प्रस्तावना
सन 1947 में ब्रिटिश शासन से स्वतंत्र होने के तुरंत बाद से ही भारत को गंभीर घरेलू विद्रोह और हिंसा का सामना करना पड़ा है। अंग्रेजों की 'फूट डालो और राज करो' की कुटिल नीति को द्वि-राष्ट्र सिद्धांत के रूप में लागू किया गया और स्वतंत्रता के साथ ही भारत का विभाजन हो गया, जिसके परिणामस्वरूप भारत खंडित हो गया और पाकिस्तान (जो बाद में पाकिस्तान और बांग्लादेश में विभाजित हो गया) का जन्म हुआ। विभाजन के कारण अत्यधिक हिंसक स्थिति पैदा हुई और दिल दहला देने वाली त्रासदी हुई। विभाजन के दौरान हुई हिंसा में करोड़ों लोग विस्थापित हुए और लाखों की संख्या में लोगों ने अपनी जान गंवाई। नए-नए स्वतंत्र हुए देश की नई सरकार को शुरू से ही घरेलू विद्रोह और घोर हिंसा का सामना करना पड़ा। सन 1947 के बाद से कम्युनिस्टों ने आंध्रप्रदेश में 'सच्ची आजादी' के लिए युद्ध की घोषणा की और नागाओं ने नागालैंड के लिए स्वतंत्रता की घोषणा की और 15 अगस्त, 1947 को अपने स्वतंत्रता दिवस के रूप में स्वीकार करने से इनकार कर दिया। जम्मू और कश्मीर ने भारत के साथ विलय कर लिया, लेकिन पाकिस्तान ने अक्टूबर 1947 में ही जम्मू और कश्मीर पर जबरन कब्जा करने के लिए हमला शुरू कर दिया। कश्मीर घाटी के मुस्लिम नेताओं का एक बड़ा वर्ग कश्मीर को एक अलग देश बनाने की उम्मीद लिए अपने ही अलगाववादी मंसूबे पाले हुए था। नए-नए स्वतंत्र और खंडित हुए भारत को अस्थिर करने के लिए भारत विरोधी और स्वार्थी समूहों के द्वारा किये गए प्रयासों के ये कुछ प्रारंभिक संकेत थे। स्वतंत्रता से पहले की हिंसा तत्कालीन कमजोर नेतृत्व और तुष्टीकरण की नीति का दुष्परिणाम थी। लेकिन, मुख्य रूप से संघ और अकाली दल के हस्तक्षेप के कारण लाखों लोगों को नरसंहार से बचाया गया और हजारों महिलाओं को गायब होने या शील भंग होने और दयनीय जीवन जीने से बचाया गया। वे सशस्त्र बलों के साथ हिंसक इस्लामिक झुंडों और हिंदू तथा अन्य अल्पसंख्यक मतावलंबी समूहों के बीच एक मजबूत ढाल बनकर खड़े रहे। आंध्रप्रदेश में कम्युनिस्टों द्वारा किया गया विद्रोह रूसी नेता स्टालिन के उस कथन पर आधारित था, जिसमें उन्होंने कहा था कि यह सच्ची स्वतंत्रता नहीं है', बल्कि यह बुर्जुआ की स्वतंत्रता है. जिसमे सर्वहारा वर्ग की कोई भूमिका नहीं है। इससे प्रेरणा लेकर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने उन क्षेत्रों में विटोह शुरू कर दिया. जहाँ वह मजबूत थी। मार्क्सवादी विचारधारा पर आधारित भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी भारत को एक राष्ट्र नहीं मानती थी और इसलिए उसने अपने नेता के विचारों अर्थात 'अधिकारी सिद्धांत' के अनुसार भारत को 17 संप्रभु राष्टों में विभाजित करने की वकालत की। सन 1946 में बिटिश कैबिनेट कमेटी को एक प्रस्ताव सौंपा गया था। सन 1942 में कम्युनिस्टों ने मुस्लिमों के जनमत के अधिकार के रूप में पाकिस्तान के निर्माण का समर्थन किया था।' इन्ही