1857 की क्रांति अंग्रेजों और अंग्रेजी राज के विरुद्ध सबसे सशक्त और तीव्र प्रतिविरोध था। देश का ऐसा कोई भाग, ऐसा कोई कोना नहीं था जहाँ सशस्त्र संघर्ष नहीं हुआ हो। इस संग्राम में मध्यप्रदेश ने एक केन्द्रीयभूत शक्ति के रूप में काम किया। यह संग्राम न केवल प्रदेश के ब्रिटिश क्षेत्रों और रियासतों में लड़ा गया, बल्कि मध्यप्रदेश के सैनिकों ने राज्य से बाहर बिठूर, मेरठ और दिल्ली की लड़ाइयों में भी बढ़-चढकर हिस्सा लिया। इस क्रांति के दौरान में ओरछा और दतिया का संबंध झाँसी, ग्वालियर, बानपुर और चंदेरी केन्द्रों से था। जबकि रीवा, बरोधा और उमौरा, मिर्जापुर से संबंधित थे। वहीं चरखारी, छतरपुर, पन्ना, आजमगढ़ और नागौध का संबंध बांदा केन्द्र से था। ऐसे में जब स्वतंत्रता आंदोलन की आग में देश और प्रदेश का कोना-कोना धधक रहा था तब बघेलखण्ड के शहडोल, उमरिया और अनूपपुर के इलाके भी इससे अछूते नही रहे।
स्वतंत्र जिला बनने के पूर्व अनूपपुर और उमरिया शहडोल जिले के अंतर्गत ही आते थे और इसके भी पूर्व ये तीनों, रीवा रियासत का महत्वपूर्ण हिस्सा थे। भूतपूर्व रीवा राज्य वर्तमान मध्यप्रदेश के उत्तर पूर्वी भाग में रीवा, सीधी, शहडोल और पूर्वी सतना जिलों तक विस्तृत था। वस्तुतः विन्ध्य क्षेत्र की पैंतीस रियासतों में रीवा का प्रमुख स्थान था। अंग्रेजों की कुदृष्ठि तो इस पर थी ही, मराठे भी इस क्षेत्र के प्रति आकर्षित थे। इसी कारण यह मराठों और अंग्रेजों के बीच प्रतिस्पर्द्धा का केन्द्र भी रहा और समय-समय पर इसकी भौगोलिक संरचना में परिवर्तन भी होता रहा। जब अधिकांश देशी रियासतों पर अंग्रेजो का नियंत्रण हो गया तब रीवा महाराज जयसिंह और अंग्रेजों के बीच 1812 में एक संधि हुई और रीवा रियासत अंग्रेजों के संरक्षण में आने को मजबूर हुई।
1857 के क्रांतिकाल में शहडोल, उमरिया और अनूपपुर जिलों में शहडोल के सोहागपुर ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यहाँ जागीरदार गरुड़सिंह और उनके साथी बलवंत सिंह बघेल आदि ने क्रांति की कमान संभाली थी। उमरिया जिले में स्थित बांधवगढ़ अपनी प्राकृतिक विशेषताओं और विशाल किले के कारण अंग्रेजों के लिए आकर्षण का केन्द्र था। यह लंबी अवधि तक रीवा रियासत की राजधानी भी रहा। यहां पर भी जनमानस का क्रांति में महत्वपूर्ण योगदान रहा। इसी तरह पूर्व में शहडोल और अब उमरिया जिले का हिस्सा चंदिया भी आंदोलन का केन्द्र रहा इस क्षेत्र में क्रांतिकारियों की कमान ठाकुर रणमत सिंह ने संभाली थी। रणमत सिंह मनकहरी के निवासी थे, प्रारंभ में वे पन्ना रियासत में नौकरी करते थे, पन्ना राज्य छोड़ने के बाद वे चरखारी आये और फिर तात्या टोपे और नाना साहब पेशवा से प्रेरणा लेकर रीवा राज्य में तीन वर्ष से भी अधिक समय तक लगातार क्रांतिकारी गतिविधियों में संलग्न रहे।
स्वतंत्रता आंदोलन के दूसरे चरण में 1920-21 में महात्मा गांधी द्वारा देश भर में छेड़े गये असहयोग आंदोलन का प्रभाव भी इन जिलों में व्यापक रूप से दिखाई दिया। वस्तुतः यह वह समय था जब महात्मा गांधी देश के सबसे प्रभावी नेता और संत की छवि के रूप में पहचाने जाने लगे थे। उनके एक आंदोलन से ही बड़ी संख्या में लोग उनके अनुयायी हो जाते थे और राष्ट्रीय आंदोलन में उनके बताए मार्ग पर चल पड़ते थे। शहडोल, उमरिया और अनूपपुर के लोगों में विशेष रूप से नवयुवकों में गांधीजी के प्रति अपार श्रद्धा और आस्था थी। इस काल में नवयुवक शंभुनाथ शुक्ल के साथ अनेक नवयुवकों ने उमरिया, शहडोल, अनूपपुर और बुढ़ार आदि क्षेत्रों में स्वतंत्रता आंदोलन की गतिविधियों में भाग लिया। 1931 में बघेलखण्ड कांग्रेस कमेटी की स्थापना से नवयुवक इस स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने के लिए प्रेरित हुए। कप्तान अवधेश प्रताप सिंह ने शहडोल के गाँवों और छोटे-छोटे कस्बों में सभाएं करके यहां के जनमानस को जाग्रत किया। 1930 के सविनय अवज्ञा और 1942 के भारत छोड़ों आंदोलन में भी इनकी अग्रगण्य भूमिका रही। रीवा में जहां 'अंग्रेजों रीवा छोड़ो' का नारा दिया गया वहीं शहडोल के बुढ़ार में 'तिलक दिवस' मनाया गया और एक विशाल जनसभा में अंग्रेजों के विरुद्ध आखिरी युद्ध के लिए जनता का आह्वान किया गया। 1942 में ही भारत छोड़ों आंदोलन के अंतिम पड़ाव में राष्ट्रवादी और गांधीजी के अनुयायी स्वामी माधवानंद सरस्वती ने शहडोल में सत्याग्रह का बीड़ा उठाया। यहां के स्वतंत्रता आंदोलन में कुंज बिहारी अग्रवाल, नानकचंद जैन, रतनचंद जैन, रामशोभित तिवारी, आधार सिंह, हरिनारायण सिंह, महादेव प्रसाद, छोटेलाल पटेल सहित अनगिनत सेनानियों ने इस राष्ट्रवादी आंदोलन में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
प्रस्तुत पुस्तक 'मध्यप्रदेश में स्वाधीनता संग्राम शहडोल, उमरिया और अनुपपुर' के लेखन का दायित्व प्रदान करने के लिए मैं स्वराज संस्थान संचालनालय, भोपाल की विशेष रूप से आभारी हूँ जिन्होंने मुझे यह महत्वपूर्ण कार्य करने का सुअवसर प्रदान किया। इस श्रमसाध्य कार्य को पूर्ण करने में मुझे प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से जिन महानुभावों का सहयोग प्राप्त हुआ उनका भी मैं सादर धन्यवाद करती हूँ।
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