लेखक परिचय
प्रोफेसर नूपुर तिवारी हमारे समय की उन विरली विद्वानों में से हैं, जिन्होंने अकादमिक जगत, सार्वजनिक नीति, शासन-प्रशासन और हाशिये पर खड़ी समुदायों, विशेषकर आदिवासी और ग्रामीण समाज, के बीच एक जीवंत सेतु बनाया है। संवेदनशील चिंतक और कठोर शोध-कर्ता के रूप में वह भारतीय जन-जीवन की सूक्ष्म परतों को गहरी सहानुभूति और तीखी विश्लेषणात्मक दृष्टि के साथ दर्ज करने के लिए व्यापक रूप से पहचानी जाती हैं। वर्तमान में वह भारतीय लोक प्रशासन संस्थान (IIPA), नई दिल्ली में डॉ. भीमराव आंबेडकर चेयर इन सोशल जस्टिस की चेयर प्रोफेसर हैं और भारत सरकार के जनजातीय कार्य मंत्रालय के अधीन नेशनल ट्राइबल रिसर्च इंस्टीट्यूट के रूप में कार्यरत हैं। इससे पहले वह एल.बी.एस. नेशनल अकादमी ऑफ एडमिनिस्ट्रेशन (LBSNAA), मसूरी में प्राध्यापिका रहीं, जहाँ उन्होंने भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) अधिकारियों और वरिष्ठ प्रशासकों को सामाजिक न्याय, ग्रामीण विकास, पंचायती राज और जनजातीय शासन पर प्रशिक्षण दिया, जिससे उनके काम को सैद्धांतिक गहराई और मैदानी यथार्थ का दुर्लभ संगम मिला। उनके प्रमुख शोध-क्षेत्र सामाजिक न्याय, हाशियाकरण और समावेशी नीतियाँ, जनजातीय विकास और लोक नीति, लैंगिक समानता एवं सुशासन तथा विकेन्द्रीकृत ग्रामीण विकास हैं, इन विषयों पर वह पचपन से अधिक शोध-पत्र और लेख प्रकाशित कर चुकी हैं, पंद्रह से अधिक पुस्तकों का लेखन/संपादन किया है और देश-विदेश के अनेक संकलनों में मोनोग्राफ एवं अध्याय प्रस्तुत किए हैं। उन्होंने भारत सरकार और राज्य सरकारों के लिए अनेक महत्त्वपूर्ण नीतिगत रिपोर्ट तैयार की हैं
अरिमर्दन कुमार त्रिपाठी भाषा-प्रौद्योगिकी में पीएच.डी.। विगत 17 वर्षों से भाषा-प्रौद्योगिकी के अंतर्गत शोध एवं विकास के साथ देश के विभिन्न राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय संस्थानों में कार्यानुभव। जिसमें विश्वभारती, शांतिनिकेतन में कार्य करते हुए अनेक जनजातीय भाषाओं के दस्तावेजीकरण का कार्य किया। इसके साथ भाषा और तकनीक से जुड़े विषयों पर महत्त्वपूर्ण पत्र-पत्रिकाओं में सतत लेखन। अब तक हिंदी एवं अँग्रेजी माध्यम से 3 स्वलिखित, 4 सह-लिखित, 18 सहसंपादित एवं 1 अनुवादित पुस्तकें प्रकाशित। देश के विभिन्न संस्थानों में व्याख्यान एवं पत्र-वाचन। संप्रति, केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा में भाषाविज्ञान के सह-प्राध्यापक के रूप शिक्षण के साथ अनेक प्रशासनिक दायित्वों का निर्वहन।
पुस्तक परिचय
