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शब्दों से गपशप कविता अज्ञेय से अष्टभुजा शुक्ल: Shabdon Se Gapshap Kavita Agney Se Ashtabhuja Shukla

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Specifications
Publisher: HANS PRAKASHAN, DELHI
Author Om Nishchal
Language: Hindi
Pages: 227
Cover: HARDCOVER
9.0x6.0 Inch
Weight 390 gm
Edition: 2025
ISBN: 9789349232365
HCD749
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Book Description
पुस्तक परिचय

हमारी कविता परंपरा में जहाँ अज्ञेय, कुँवर नारायण, केदारनाथ सिंह, अशोक वाजपेयी, विनोद कुमार शुक्ल और लीलाधर जगूड़ी जैसे कवि है जिनका ध्यान शब्दों और उसकी बारीकियों को महिमा के साथ रचने और गढ़ने का रहा है, वहीं ऐसे कवियों का भी एक बड़ा समूह है जिसने जीवन के संघर्ष और यथार्थ को कविता के केंद्र में रखा है। नागार्जुन की कविताओं में धूसर, गंवई और भदेस-सी दिखने वाली पद संरचना के बावजूद उन्हें पढते हुए कभी यही नहीं लगता कि ये उपमान मैले हो गए है या इन प्रतीकों के देवता कहीं कूच कर गए है। केदारनाथ अग्रवाल के यहां जो गीतिमयता है, किसान, मजदूर और आम आदमी के पक्ष में तथा अंग्रेजी साम्राज्यवाद के विरुद्ध जो बिगुल उन्होंने फूंका है, वह उनके समकालीन किस कवि में नज़र आता है। विडंबना यह है कि जिन कवियों में शास्त्र की रटन्त ज्यादा है. उनके यहां कविता नहीं है। वहां केवल शब्दों का कोलाहल है। त्रिलोचन के सम्मुख भी एक लड़ता हुआ समाज था जिसे वे नई भाषा देने में लगे रहे। लीलाधर मंडलोई, अरुण कमल और अष्टभुजा शुक्ल जैसे कवियों ने कविता में वाचिक का महत्व समझा और उसे माँजा है। अष्टभुजा शुक्ल ने शास्त्र को कभी कविता का आयुध नहीं बनाया। लोक और शास्त्र के संतुलन को वे कुशलता से साधे रहे। अपने व्यापक सामाजिक यथार्थ में ज्ञानेंद्रपति ने भी कविता का एक ऐसा ढांचा हमारे सम्मुख प्रस्तुत किया है जो आधुनिक समाज पर एक क्रिटीक है। शब्दों से गपशप' ऐसे ही कुछ कवियों की कविता से संवाद है। कविता और कवियों से गपशप है। आलोचना की सख्त छवि से बचते हुए कविता से आज ऐसे ही गपशप की जरूरत है जिससे कविता ही नहीं, आलोचना का अंदाजेबयाँ भी बदले। आलोचक अपनी रुढ़ छवि के चौखटे से बाहर आए और कविता के प्रशस्त गलियारे से एक यायावर की तरह गुज़रे; उसकी अर्थच्छवियों में कहीं दूर सैर के लिए निकल जाए और जब वह बोले तो आलोचना की भाषा-भंगिमा भी कुछ बदली-बदली-सी लगे। इस कृति का यही मंतव्य और गंतव्य है।

