग्रन्थ 'सागर जिले का सांस्कृतिक इतिहास में रहली एवं देवरी के मंदिर एवं मूर्तियों का संक्षिप्त में वर्णन किया गया है। पी. राघवन के सागर विरासत तथा विकास' में रहली के सूर्य मंदिर का विवरण मिलता है।
लेखक परिचय
डॉ. गोविन्द सिंह दांगी ने प्रारम्भिक शिक्षा विलहरा जिला सागर से प्राप्त की इसके उपरान्त स्नातक एवं स्नात्तकोत्तर प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरात्तत्त्व विभाग, डॉ. हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय सागर (म.प्र.) से प्रथम श्रेणी में उत्तरीण की। प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्त्व विभाग, डॉ. हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय से ही आपको 'सागर जिले की रहली एवं देवरी तहसील का प्राचीन स्थापत्य एवं मूर्तिशिल्प : एक अध्ययन (प्रारम्भ से बारहवीं शताब्दी ईस्वी तक) शोध विषय पर डॉक्टर ऑफ फिलासफी की उपाधी प्राप्त हुई। डॉ. दांगी को प्राचीन भारतीय संस्कृति, भारतीय कला एवं स्थापत्य में विशेषज्ञता प्राप्त है तथा पुरातत्व एवं भारतीय ज्ञान परम्परा जैसे विषयों में इनकी गहरी रूची है। इन्होंने अपने शोध के दौरान सागर जिले में लगभग 45 नवीन पुरास्थलों की जानकारी प्राप्त की। इन्होंने विभिन्न राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठियों / सम्मेलनों एवं वेवीनार में 25 से अधिक शोध पत्र प्रस्तुत किये तथा अनेक आमंत्रित व्याख्यान दिये। डॉ. दांगी के विभिन्न राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय शोध पत्रिकाओं में 15 से अधिक शोध पत्र प्रकाशित हैं। इन्होंने एक संपादित पुस्तक में सह-सम्पादक के रूप में योगदान दिया। डॉ. दांगी ने एक राष्ट्रीय वेवीनार एवं भारतीय ज्ञान परम्परा विषय पर एक राष्ट्रीय संगोष्ठी का सफल आयोजन कराया। डॉ. दांगी, मध्यप्रदेश इतिहास परिषद एवं पुराप्रवाह के स्थायी सदस्य है। वर्तमान में अवधेश प्रताप सिंह विश्वविद्यालय रीवा (म. प्र.) में, सहायक प्राध्यापक के पद पर कार्यरत हैं जहां अध्ययन अध्यापन के साथ नवीन शोध के क्षेत्र में निरन्तर कार्य कर रहे हैं।
पुस्तक परिचय
भारत के हृदय स्थल मध्यप्रदेश में स्थित सागर जिला प्राचीन काल से ही मानवीय गतिविधियों का प्रमुख केन्द्र रहा है। यह प्राकृतिक, ऐतिहासिक, पुरातात्विक एवं सांस्कृतिक आदि विशेषताओं के कारण महत्वपूर्ण स्थान रखता है। यहाँ की प्राकृतिक सम्पदा ने प्राचीन मानवीय संस्कृतियों के विकास हेतु अनुकूल परिवेश प्रदान किया। अतः इस क्षेत्र पर आज भी प्राचीन संस्कृतियों के साक्ष्य विविध पुरावशेषों के रूप में विद्यमान हैं। यह क्षेत्र ऐतिहासिक काल में अनेक राजवंशों की राजनीत्ति का प्रमुख केन्द्र रहा जिन्होंने राजनीतिक उपलब्धियों के साथ-साथ सांस्कृतिक एवं धार्मिक क्षेत्र में भी उल्लेखनीय कार्य किये जिसके प्रमाण स्थापत्य एवं मूर्तिशिल्प के रूप में दृष्टिगत होते हैं। एरण का विष्णु मंदिर, मढ़पिपरिया का शिव मंदिर, रहली का सूर्य मंदिर एवं इन स्थलों पर स्थापित प्रतिमाएँ तत्कालीन समय की प्राचीन कला, धर्म एवं मंदिरों एवं उनमें स्थापित प्रतिमाएँ इस बात को प्रमाणित करते हैं कि सागर जिले में प्राचीन स्थापत्य एवं मूर्तिशिल्प संबंधी अन्य केन्द्र भी विद्यमान हो सकते हैं। सकी परसंस्कृति के जीवन्त प्रमाण हैं। उपरोक्त प्राचीउपर्युक्त प्रमाणों को आधार मानते हुए सागर जिले की दो (रहली एवं देवरी) तहसीलों में विद्यमान प्राचीन स्थापत्य एवं मूर्तिशिल्प संबंधी स्थलों का सर्वेक्षण कर अनेक नवीन (स्थापत्य एवं मूर्तिशिल्प संबंधी) पुरास्थलों की खोज एवं उनका अध्ययन कर नवीन जानकारी को उक्त पुस्तक में समाहित किया गया है। जिसमें मुख्य रूप से शैव, वैष्णव, शाक्त, सौर, जैन एवं बौद्ध धर्म से संबंधित स्थापत्य एवं मूर्तिशिल्प संबंधी जानकारी को शामिल किया गया है। जिससे सागर जिले मुख्य रूप से रहली एवं देवरी अंचल की स्थापत्य एवं मूर्तिशिल्प संबंधी सूक्ष्म जानकारी प्राप्त हो सके।
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