समय की परछाई एक संवेदनशील और असरदार साहित्यिक कृति है, जो समय, यादों और इंसानी अनुभवों के बीच के गहरे लेकिन सूक्ष्म रिश्तों को सामने लाती है। यह किताच पाठक को भारत की आदिवासी और लोक समुदायों की जीवित दुनिया में धीर-धीरे प्रवेश करने का न्योता देती है जहाँ गीत, कहानियाँ और रोजमर्रा की जिंदगी यादों, सम्मान और प्रतिरोध का दस्तावेज बन जाती हैं। अपनी सधी हुई कहन और सोचने पर मजबूर करने वाली भाषा के जरिये यह पुस्तक उस संसार से रू-बरू कराती है, नहाँ व्यक्तिगत अनुभव, भावनाएँ और सामाजिक सच्चाइयाँ आपस में मिलती हैं अक्सर चुपचाप, लेकिन गहरे असर के साथ। यह रचना निजी और सामूहिक जीवन के बीच सहजता से आवाजाही करती है और दिखाती है कि खासकर हाशिए पर जीने वाले लोगों की रोजमर्रा की जिंदगियाँ समय, खामोशी, जिजीविषा और बदलाव जैसी ताक़तों से कैसे गढ़ी जाती हैं। बारीक नज़र और करुणा से भरी आवाज़ के साथ लेखिका अनकहे दर्द, अनदेखे संघर्ष और शांत ताक़त के उन पलों को शब्द देती हैं, जो पाठक को अपनी ही यात्रा पर ठहरकर सोचने का मौका देते हैं। इन पन्नों में मौखिक परंपराएँ, लोकगीत, रस्म-रिवाज़ और सामुदायिक सौंदर्यबोध को किसी अजूबे या सिर्फ़ अध्ययन की चीज की तरह नहीं देखा गया है, बल्कि उन्हें ज्ञान के अपने तरीके के रूप में समझा गया है नाजुक लेकिन टिकाऊ ऐसे रास्ते, जिनके ज़रिये हाशिए के समुदाय समय को समझते हैं, आधुनिकता से मोल-भाव करते हैं और अन्याय को नाम देते हैं। भोजपुरी, अवधी और हिंदी लोक-साहित्य की बनावट से लेकर आदिवासी आस्थाओं, पूजा-पाठ और रोज़ के श्रम की परतदार कहानियों तक, यह किताब दिखाती है कि कैसे "छोटी" लगने वाली आवाजें महिला गायक, गाँव के कलाकार, गुमनाम कवि, स्थानीय देवी-देवता जमीन, रोजी-रोटी, जाति, जेंडर और आस्था जैसे "बड़े" सवालों को अपने भीतर समेटे रहती हैं। यहाँ समय एक परछाई की तरह है, जो अलग-अलग देहों पर अलग तरह से पड़ती है गाँव छोड़कर शहर जाने वाले मजदूर पर, जंगल के असुरक्षित किनारे नाचती आदिवासी श्री पर, या उस कवि पर जो अपने दर्द को रूपक में ढालता है। लेकिन यही परछाई नए सांस्कृतिक और राजनीतिक सपनों की जमीन भी बनती है। एक ऐसी भाषा में लिखी गई यह पांडुलिपि, जो काव्यात्मक भी है और सोच में पैनी भी, साहित्यिक आलोचना, लोक-अध्ययन और समुदाय आधारित चिंतन को एक साथ बुनती है। यह दिखाती है कि लोक और आदिवासी रचनात्मकता कैसे अभिजात साहित्यिक मानकों को चुनौती देती है और हमें यह दोबारा सोचने पर मजबूर करती है कि "साहित्य", "विरासत" और "विकास" आखिर हैं क्या। आत्ममंथन से भरी और सामाजिक रूप से सजग यह किताब उन पाठकों से बात करती है, जो जीए हुए अनुभवों में अर्थ खोजते हैं और गहरी नज़र से देखने में सुंदरता पाते हैं। यह पुस्तक शोधकर्ताओं, छात्रों और संवेदनशील सामान्य पाठकों के लिए आदिवासी और लोक जीवन-दुनियाओं में प्रवेश का एक समृद्ध और सहज रास्ता खोलती है, और जिन समुदायों की राहों का यह स्नेहपूर्वक अनुसरण करती है, उनके लिए यह एक ऐसा आईना है जो उनके संघर्षों का सम्मान करता है, उनकी रचनात्मक चमक का उत्सव मनाता है और यह भरोसा दिलाता है कि उनकी कहानियाँ सिर्फ़ अतीत की चीज़ नहीं हैं बल्कि एक ज़्यादा न्यायपूर्ण, बहुलतावादी और मानवीय भविष्य की कल्पना के लिए जरूरी हैं।
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