कम्युनिस्टों ने स्वायत्त कश्मीर का समर्थन भी किया था। इस प्रकार, 1940 के दशक में ही कम्युनिस्टों द्वारा दीर्घकालिक अलगाववादी संघर्षों का बीजारोपण कर दिया गया था। सौभाग्य से, कम्युनिस्ट पार्टी की विदेशी विचारधारा भारत में जड़ नहीं जमा सकी और यह धीरे-धीरे जमीनी राजनीति में भी अप्रासंगिक हो गई, हालाँकि, यह बात सच है कि भूमिगत वैचारिक परिदृश्य में इसके अनुयायी बड़ी संख्या में हैं। पाकिस्तान और भारत के बीच पहले युद्ध का कारण बनी 'जम्मू-कश्मीर समस्या' स्वायत्तता या स्थानीय लोगों की आकांक्षाओं के कारण नहीं उपजी थी। बल्कि, यह कश्मीर घाटी की आबादी का बलपूर्वक और उत्पीड़न के साथ इस्लामीकरण करने का कुत्सित प्रयास था। इसे बाहर से भी समर्थन मिला, शुरू में पाकिस्तान से और बाद में अन्य मुस्लिम देशों से। पंजाब में खालिस्तानी उग्रवाद की समस्या का बीजारोपण भी आजादी के समय ही किया गया था, लेकिन स्वतंत्र भारत में नई कांग्रेस सरकार ने सिखों के साथ जिस तरह का व्यवहार किया उसके कारण इस समस्या ने आगे चलकर और भयानक रूप धारण कर लिया। इस समस्या के बीजारोपण के शुरुआती चरण में कोई भी बाहरी हाथ शामिल नहीं था। पूर्वोत्तर भारत में, कई जगहों पर इसकी विविध जनसंख्या और विभिन्न जनजातीय अथवा आदिवासी समूहों में विभिन्न स्तरों पर किसी न किसी तरह का अंतर्निहित संघर्ष था। अपनी भाषा और संस्कृति के बारे में गौरव की भावना बाद में भारत से अलग होने के आंदोलनों में परिवर्तित हो गयी, जो आगे चलकर विद्रोह अथवा उग्रवाद में बदल गयी। नागालैंड के बाद मिज़ोरम के नेताओं ने छोटे-मोटे मतभेदों को बढ़ा-चढ़ाकर बड़े संघर्षों में बदल दिया। दुर्भाग्य से, विदेशी ईसाई मिशनरियों द्वारा इन दोनों राज्यों में ही सबसे पहले 'आत्मा की फसल काटी' गई थी अर्थात् धर्मांतरण का कुत्सित खेल शुरू किया गया था। पहले मिशनरी अंग्रेज थे जो बैपटिस्ट मिशनरी सोसाइटी (बीएमएस) से संबंधित थे, जिन्होंने आगे चलकर सन 1836 में मिशन क्षेत्र को आधिकारिक तौर पर अमेरिकन बैपटिस्ट मिशनरीज (एबीएम) के हाथों में छोड़ दिया इस प्रकार, इन विद्रोहों में स्थानीय जनजातीय अथवा आदिवासी मुद्दे निहित थे, लेकिन मूल रूप से ये विद्रोह चर्च द्वारा भड़काए गए थे और फिर आगे चलकर चर्च ने ही इनका पोषण भी किया। दुर्भाग्य से, संघ के अलावा किसी भी बड़े संगठन, विद्वानों अथवा शिक्षाविदों और अंतर्राष्ट्रीय पर्यवेक्षकों ने इस कारक अथवा समस्या की मूल जड़ को उजागर नहीं किया। हो सकता है कि यह पश्चिम में शिक्षाविदों और मीडिया पर चर्च के प्रभुत्व के कारण हो। हमने इस अध्ययन में उन सबसे बड़ी चुनौतियों पर ध्यान केंद्रित करने का फैसला किया जिनका भारत ने स्वतंत्रता के बाद से सामना किया है। वे एकता के सूत्र से बंधे एक राष्ट्र के विचार के लिए चुनौतियाँ थीं। भारत ने अपने वर्तमान इतिहास में बहुत से संकटों का सामना किया है। लेकिन, इन तीनों क्षेत्रों ने हिंसक विद्रोहों के सबसे