लेखक परिचय
परिचय (हरेन्द्र प्रताप) 1950, बिहार के बक्सर जिला के केसठ ग्राम में जन्म। अविवाहित। पिता स्व. शिव बिलास पाण्डेय-स्वतंत्रता सेनानी। स्नातक तक पढ़ाई। ऐतिहासिक बिहार आंदोलन में 1974, 1975 एवं 1976 में गिरफ्तारी। 1980 में बिहार में उर्दू को द्वितीय राजभाषा बनाये जाने का विरोध और गिरफ्तारी। 1994 में श्री लालू प्रसाद के जंगल राज का विरोध और गिरफ्तारी। 1999 में वाराणसी में काशी हिन्दू वि.वि. के कुलपति के खिलाफ आंदोलन और गिरफ्तार शिक्षा में संप्रदायिकता, गैट-तोड़ो, मोड़ो, छोड़ो पुस्तिका का लेखन। 2006 में "बिहार पर मंडराता खतरा" पुस्तक प्रकाशित। विभिन्न विषयों पर अखबारो में लेखन।
पुस्तक परिचय
किसी भी स्थान की जनसंख्या उस स्थान की संस्कृति और सभ्यतागत पहचान की द्योतक होती है। भारत के संदर्भ में जनसंख्या की विविधता और विशालता उसे विशेषीकृत अध्ययन के योग्य बनाती है। साल 1947 में, जब भारत को स्वतंत्रता प्राप्त हुई, विभाजन की भयानक विभीषिका ने सबको यह विश्वास करने के लिए विवश कर दिया कि जहाँ भी मुसलमान बहुसंख्यक हो गए, अंततः उन स्थानों को भारत से अलग करने का निर्णय लेना पड़ा। प्रस्तुत पुस्तक जनसांख्यिकी के वर्तमान और भविष्य के संकटों को तथ्यों एवं आंकड़ों की सहायता से हमारे सम्मुख एक नग्न सत्य के समान बिखेर कर रख देती है। इस पुस्तक को व्यवस्थित तरीके से पाँच खंडों में विभाजित किया गया है। प्रत्येक खण्ड एक चेताबनी के समान प्रतीत होता है। इन खंडों में भारत की जनसंख्या के आंकड़ों को दर्शाया गया है। वर्ष 1961 से 2011 तक हुई जनगणनाओं में चिंताजनक जनसांख्यिकी परिवर्तन देखने को मिले हैं। कई जिलों में, जिनके प्रखण्डवार आँकड़े प्रदत्त किए गए हैं, मुस्लिम जनसंख्या में अप्रत्याशित वृद्धि देखने को मिली है। इस वृद्धि में जन्म दर के साथ घुसपैठ के योगदान की उपेक्षा नहीं की जा सकती है। प. बंगाल, असम, झारखंड, बिहार, ओडिशा तथा उत्तर प्रदेश इत्यादि राज्यों के कुछ जिलों में मुस्लिम जनसंख्या में तीव्र वृद्धि इस्लामिक गलियारे की आशंका को सत्य सिद्ध करने के लिए पर्याप्त आधार प्रदान कर देती है। झारखंड के लगभग एक चौथाई जिले ऐसे हैं जहाँ हिन्दू अल्पमत में आ गए हैं। हालांकि समस्या मात्र मुस्लिम जनसंख्या वृद्धि से संबंधित नहीं है अपितु ईसाई जनसंख्या और मिशनरियों का बढ़ता प्रभाव भी भारत में जनसांख्यिकी परिवर्तन में नकारात्मक रूप से उत्तरदायी है। पूर्वोत्तर भारत समेत सभी जनजातीय इलाकों में ईसाई आक्रमण तीव्र हुआ है। खण्ड़ 'ग' स्पष्ट तौर पर यह बताता है कि किस प्रकार ईसाई भारत विभाजन की अपनी योजना पर कार्यरत हैं। अरुणाचल, नागालैंड, मणिपुर तथा मेघालय जैसे राज्यों में जहाँ अन्य समुदायों की संख्या में कमी आई है, वहीं ईसाई जनसंख्या में वृद्धि देखने को मिली है। जनगणना के इस संतुलन का सबसे वीभत्स परिणाम हुआ है, हिंदुओं का पलायन। प. बंगाल और महाराष्ट्र के अनेक इलाके, जम्मू और कश्मीर और हैदराबाद जीते-जागते उदाहरण हैं हिन्दू पलायन के, जहाँ मुस्लिमों की जनसंख्या बढ़ने के साथ ही हिंदुओं को अपने घर, व्यवसाय इत्यादि का त्याग करना पड़ गया। वहीं मिजोरम ईसाई बहुलता के कारण हिन्दू पलायन का चित्र प्रस्तुत करता है। हम जनसांख्यिकी लाभ की बात करते हैं और गर्व से कहते हैं कि भारत की जनसंख्या उसकी ताकत है लेकिन प्रस्तुत आँकड़े कुछ और कहानी ही कह रहे हैं। यह कहानी है एक ऐसे षड्यन्त्र की जहाँ दो समुदाय सुनियोजित तरीके से अपनी जनसंख्या को बढ़ाने में लगे हुए हैं और हिन्दू, वह सिमटता जा रहा है, प्रखण्डवार, जिलावार और राज्यवार।
प्रस्तावना
