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उत्तरी भारत के सन्त: Saints of Northern India

$38
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Specifications
Publisher: North Zone Cultural Centre, Patiala
Author Hukumchand Rajpal
Language: Hindi
Pages: 252
Cover: HARDCOVER
10.00x7.5 inch
Weight 690 gm
Edition: 2003
HCC495
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Book Description
पुस्तक के विषय में

उत्तरी भारत के सन्त' पुसतक लेखन के मूल में कुछ बातें मेरे मस्तिष्क में पर्याप्त समय से ही है। भक्ति सम्बंधी पूर्व प्रचलित धारणाओं पर अब प्रश्नचिन लगाए जा रहे हैं। भक्ति का दक्षिण में उदय और स्वामी रामानंद को इसे उत्तरी भारत में लाना प्रायः मान्य एवं निर्विवाद रहा है। यह धारसण्डित हो चुकी है। भक्ति का उत्तरी भारत में आविर्भाव स्वामी रामानंद के कारण हुआ, यह धारणा आज बलवती है। यह सही है कि आचार्य परशुराम चतुर्वेदी की पुस्तक 'उत्तरी भारत की सन्त-परम्परा स्रोत पुस्तक है, पर इसमें सामग्री की प्रामाणिकता के अभाव के कारण काफी कुछ अनुमानाधारित है। इस बीच कुछ अनुसंधित्सुओं (शोधकर्ताओं) को हस्ततिरिक्त सन्त सामग्री उपलब्ध हुई है, जिससे इन सन्तों की वाणी का पुनर्मूल्यांकन किया जाना हमे अनिवार्य प्रतीत हुआ। हमने इस प्रकार की उपलब्ध सामग्री का उल्लेख यथास्थान किया है। उत्तरी भारत के सन्तों पर पृयस् से शोध कार्य हुए हैं तथा किये जा रहे हैं। सन्त कबीर सम्बंधी पूर्व धारणाओं पर तो प्रश्नचिह्न ही नहीं लगाये गये, सर्वथा नई दृष्टि को आधार बनाया गया है। जातिगत पूर्वाग्रहों की चर्चा की जा रही है। सन्त दादू तथा सन्त मलूकदास पर इस बीच डॉ वंशी ने कुछ सटीक कार्य किया है। पंजाब की गुरु-परम्परा का मूल्यांकन पहले लिपि की जानकारी न होने के कारण दोषपूर्ण रहा है, इसे हमने सही परिप्रेक्ष्य में समझने का प्रयास किया है। हरियाणा प्रदेश के अस्तित्व में आने से इस प्रदेश के सन्तों पर कुछ नवीन सामग्री प्रकाश में आई है। सन्त गरीबदास और तृतीय गुरु अमरदास का तुलनात्मक अध्ययन विशेष उल्लेख्य है। भले ही हमारी आशिक सहमति रही हो।

प्रस्तुत पुस्तक में 'उत्तरी-भारत के सन्तों' के जीवन-वृत्त एवं वाणी को सर्वधा नये आयामों के आधार पर समझने का प्रयास है। हमने उत्तरी भारत की भौगोलिक सीमाओं का अतिक्रमण किया है। वे सन्त जिनकी वाणी हिन्दी में उपलब्ध है, भले ही वह किसी प्रदेश में जन्मे हों, वह उत्तरी भारत के हैं। दूसरा सबसे सशास्त एवं प्रामाणिक आधार 'श्री गुरु ग्रंथ साहब' में संकलित सुशोभित वाणी रहा है। इसीलिए हमने सन्त जयदेव, नामदेव आदि सभी सन्तों को, जिनका सम्बंध भारत के अन्य क्षेत्रों से ही रहा है, उन्हें उत्तरी भारत की सन्त-परम्परा में अंगीकार किया है। पंचम गुरु अर्जुन देव की दूरदर्शिता, उदारता, भारतीय अखण्डता के प्रति सचेतता के हम कायल हैं प्रथम गुरु नानक देव की प्रेरणा विशेष रही है।