भयानक रूप का सामना किया है। लोकतांत्रिक समाज की अवधारणा के लिए दूसरा खतरनाक और बड़ा विद्रोह नक्सल या माओवादी चुनौती है। धीसिस में नियत विषय की सीमाओं के कारण हमने नक्सली अथवा माओवादी चुनौती को इस अध्ययन में शामिल नहीं किया है। इन विद्रोहों ने राष्ट्रीयता के उस विचार के मूल आधार को चुनौती दी है जिसका संघ न केवल समर्थन करता है, बल्कि व्यवहार में भी स्थापित करने का प्रयास करता है। इस अध्ययन की प्रकृति का परिणाम स्वतंत्र भारत के तीन सबसे अशांत क्षेत्रों अर्थात् जम्मू-कश्मीर, पंजाब और पूर्वोत्तर के वर्तमान इतिहास का एक व्यापक अवलोकसंबंधित थे, जिन्होंने आगे चलकर सन 1836 में मिशन क्षेत्र को आधिकारिक तौर पर अमेरिकन बैपटिस्ट मिशनरीज (एबीएम) के हाथों में छोड़ दिया इस प्रकार, इन विद्रोहों में स्थानीय जनजातीय अथवा आदिवासी मुद्दे निहित थे, लेकिन मूल रूप से ये विद्रोह चर्च द्वारा भड़काए गए थे और फिर आगे चलकर चर्च ने ही इनका पोषण भी किया। दुर्भाग्य से, संघ के अलावा किसी भी बड़े संगठन, विद्वानों अथवा शिक्षाविदों और अंतर्राष्ट्रीय पर्यवेक्षकों ने इस कारक अथवा समस्या की मूल जड़ को उजागर नहीं किया। हो सकता है कि यह पश्चिम में शिक्षाविदों और मीडिया पर चर्च के प्रभुत्व के कारण हो। हमने इस अध्ययन में उन सबसे बड़ी चुनौतियों पर ध्यान केंद्रित करने का फैसला किया जिनका भारत ने स्वतंत्रता के बाद से सामना किया है। वे एकता के सूत्र से बंधे एक राष्ट्र के विचार के लिए चुनौतियाँ थीं। भारत ने अपने वर्तमान इतिहास में बहुत से संकटों का सामना किया है। लेकिन, इन तीनों क्षेत्रों ने हिंसक विद्रोहों के सबसे भयानक रूप का सामना किया है। लोकतांत्रिक समाज की अवधारणा के लिए दूसरा खतरनाक और बड़ा विद्रोह नक्सल या माओवादी चुनौती है। धीसिस में नियत विषय की सीमाओं के कारण हमने नक्सली अथवा माओवादी चुनौती को इस अध्ययन में शामिल नहीं किया है। इन विद्रोहों ने राष्ट्रीयता के उस विचार के मूल आधार को चुनौती दी है जिसका संघ न केवल समर्थन करता है, बल्कि व्यवहार में भी स्थापित करने का प्रयास करता है। इस अध्ययन की प्रकृति का परिणाम स्वतंत्र भारत के तीन सबसे अशांत क्षेत्रों अर्थात् जम्मू-कश्मीर, पंजाब और पूर्वोत्तर के वर्तमान इतिहास का एक व्यापक अवलोकन और समीक्षा है। हमारे पीछे लगभग 75 वर्षों के वर्तमान इतिहास के साथ हम यह जाँच कर सकते हैं कि भारत की समस्याओं के लिए संघ द्वारा सुझाए गए समाधान दीर्घकाल में सही सिद्ध हुए या वे केवल आशंकाजन्य भयावह या विभाजनकारी और विनाशकारी थे। अब कई विवादों पर निष्पक्ष दृष्टिकोण रखना संभव है। पिछले 70 वर्षों के दौरान संघ के प्रस्तावों का अध्ययन विभिन्न मीडिया रिपोर्टों, राजनीतिक विश्लेषकों, चिंतक विचारकों के विचारों और उस समय के राजनीतिक दलों के रुख के आलोक में किया गया है। संघ के पास बहुत अधिक प्रकाशन नहीं हैं और प्रलेखन केंद्र अभी भी अपनी प्रारंभिक अवस्था में है। मैं प्रलेखन केंद्र से केवल कुछ दस्तावेज एकत्र कर सका जो इस विश्लेषण के लिए महत्त्वपूर्ण हैं। इसके साथ ही मैंने उस समय के संघ कार्यकर्ताओं और प्रबुद्ध विचारकों का साक्षात्कार भी लिया है। इससे हमें उस समय की सामाजिक-राजनीतिक अंतर्धाराओं और प्रवृत्तियों को समझने में सहायता मिलती है।
