प्रो० रामेश्वर मिश्र पंकज एवं प्रो० कुसुमलता केडिया द्वारा लिखित यह अर्थशास्त्रीय शोध-ग्रंथ वैश्विक सन्दर्भ में अर्थनैतिक प्रश्नों और मुद्दों को ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य सहित प्रमाणपूर्वक प्रस्तुत करता है। समग्र शोध संस्थान राष्ट्रीय जीवन एवं मानवीय जीवन के प्रत्येक महत्वपूर्ण कार्यक्षेत्र में इसी स्तर के शोध-कार्य का लक्ष्य रखता है। जिससे कि उन सब लोगों को जो पूरी गम्भीरता से राष्ट्रीय जीवन में धर्म की प्रतिष्ठा चाहते हैं और राष्ट्र-जीवन के कंटकों का शोधन तथा धर्मग्लानि का समापन चाहते हैं, नीति-विचार और कार्य-नीति निर्धारण के लिए पर्याप्त तथ्य एवं प्रामाणिक जानकारियाँ सुलभ हो ताकि उस विषय में एक राष्ट्रीय सर्वानुमति का प्रबुद्ध परिवेश बन सके।
निस्सन्देह किसी भी राष्ट्र में राजनैतिक निर्णयों और क्रियाशीलताओं का उच्चतम स्तर पर निर्धारण एवं अभिक्रम थोड़े से लोगों द्वारा ही होता है परन्तु इसमें सफलता तभी हो पाती है, जब अनुकूल राष्ट्रीय परिवेश उपलब्ध हो। यह व्यापक अनुकूलता वृहद् स्तर पर संवाद और विमर्श द्वारा ही सम्भव होती है। यह भी सही है कि मीडिया-क्रांति और वृहद्रस्तरीय समूह-संचालन (मास-मोबिलाइजेशन) के इस दौर में कई बार अशुभ और अशिव शक्तियाँ सरलता से सफल हो जाती है, तब भी शुभ और शिव शक्तियों के लिए कोई शार्टकट नहीं हैं। मार्ग तो एक ही है। महाप्राण निराला के शब्दों में-
"आराधन का दृढ़ आराधन से दो उत्तर,
तुम वरो विजय संयत प्राणों से प्राणों पर,
शक्ति की करो मौलिक कल्पना,
करो पूजन, छोड़ दो समर,
जब तक न सिद्धि हो, रघुनंदन।"
स्पष्टतः यहाँ समर छोड़ना केवल प्रत्यक्ष स्थूल के अर्थ में है। सूक्ष्म स्तर पर तो शक्ति की दृढ़ आराधना स्वयं में समर की तैयारी का, रणनैतिक सन्नद्धता और व्यूह रचना के विचार की सामर्थ्य वृद्धि का ही अंग है, बल्कि मर्म है। पर्याप्त शक्ति के अभाव में राजनैतिक इच्छाएँ राजनैतिक इच्छाशक्ति का रूप नहीं ले पातीं और कार्य सिद्धि सम्भव नहीं हो पाती। मात्र लालसा जग कर रह जाती है। अतः शक्ति अनिवार्य है।
आज वैश्विक परिवेश में जहाँ बहुत प्रतिकूलाएँ है, वहीं अनुकूलताएँ भी कम नहीं है। 'न्यू साइन्स' की नई उपलाब्धियों ने पिछले डेढ़ सौ वर्षो में विश्व स्तर पर प्रभावी हुई राजनीति के वैचारिक आधारों पर प्रश्न चिन्ह लगा दिए हैं, यद्यपि भारत के और विश्व के भी सभी राजनैतिक दल आज भी 'न्यूटॉनियन मॉडल' पर विकसित राजनीतिशास्त्रीय मॉडल का ही अनुसरण कर रहे हैं, परंतु इसकी विफलताएँ दिनोंदिन स्पष्ट हो रही है। यह विफलता कार्य-नीति में किसी कमी का फल नहीं है, स्वयं 'न्यूटॉनियन मॉडल' की वैचारिक दार्शनिक कमी का ही फल है। वह मॉडल मनुष्य के विषय में यांत्रिक विचार पर आधारित था, जो अब बासी और काल-बाह्य हो चुका है।
भारत के आधुनिक शिक्षित और प्रभावशाली लोग यूरो-अमेरिकी एकेडमिक्स के प्रभाव से यूरो-अमेरिकी विश्वदृष्टि से ही संचालित हैं, फलस्वरूप आनन्द, सौन्दर्य, शक्ति और श्रेष्ठता सम्बन्धी उनकी आस्थाओं और मान्यताओं में यूरो-क्रिश्चियन बुद्धि का अत्यन्त प्रभाव है, जिसके कारण समाजिक विज्ञानों और मानविकी विद्याओं के क्षेत्र में यूरो-क्रिश्चियन शास्त्रों और सिद्धांतों के प्रति ही अधिकार-भावना और प्रमाण भावना (सेन्स ऑफ अॅथारिटी) है। दूसरी ओर, स्थिति स्मृति-भ्रंशता की भले ही है, स्मृतिशून्यता की नहीं। अतः भारतीय संस्कारों का भी सम्पूर्ण विलोप नहीं हुआ है। अर्थशास्त्र पर यह पुस्तक उसी दृष्टि से प्रबुद्धजनों के समक्ष विनयपूर्वक प्रस्तुत है कि शायद इसमें की गयी मीमांसा और विवेचना अभी की स्थापित अर्थशास्त्रीय आस्थाओं की सीमाएँ तथा विसंगतियाँ दिखा सके और अहिंसक समृद्धि की संभाव्यताओं के बारे में उनके भीतर आशा और जिज्ञासा का संचार कर सके।