उत्तरी भारत के सन्तों का किसी एक ग्रंथ में समग्र विवेचन-विश्लेषण कर पाना हमारे लिए असम्भव नहीं तो कठिन अवश्य रहा है। इसीलिए हमने लोकप्रियता एवं वाणी के आधार पर इनका मूल्यांकन अधिक या कम किया है, कहीं तो नामोल्लेख से ही कार्य सम्पन्न मान लिया है। ये सभी सन्त एक दूसरे या अपने पूर्ववर्ती सन्तों की अपनी वाणी में चर्चा-संकेत अत्यन्त श्रद्धा भाव से करते हैं तथा सभी ब्रह्म के निराकार, निर्गुण रूप को अंगीकार किये हैं। समाज के बाह्याडम्बरों से हमें सचेत कर सभी सहज भक्ति, नाम-स्मरण का मूल मंत्र समझाते हैं। गुरु-महत्त्व सभी ने स्वीकार किया है। युग की समस्याओं के प्रति ईमानदार रहते हुए भी इन सन्तों ने मानव-कल्याण, लोक मंगल की धारणा को पुष्ट करते हुए उस परब्रह्म में लीन होने का महत्त्वपूर्ण मार्ग प्रशस्त किया है। सभी सन्त कथनी और करनी में एकरूपता के पक्षधर रहे हैं लोक चेतना और लोक भाषा के कारण इनकी लोकप्रियता निर्विवाद मान्य है। गुरुओं तथा संतों सम्बंधी जानकारी हमने डॉ. रत्न सिंह जरगी, डॉ. मनमोहन सहगल, डॉ. धर्मपाल मैनी तथा डॉ. धर्मपाल सिंहल के गथों से प्राप्त की है। इन चारों विद्वानों के साथ ही हमने पूर्व प्रकाशित ग्रंथों से यवास्थान सामग्री ली है। हमारा प्रयास रहा है कि सभी विद्वानों को यथास्थान उद्धृत किया जाए, पर कुछ नाम रह सकते हैं। ऐसे विद्वानों को हम धन्यवाद देना अपना कर्त्तव्य समझते है।

हम अपनी सीमाओं से भली भांति परिचित हैं। समकालीन लेखन का प्रभाव इस मूल्यांकन-विश्लेषण में आना हमारी विशिष्टता अथवा विवशता कुछ भी समझा जा सकता है। 'मानव-मूल्य' और भारतीय संस्कृति चिन्तन हमारे अंग संग रहा है यही किसी सन्त की महत्ता के मूलाधार समझे जा सकते हैं। हमने आधुनिक काल के सन्तों को इसमे सम्मिलित नहीं किया है।

इसमें हमारा विनम्र प्रयास रहा है कि गुरुमुखी लिपि पंजाबी भाषा में उपलब्ध सामग्री को देवनागरी लिपि एवं हिन्दी भाषा में प्रस्तुत किया जाए। इससे पाठकीय विस्तार हुआ है। हमने साहित्यिक भाषा से आम भाषा का यथास्थान प्रयोग तो किया है, पर इससे मुक्त हो पाना सम्भव नहीं रहा है। समकालीन लेखन और समीक्षा में रुचि रखने वाले से सत्तों पर इस कार्य को सम्पन्न कराने में हम श्री आर. टी. जिन्दल, आई. ए. एस, निदेशक, उत्तर क्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र, पटियाला की विशिष्ट भूमिका मानते हैं। उनकी इच्छा-पूर्ति में हमें सन्तोष है। इसमें हम किसी प्रकार की मौलिकता का दावा नहीं करते। प्रकाशित पुस्तक आम पाठक तक पहुँचे और हम इन सन्तों से प्रेरित हो अपना जीवन अधिक सार्थक बना पायें, यही कामना है।

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