पुस्तक परिचय
सागरों में दिन-प्रतिदिन बढ़ रहे प्रदूषण ने आज एक विकराल समस्या का रूप धारण कर लिया है। यदि कहा जाए कि करोड़ों वर्ष पूर्व, लाखों वर्षों में, पृथ्वी पर पैदा हुआ 'जीवन' आज 'मौत' के कगार पर है तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। मानव के अपरिमित लालच, विज्ञान और उद्योगों के अत्याधिक विकास, अंधाधुंध दोहन के कारण क्षत-विक्षत होते प्राकृतिक संसाधनों तथा हमारी अत्याधुनिक विलासपूर्ण जीवनशैली के कारण, धरती का रक्षा कवच कही जाने वाली ओजोन पर्त में छेद हो गए हैं। ये छेद लगातार बढ़ रहे हैं, जिससे ओजोन पर्त सिकुड़ती जा रही है। इसका दुष्परिणाम है कि धरती का तापमान लगातार बढ़ता जा रहा है जिससे सागरों का जल स्तर बहुत तेजी से ऊपर उठ रहा है। सागरों का जल स्तर बढ़ने से तटवर्ती शहरों के डूबने का खतरा पैदा हो गया है प्रस्तुत पुस्तक में सागरों से संबंधित सभी विषयों पर सम्यक् प्रकाश डालने का प्रयास किया गया है। इसमें सागरों के आर्थिक व पर्यावरणीय महत्व के साथ-साथ दिन-प्रतिदिन प्रदूषित होते जा रहे सागरों की दुर्दशा और सागरों के संरक्षण की भी चर्चा की गयी है। इसमें भारत सरकार तथा विभिन्न सरकारी व गैर सरकारी एजेंसियों द्वारा सागरों के विकास के लिए किए जा रहे प्रयासों की जानकारी दी गयी है। सुविधा की दृष्टि से विषय को कुल 10 अध्यायों में विभाजित किया गया है ताकि सागरीय संसाधनों के प्रत्येक पक्ष की सम्यक विवेचना की जा सके। कठिन वैज्ञानिक शब्दावली के स्थान पर पुस्तक में सरल और सुगम भाषा का प्रयोग किया गया है ताकि आमजन भी पुस्तक का भरपूर उपयोग कर सकें। आशा है 'सागर संसाधन' नामक यह प्रयास, संबंधित एजेंसियों, व्यक्तियों और आम जनता के लिए भी लाभदायक सिद्ध होगा।
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