लेखक परिचय

डॉ ओम निश्चल प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेश के गांव हर्षपुर में 15 दिसंबर, 1958 को जन्मे और लखनऊ एवं अवध विश्वविद्यालय से एमए (संस्कृत), एमए (हिंदी) एवं पीएचडी की उपाधिलब्ध डॉ. ओम निश्चल की साहित्यिक शख्सियत के अनेक पहलू है। वे मूलतः आलोचक तो है ही, जाने-माने कवि, गीतकार और राजलगो भी है। भाषा से उनका रिश्ता पेशेवर रहा है। कविता में उनकी उपस्थिति का साक्ष्य उनका संग्रह 'शब्द सक्रिय हैं' है, जो 1987 में प्रकाशित हुआ तथा अभी हाल ही में उनकी गज़लों के संग्रह 'मेरा दुख सिरहाने रख दो', 'ये जीवन खिलखिलाएगा किसी दिन', 'कोई मेरे भीतर जैसे धुन में गाए' व 'ये मन आषाढ़ का बादल हुआ है' आए हैं। वे आज के बेहतरीन गीतकारों में शुमार किए जाते हैं। इसकी वजह शायद यह कि उन्होंने बड़े कवियों के संपर्क में रह कर गीत के पद-लालित्य की सीख ली है। ओम निश्चल हिंदी के सुधी आलोचक कवि एवं भाषाविद है तथा शब्दों से गपशप, भाषा की खादी, खुली हथेली और तुलसीगंध, कविता के वरिष्ठ नागरिक, कुंवर नारायणः कविता की सगुण इकाई, समकालीन हिंदी कविताः ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य, कवि विवेक जीवन विवेक, चर्चा की गोलमेज पर अरुण कमल, कविता का भाष्य और भविष्य व कुंवर नारायण पर संपादित कृतियों 'अन्वय' एवं 'अन्विति' सहित उनकी अनेक आलोचनात्मक कृतियां प्रकाशित हो चुकी है। वे हिंदी अकादेमी के युवा कविता पुरस्कार एवं आलोचना के लिए उप्र हिंदी संस्थान के आचार्य रामचंद शुक्ल आलोचना पुरस्कार, जश्ने अदब के शाने हिंदी खिताब, प्रोफेसर कल्याणमल लोढ़ा साहित्य सम्मान, यूको बैंक के अज्ञेय भाषा सेतु सम्मान, इटावा हिंदी सेवा निधि द्वारा गंगदेव सम्मान, लक्ष्मीशंकर मिश्र निशंक साहित्य सम्मान, रामस्वरूप चतुर्वेदी आलोचना सम्मान, माहेश्वर तिवारी साहित्य सम्मान एवं कैरेक्टर ट्री अवार्ड से सम्मानित हो चुके है।