यह शोध-अध्ययन श्री रामस्वरूप स्मृति न्यास के उपक्रम हिन्दु विद्या केन्द्र की शोध-योजनाओं के अंतर्गत किया गया। इसके प्रकाशन हेतु समग्र शोध-संस्थान, मुम्बई द्वारा दी गई सहायता के लिए लेखकद्वय समग्र शोध संस्थान, मुम्बई के, विशेषतः श्री गोविंदाचार्य जी के प्रति कृतज्ञ है। श्री गोविंदाचार्य ने प्रस्तावना लिखने की भी कृपा की है। उनसे राष्ट्र को बड़ी अपेक्षाएँ है।
जहाँ हमने आधुनिक यूरोपीय अर्थशास्त्र की मान्यताओं और उनसे प्रेरित उन कर्मों की कुछ झलक इस पुस्तक में दी है, जो कर्म मानवीय इतिहास के एक अभूतपूर्व घटना प्रवाह का निमित्त और आधार बने, वहीं स्थापित अर्थशास्त्र की मान्यताओं के अपरीक्षित और अप्रामाणिक होने सम्बन्धी तथ्यों की भी प्रस्तुति की है। इसके साथ ही हमने समृद्धि और सम्पति तथा सुख की उन सनातन मान्यताओं का भी स्मरण इस पुस्तक में किया है जो मान्यताएँ और बोध विश्व इतिहास में समृद्धि के सामान्य नियमों का आधार है और विविध सभ्यताओं में हजारों वर्षों से रहे है। इस प्रकार, हमने वर्तमान हिंसक समृद्धि की अहिंसक दृष्टि से विवेचना प्रस्तुत की है। विवेचना के इस क्रम में विश्व की अहिंसक समृद्धि वाली विविध सभ्यताओं के इतिहास की संक्षिप्त और सांकेतिक प्रस्तुति भी आवश्यक थी, सो वह की गयी है।
सामान्यतः भारत के शिक्षितजन यूरोपीय समृद्धि को अर्थशास्त्र के सार्वभौम नियमों के पालन से प्राप्त की गयी समृद्धि मानते है और इसलिए भारत सहित विश्व के किसी भी देश में इन अर्थशास्त्रीय नियमों के पालन से ऐसी ही समृद्धि सम्भव मानते हैं। यद्यपि स्वयं यूरोप के विशेषज्ञ विद्वान यह भलीभाँति जानते हैं कि इन अर्थशास्त्रीय मान्यताओं के पालन से सार्वभौम समृद्धि प्राप्त कर पाना असम्भव है। भारत में आधुनिक काल में भी महात्मा गांधी तथा कतिपय अन्य आधुनिक विचारकों ने यूरोपीय समृद्धि के हिंसक आधारों को ध्यान में रखते हुए उन्हें सार्वभौम समृद्धि का आधार मानने से इनकार किया है परन्तु भारत में इन दिनों जो भी लोग शक्तिशाली और सत्तावान है और राज्य-तन्त्र के तथा एकेडमिक्स के प्रमुख पदों पर प्रभावी है, वे यूरो-क्रिश्चियन अर्थशास्त्र की मान्यताओं पर अडिग आस्था रखते हैं।
प्रस्तुत पुस्तक के रचयिताओं मे से प्रो. कुसुमलता केडिया ने अपनी पुस्तकों-'रूट्स ऑफ अंडरडेवलपमेंट' और 'जेनेटिक एजम्पसंस ऑफ डेवलपमेंट थिअरीज' के द्वारा यह भलीभाँति दिखलाया है कि हिंसक समृद्धि की यह चाहत, खोज और सिद्धि विश्व इतिहास की एक असाधारण और अभूतपूर्व घटना है और उसके पीछे यूरो-क्रिश्चियन आस्था जीन्स (आनुवंशिक गुणसूत्रों) के स्तर तक पैठी हुई है। भारत सहित अनेक एशियाई एवं अफ्रीकी देशों की गरीबी और अल्प-विकास का सीधा रिश्ता यूरो-क्रिश्चियन हिंसक समृद्धि से है। पुस्तक के दूसरे लेखक प्रो० रामेश्वर मिश्र 'पंकज' दर्शन और इतिहास के स्तर पर इन तथ्यों की विवेचना अपने लेखों में वर्षों से करते रहे हैं, परन्तु यूरोप के बारे में, विशेषकर यूरो-क्रिश्चियन समाज और देशों के बारे में अपनी समझ एवं दृष्टि को स्पष्ट और परिपक्व बनाने में उन्हें भी प्रो० केडिया की उक्त पुस्तकों से बड़ी सहायता मिली है।
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