'संत' शब्द साधारणतः सदाचारी पुरुष के लिए प्रयोग किया जाता है। विशिष्ट अर्थ में 'संत' शब्द का प्रयोग केवल उन आदर्श महापुरुषों के लिए किया जाता है जो समाज में रहते हुए भी निःस्वार्थ भाव से विश्व कल्याण में प्रवृत्त रहते हैं। भारतीय संस्कृति में सन्तों एवं सन्त साहित्य की लम्बी परम्परा रही है। ऐसी रचनाओं का प्रारम्भ 12वीं शताब्दी में ही हो गया था तब से लेकर 16वीं शताब्दी तक प्रचुर सन्त साहित्य उपलब्ध हैं जिनमें संत वेनी, नामदेव, कबीर, पीपा, रैदास गोरख, दरिया साहब, हजारी दास, धन्ना भगत आदि अनेक कवि हुए जिनकी सम्पूर्ण रचनाएँ तो नहीं मिलतीं किन्तु कुछ न कुछ अवश्य मिल जाती हैं।
बिहार के सन्त कवि दरिया साहब एक दार्शनिक, समाज सुधारक तो थे ही अनुभूति की व्यापकता उनकी रचनाओं में सर्वत्र उपलब्ध है। वे निर्गुण धारा के कवि थे। प्रस्तुत पुस्तक में शब्दों के धनी डॉ० जयकृष्ण मेहता ने अत्यन्त संक्षेप में दरिया साहब के जीवन में रचना संसार पर प्रकाश डाला है। उनकी रचनात्मक विशेषताओं के क्रम में भारतीय विचारधारा, सन्त मत का सार तत्त्व, दर्शन तथा अध्यात्म की पर्याप्त जानकारी मिल जाती है। दरिया के जीवन-चरित का विवेचन लेखन ने पूरी गम्भीरता से किया है फिर उनके रचना संसार की जानकारी और उनके द्वारा स्थापित मूल्यों का विवरण दिया है।
उनकी रचनाओं के विवरण मूल्यांकन के अतिरिक्त दरिया-साहित्य की तालिका, सद्गुरु दरिया साहब की शिष्य-परम्परा की सूची तथा संत दरिया : जीवन और साहित्य साथ ही 160 सतनामी मठों की सूची दी गयी है जो शोधार्थियों के लिए विशेष उपयोगी है। इस प्रकार यह पुस्तक सन्त कवि दरिया साहब से जीवन और साहित्य की महत्त्वपूर्ण जानकारियों की आकर्षक मंजूषा है। इसके अध्ययन के बाद निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि इस पुस्तक में गागर में सागर को भरने का प्रयास किया गया है इस प्रयास में लेखक पूर्णतः सफल भी रहा है। साधारण पाठक भी इसे पढ़कर सन्त कवि दरिया के विषय में पर्याप्त जानकारी प्राप्त कर सकेंगे। लेखक की प्रवाहमयी भाषा अपने में चुम्बकत्व का कार्य कर रही है। दरिया साहब भी आत्मान्वेषी सन्त थे। उन्होंने भी कबीर की भाँति अपने अन्तस में ही अपने साई को ढूँढ़ा था। वे सदा ईश्वर के दिव्य स्वरूप को पाने की चेष्टा करते रहे तथा साधना से अनहद नाद का जीवनपर्यन्त कर जीते रहे साथ ही शिष्यों को भी उसी राह पर चलने की सलाह उपदेशों द्वारा देते रहे।
उनकी वह वाणी आज भी समाज में है। कम या अधिक का अन्तर जो भी हो उनके साहित्यिक और सामाजिक अवदान को भुलाया नहीं जा सकता। तभी तो डॉ. जयकृष्ण मेहता ने निदेशक जैसे पद की व्यस्तताओं से समय निकाल कर उनका जीवन और साहित्य सर्वजन सुलभ कराया एतदर्थ वे भी धन्यवाद के पात्र हैं। अलमस्तु!
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