भूमिका

शब्दों से गपशप कभी आसपास कुंवर नारायण हुआ करते थे, उनकी कविताएँ, डायरियां और निबंध। यह हिंदी का सौभाग्य है कि जिस उम्र में लेखकों के चुक जाने की चर्चाएं सुर्खियाँ चनने लगती हैं, उस उम्र में एक कवि जीवन का सर्वोत्तम रच रहा था। यों तो उनकी स्फुट काव्यकृतियां आती ही रही है, 'हाशिये का गवाह' कुछ साल पहले ही आई थी पर 'आत्मजयी' लिख कर भी यह संदर्भउन्हें भीतर से मथता रहा और अपने उत्तर जीवन की वेला में जब वे एक परिपक्व कवि ही नहीं, एक उत्तरदायी पिता भी थे, 'वाजश्रवा के बहाने' एक पिता का अंतः परिष्कार है। एक वयस्श्रेष्ठ कवि नहीं, वयस्श्रेष्ठ नागरिक का भी यही दायित्व है कि वह अगली पीढ़ी को अपने जीवन के कमाए हुए अनुभव देकर जाए। 'वाजश्रवा के बहाने' कवि के कमाए हुए अनुभवों का सार है। यही हाल केदारनाथ सिंह का रहा है। 'टालस्टाय और साइकिल' के बाद 'सृष्टि पर पहरा' एक बार फिर उनके कवित्व का लोहा मनवाने वाला संग्रह था। मिथकों में न जाकर भी वे जैसे जीवन के विस्मृत मूल्यों को अपनी कविताओं में सहेजते हैं। अशोक वाजपेयी भी प्रौढ़ि की इस वेला में जब उत्तर जीवन की धूप और ऊष्मा से उनका कवि व्यक्तित्व अनप्राणित है, अपने कवि दायित्व के प्रति सजग नजर आते हैं। प्रेम जीवन का एक ऐसा संदेश है जो कभी बासी नहीं होता। यह जीवन के साथ उदित होता है और जीवनपर्यन्त जीवन के प्रति अनुरक्ति और आसक्ति जगाता है। अज्ञेय और अशोक वाजपेयी का आत्मनेपद प्रेम के संसार में कैसे हिलोरें लेता है, उनकी कविताएँ कैसे निजी होकर भी हमारी चेतना से तादात्म्य बना लेती हैं। शब्दों के मेले में और विस्मृति के अनवरत आच्छादन के बावजूद अज्ञेय के कहे शब्द हमारा पीछा करते हैं, प्रेम में भरोसा दिलाते हैं जियो उस प्यार में जो मैंने तुम्हें दिया है। आसक्तियाँ और वासनाएँ सर्वथा त्याज्य नहीं होतीं, जैसे कुछ रूढ़ियाँ हमारे जीवन में नए अर्थ भरती हैं। 'धरती अब भी हमारे गुनाहो को विस्मृति के क्षमादानों में फेंकती जा रही है', कह कर वाजपेयी ने मनुष्य के हृदय पर एक गहरी चोट तो की ही है, यह कविता में भी ऐसी कचोट पैदा करने की कोशिश है जिसे आगे चल कर अरुण कमल 'मैं किसकी तरफ़ से बोल रहा हूँ।' जैसी कविता में पैदा करते हैं। हमारी कविता परंपरा में जहाँ अज्ञेय, अशोक वाजपेयी और विनोद कुमार शुक्ल जैसे कवि हैं जिनका सर्वाधिक ध्यान शब्दों और उसकी बारीकियों को महिमा के साथ रचने और गढ़ने का रहा है, वहीं ऐसे कवियों का भी एक बड़ा समूह है जिसने जीवन के संघर्ष और यथार्थ को कविता के केंद्र में रखा है। नागार्जुन, जिसका संस्कृत, प्राकृत, मैथिली और बांग्ला जैसी भाषाओं से गहरा साहचर्य रहा हो, वे हिंदी में आए तो यह कविता में एक नई बोलचाल की शुरुआत थी। 'सात दिनों तक चूल्हा रोया चक्की रही उदास', यानी बिल्कुल बतकही के आस्वाद वाली भाषा ने कविता में अपनी जगह बनाई। उनकी कविता की अंतर्वस्तु में धूसर, गंवई और भदेस-सी दिखने वाली पद-संरचना के बावजूद उन्हें पढ़ते हुए कभी यही नहीं लगता कि ये उपमान मैले हो गए हैं या इन प्रतीकों के देवता कहीं कूच कर गए हैं। उनके मैले-कुचैले उपमानों का जादू जगह-ब-जगह बोलता है। केदारनाथ अग्रवाल को ही देखें। कविता में शमशेरियत की चर्चा बहुत की जाती है। वहाँ शिल्प और मितकथन का वैभव देखते ही बनता है। पर केदार जी के यहाँ जो गीतिमयता है, किसान, मजदूर और आम आदमी के पक्ष में तथा अंग्रेजी साम्राज्यवाद के विरुद्ध जो बिगुल उन्होंने फूंका है, वह उनके समकालीन किस कवि में नज़र आता है? विडंबना यह है कि जिन कवियों में शास्त्र की रटन्त ज्यादा है, उनके यहाँ कविता नहीं है। वहाँ केवल शब्दों का कोलाहल है। इसीलिए नागार्जुन इसीलिए नागार्जुन तो यह कहा करते थे कि 'कोई शास्त्र आपको जीवन को समझने में थोड़े ही मदद करेगा। शास्त्र के अनुसार अगर वस्तु और स्थिति को देखियेगा तो फिसल कर गिरियेगा।' त्रिलोचन के सम्मुख भी एक लड़ता हुआ समाज था जिसे वे नई भाषा देने में लगे रहे। अपने एक गीत में उन्होंने जनता पर अपना प्यार कुछ इस तरह लुटाया है: 'हर्ष को बाँट दो /खाइयाँ पाट दो/ और संदेह को मूल से काट दो पाँव की छाप छोड़ो न भूलों भरी।' जीवन और कविता दोनों की समझ जितनी त्रिलोचन को थी, वैसी समझ कम कवियों को होती है। 'अमोला' के बरवै में ऐसे ही अनुभवों का सत्व समाया हुआ है।। इसमें संदेह नहीं कि नई कविता के आभिजात्य से कविता को मुक्ति दिलाने में नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल और त्रिलोचन का बहुत बड़ा योगदान है

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