लेखक परिचय
डॉ. रतन शारदा बाल्यकाल से ही संघ के स्वयंसेवक रहे हैं। उन्होंने संघ में शाखा से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक के विभिन्न दायित्वों का निर्वहन किया है। 1975-77 में थोपे गए आपातकाल के दौरान वे अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के सक्रिय कार्यकर्ता रहे और उस समय कॉलेज छात्रसंध के महासचिव रहते हुए जेल भी गए। उन्होंने संघ के कई अनुषांगिक संगठनों के साथ निकटता से कार्य किया है। इससे उन्हें न केवल संघ की कार्यपद्धति की गहन समझ है, बल्कि विशाल 'वैचारिक परिवार' के कामकाज अथवा कार्यशैली की भी गहन समझ है। रतन शारदा आठ वर्षों तक विश्व अध्ययन केंद्र, मुंबई के संस्थापक सचिव रहे। वे अनेक शैक्षणिक एवं सामाजिक सेवा संगठनों के सलाहकार भी हैं। इसके साथ ही वे एक जाने-माने 'टीवी पैनलिस्ट' और जनवक्ता के रूप में भी ख्यातिप्राप्त हैं। वे भारत के अलावा 26 अन्य देशों की यात्रा कर चुके हैं। वर्ष 2018 में उन्हें "अंडरस्टैंडिंग आरएसएस थ्रू इट्स रेजोल्यूशन्स फोकस ऑन जम्मू कश्मीर, नॉर्थ ईस्ट एंड पंजाब" विषय पर पीएचडी की उपाधि प्राप्त हुई। दिसंबर 1954 में मुंबई में जन्में डॉ. शारदा ने मुंबई के सेंट जेवियर्स कॉलेज से स्नातक करने बाद वर्ष 1982 में मुंबई विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर किया। इसके अलावा उन्होंने टेक्सटाइल केमिस्ट्री में डिप्लोमा भी किया और उन्हें विभिन्न व्यावसायिक क्षेत्रों का अनुभव भी प्राप्त है। उन्होंने अंग्रेजी और हिंदी भाषा में कुल 11 पुस्तकें लिखी हैं, जिनमें 7 पुस्तकें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर आधारित हैं। उन्होंने वरिष्ठ संघ विचारक श्री रंगा हरि जी द्वारा संघ के द्वितीय सरसंघचालक श्री गुरुजी पर लिखित दो महत्त्वपूर्ण पुस्तकों का अनुवाद भी किया है। इसके साथ ही उन्होंने 16 पुस्तकों का संपादन/डिजाइन कार्य भी किया है। पुस्तकों के माध्यम से संघ को समझने के लिए उनके द्वारा अंग्रेजी में लिखित तीन पुस्तके अत्यंत उपयोगी मानी जाती हैं। उनके द्वारा लिखित इस त्रयी में 'आरएसएस 360 : डिमिस्टिफाइंग राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ', 'आरएसएस एवोल्यूशन फ्रॉम एन ऑर्गनाइजेशन टू अ मूवमेंट' और 'कॉन्फ्लिक्ट रेजोल्यूशन द आरएसएस वे', जैसी पुस्तकें शामिल हैं। उनकी पुस्तक 'संघ और स्वराज' स्वतंत्रता संग्राम में संघ की भूमिका पर आधारित एक गहन शोधपूर्ण दस्तावेज है। उनकी पुस्तकों का अनुवाद कई भारतीय भाषाओं में हो चुका है।
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