शाजापुर जिले का स्वातंत्र्य समर पूरी तरह आगर केन्द्रित रहा है, क्योंकि आगर में ही अंग्रेज छावनी स्थापित हुई। दिल्ली-आगरा तक के पहुँच मार्ग पर स्थित होने के कारण शाजापुर नगर तत्कालीन समय में क्रांतिकारी गतिविधियों का एक महत्वपूर्ण केन्द्र बना। कुछ क्रांतिकारी घटनाएँ सुसनेर, बेरछा, नरवर, शुजालपुर और बड़ौद में भी हुई। उस काल में शाजापुर में जेल नहीं होने के कारण यहाँ हुए स्वाधीनता आंदोलन के अधिकांश संदर्भ सारंगपुर, राजगढ़ (ब्यावरा), गुना, उज्जैन आदि की जेलों में बिखरे पड़े हैं। 1857 के घटनाक्रम के बहुत अधिक साक्ष्य प्रत्यक्ष रूप से प्राप्त नहीं होते हैं फिर भी पुरातत्व, इतिहास और साहित्य ने मिलकर इस कमी को पूरा करने का प्रयास किया है।
शाजापुर जिले के स्वाधीनता संग्राम को लेखबद्ध करने का कार्य न तो सहज-सरल था और न ही जिला परिक्षेत्र तक सीमित। इसके लिए अनेक संदर्भजहाँ महाराष्ट्र के स्वातंत्र्य समर के इतिहास से प्राप्त हुए वहीं कुछ संदर्भ शाजापुर जिले के ठेठ ग्रामों से भी प्राप्त हुए। इस संदर्भ में ग्वालियर रियासत के हिन्दी, अंग्रेजी गजट तथा शाजापुर जिले के हिन्दी, अंग्रेजी गजट भी विशेष रूप से सहायक रहे।
1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की 150 वीं वर्षगाँठ के अवसर पर विविध प्रकाशनों में स्वाधीनता आंदोलन से संबंधित अनेक व्यक्तियों और घटनाओं के उल्लेख, मध्यप्रदेश स्वतंत्रता संग्राम सैनिक संघ के महाअधिवेशनों तथा अन्यान्य अवसरों पर प्रकाशित स्मारिकाओं से भी इस संबंध में बहुमूल्य जानकारियाँ प्राप्त हुई।
संदर्भों की दृष्टि से इतिहास विषय में विशिष्ट अभिरूचि रखने वाले श्री गणेश दत्त शर्मा 'इन्द्र', श्री कमल जैन श्री जगदीश जी भावसार, श्री कृष्ण कुमार अष्ठाना, श्री श्रीधर पराड़कर आदि अनेक चिंतकों की लेखनी इस शोध आलेख का आधार बनी।
अपने इस प्रयास में सहयोग व मार्गदर्शन के लिए मैं, माधवराव सप्रे संग्रहालय भोपाल, डॉ. विष्णु श्रीधर वाकणकर शोध संस्थान भोपाल, विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन और देवी अहिल्या विश्वविद्यालय, इंदौर का हृदय से आभारी हूँ।
यह पुस्तक 'मध्यप्रदेश में स्वाधीनता संग्राम शाजापुर-आगर मालवा' जिले के लगभग सभी ज्ञात एवं अज्ञात अमर बलिदानियों और स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के प्रति विनम्र श्रद्धांजलि स्वरूप समर्पित है। मैं उन समस्त वरिष्ठजनों का आभारी हूँ जिन्होंने उक्त कार्य के लिये मेरा मार्ग प्रशस्त किया। मैं स्वराज संस्थान संचालनालय, संस्कृति विभाग, मध्यप्रदेश का भी विशेष आभारी हूँ तथा इस पुस्तक में प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से सहयोग के लिए सभी का धन्यवाद ज्ञापित करता हूँ।
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