1947 में देश का विभाजन "दो राष्ट्र के सिद्धांत" पर हुआ। इस्लाम को राष्ट्रीयता माना गया। 3 जून 1947 को माउंटबेटन द्वारा एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में इसकी घोषण की गई, उसी दौरान स्वतंत्रता की तिथि 15 अगस्त 1947 भी घोषित हुई। सवाल यह है कि अगर इस्लाम एक राष्ट्रीयता था तो पूरे दुनिया में इस्लाम मानने वालों का एक राष्ट्र क्यों नहीं? भारत का विभाजन इस्लाम ने किया तो पाकिस्तान का विभाजन भाषा ने किया। बांग्ला भाषा के आधार पर बांग्लादेश का जन्म हुआ। पाकिस्तान का विभाजन यह प्रमाणित कर दिया कि देश विभाजन का दिया गया तर्क- "दो राष्ट" का सिद्धांत सही नहीं था। भाषा और मजहब/पंथ के आधार पर रक्तपात-हिंसा-विभाजन इस सोच की उत्पति के जड़ में विदेशों से आयातित विचार इस्लाम था। भारत में विदेशों से आयातित पंथ-इंसाइयत, इस्लाम, वामपंथ समाजवाद इनकी हिंसक और विभाजनकारी विचार धारा राष्ट्र का नुकसान करती है। विदेशों से आयातित यहुदी और पारसी भी संख्या में कम पर भारत में है. उन्होंने कभी उत्पात या अराजकता नहीं फैलायी। 1951 की जनगणना में उनकी अलग से जनगणना हुई थी पर 1961 से उनकी अलग से गणना नहीं होती है फिर भी उन्होंने किसी फोरम/मंच पर अपना किसी प्रकार का विरोध दर्ज नहीं कराया। वामपंथ की वैश्विक अवसान का उन पर गहरा प्रभाव पड़ा है। विदेशों से आयातित इन विचारों के अनुयायी तो इसी देश के ही लोग है। "देशी लोग-विदेशी विचार" यह विदेशी विचार भारत माँ को लहूलुहान कर रहा है। एक तरफ "वंदे भारत-भारत माता की जय" कहने वाले सीमा पर सीमा की रक्षा में अपना बलिदान कर रहे है। वहीं वामपंथ समाजवादी विचार धारा से ग्रसित जे.एन.यू. में नारा लगाते है भारत तेरे टूकड़े होगे, इंशा अल्ला, इंशा अल्ला। इन विदेशी विचारों का विस्तार देश के विभाजन का बीजारोपण है। सबसे पहले श्री जितेन्द्र बजाज जी की पुस्तक ने जनगणना के आंकड़े प्रकाशित कर देश में इस्लाम और ईसाइयत के खतरे के प्रति सचेत किया। उनकी प्रेरणा से मैंने बिहार की जनगणना का प्रखण्ड सह अध्ययन कर 2006 में एक पुस्तक लिखी "बिहार पर मंडराता खतरा। इस पुस्तक में 1961-1991 तक के प्रखण्डवार जनसंख्या के ऑकड़े थे। कुछ वषों से राष्ट्रीय स्तर की जनगणना का अध्ययन कर अखबारों में लिखना शुरु किया। विशेषकर उत्तर भारत की जनगणना के अध्ययन को पुस्तकाकार स्वरुप में सामने लाने का यह एक छोटा सा प्रयास है। ईसाइयत और इस्लाम फिर से भारत विभाजन के पथ पर अग्रसर है। जहाँ-जहाँ इनकी जनसंख्या प्रभावी स्तर पर पहुँच रही है। वहाँ से हिन्दू-सिख-जैन और बौद्ध का पलायन भी हो रहा है। इस पुस्तक में राष्ट्रीय स्तर पर ईसाइयत और इस्लाम के आक्रमण को जनगणना के ऑकड़े देकर प्रमाणित किया गया है। पुस्तक में तीन खण्ड है- 1. इस्लाम का आक्रमण, 2. ईसाइयत का आक्रमण और 3. हिन्दूओं का पलायन। असम-प.बंग-झारखण्ड और विहार के कुछ प्रखण्डों और सबडिबीजनों तथा जिलों के आँकड़े अपनी गवाही देकर देश को यह बता रहे है कि पाकिस्तान और बांग्लादेश को आपस में जोड़ने के लिए एक "इस्लामिक गलियारा" बनाया जा रहा है। बांग्ला देश से आने वाले बांग्लाभाषी घुसपैठियों को पूर्णिया-कटिहार-किशनगंज-अररिया-साहिबगंज-पाकुड-जामताड़ा-देवघर-दुमका और गोडा में भाषायी अनुकूलता का लाभ मिलता है क्योंकिं इन जिलों में बांग्ला भाषा को लोग अपनी एक मातृभाषा के रुप में प्रयोग करते है। सबसे खतरनाक पूर्वोत्तर के राज्यों को काटकर एक स्वतंत्र ईसाई देश बनाने का षणयंत्र चल रहा है। जनगणना के समय विविधता में एकता को नकार कर "अपनी स्वतंत्र पहचान" के नाम पर जनजाति बंधुओं को "मैं हिन्दू नहीं" कहने का अभियान चलाया गया
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