इस पृथ्वी पर आदिकाल सतयुग का जब प्रारम्भ हुआ, उस समय की प्रकृति सम्पूर्ण सतीप्रधान थी, खेती द्वारा पौष्टिक शुद्ध अन्न, फल, सब्जियां दूध आदि प्राप्त होते थे, इसलिए हरेक की काया सम्पूर्ण निरोगी थी। हर मानव, मन और तन की शुद्धता के फलस्वरूप दिव्य गुणों से सम्पन्न देवी-देवता कहलाते थे।
आपसी स्नेह, सहयोग, सद्भावना, सुख, शान्ति, पवित्रता के कारण भारत सुख-शान्ति, धनधान्य सम्पन्न सोने की चिड़िया थी। सृष्टि चक्र के नियम प्रमाण धीरे-धीरे मनुष्य आत्मा के साथ-साथ प्रकृति के पांचों तत्व भी सतोप्रधान से सतो, रजो, तमो अवस्था में आते गये, जिसके फलस्वरूप आत्मा और प्रकृति दोनों की शक्तियां क्षीण होती गई। मध्यकाल में आत्मा अपने मूल पवित्र स्वरूप को भूल देह-अभिमान के वशीभूत हो गई, जिससे उसमें सब विकार प्रवेश हुए, फलस्वरूप जनसंख्या में उत्तरोत्तर बढ़ोतरी होती गयी, आवश्यकताये बढ़ती गयी। स्वार्थ वृत्ति ने अपनी ऐसी छाया डाली जो प्रकृति के साथ मनुष्य आत्माओं ने खिलवाड़ किया, उसे शोषित किया। दूसरे महायुद्ध के दौरान खेती की उपज बढ़ाने के लिए रासायनिक खाद तथा कीटनाशकों का इस्तेमाल किया जाने लगा। वर्तमान काल में अधिक अन्न उपजाने की लालसा से अनेक नई-नई विधियां अपनाई गई। जनसंख्या जैसे बढ़ती गई वैसे खेती पर अनाज उत्पादन का दबाव बढ़ता गया। परिणामस्वरूप धरती माँ की शक्ति भी क्षीण होने लगी। उपजाऊ धरती बंजर-ऊसर आदि में परिवर्तन होने लगी। प्रकृति के सभी तत्व अपना सन्तुलन खोने लगे। लोभ एवं हिंसक वृत्तियों से उपजाये हुए अन्न ने सबकी मनोवृत्तियों को भी हिंसक बना दिया, मन और तन में अनेकानेक नई-नई बीमारियों ने अपना स्थान बना लिया। तत्वों के असंतुलित परिवर्तन से कहीं सूखा, भूकम्प, सुनामी और कहीं पर बाढ़ के हालात बन गये। प्राकृतिक आपदाओं के साथ-साथ खेती पर अनेक प्रकार की कीट तथा बीमारियों (रोग) ने भी अपना प्रभाव डाला। यह सब मनुष्य आत्मा के दूषित कर्मों व स्वार्थ वृत्तियों का ही परिणाम है।
'जागतिक अन्न और कृषि संगठन 1988', रोम के निष्कर्ष अनुसार शाश्वत ग्राम विकास करने के लिए नैसर्गिक साधन सामग्री का योग्य व्यवस्थापन करना अति आवश्यक है। मानव की मूल आवश्यकतायें जैसे अन्न, वस्त्र, निवास सहज प्राप्त हो इसके लिए मानव को सचेत रहना होगा ताकि आने वाली नई पीढ़ी भी सुख-शान्ति से रह सके। इसकी पूर्ति के लिए जमीन, जल, वनस्पति, पशु, पंछी एवं जैविक विविधता का योग्य संवर्धन शाश्वत खेती उत्पादन के लिए पर्यावरण को संतुलित रखना भी जरूरी है। इसलिए आर्थिक एवं सामाजिक दृष्टि से भी मान्य "तन्त्र ज्ञान" विकसित करना पड़ेगा।
खेती के अधिक उत्पादन के साथ किसने कैसे उत्पादित किया, यह बात भी स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण है। अतः अब समय की पुकार है अपने शाश्वत स्वरूप को पहचान कर यौगिक प्रक्रिया को समझकर और अपनाकर शाश्वत यौगिक खेती का प्रयोग व प्रसार करें, जिससे हम पुनः उस स्वर्णिम काल को प्रत्यक्ष रूप दे सकें।
प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय के साथ उसकी सहयोगी संस्था राजयोग एज्यूकेशन एण्ड रिसर्च फाउण्डेशन के ग्राम विकास प्रभाग द्वारा पिछले दो वर्षों से भारत वर्ष के किसान भाई बहिनों को "शाश्वत यौगिक खेती" के विषय में जागृत किया जा रहा है। इस विद्यालय से संलग्न महाराष्ट्र तथा गुजरात के कई राजयोगी किसान भाई बहनों ने अपनी खेती पर राजयोग की शक्तियों का प्रयोग किया है, साथ-साथ जैविक खाद के नवीन नुस्खे तैयार करके अपनी खेती को बहुत अच्छा उपजाऊ बनाकर खेती कर रहे हैं. जिसके फलस्वरूप वे कम से कम खर्चे में बहुत अच्छी फसल ले रहे हैं। यह नये युग के लिए एक नया कदम है।
परमपिता परमात्मा, जो इस सृष्टि के आदि मध्य अन्त के ज्ञाता, ज्ञान के सागर, सुख शान्ति के दाता हैं. अपने बच्चों को पुनः राजयोग सिखलाकर उनकी मनोवृत्तियों में परिवर्तन ला रहे हैं। उनकी श्रेष्ठ मत है-"बच्चे अपने स्वरूप को पहचानो, स्वधर्म में स्थित होकर मुझ ज्ञान सूर्य पिता परमात्मा के साथ अपना बुद्धियोग जोड़ लो तो मेरी शक्तियां आपके संकल्पों को शक्ति सम्पन्न बना देंगी। फिर आपके शुद्ध श्रेष्ठ संकल्प हर सिद्धि को प्राप्त करेंगे। असम्भव भी सम्भव हो जायेगा। यह कोई चमत्कार नहीं लेकिन यह आध्यात्मिक कृषि विज्ञान है। इसमें परमात्म शक्ति और आत्म शक्ति के संकल्पों का श्रेष्ठतम प्रयोग है, जो शुद्ध श्रेष्ठ शक्तिशाली भावनाओं के प्रकम्पन द्वारा सम्पन्न हो सकता है।"
अतः अब समय आ गया है अपने अन्नदाता किसानों को जागृत करने का। वे अपने श्रेष्ठ स्वमान और शक्ति को पहचानें। शुभ भावना है कि सर्वप्रथम किसान वर्ग राजयोग की विधि सीखकर अपनी खेती के कुछ भाग में उसका प्रयोग करके सफलता सम्पन्न अनुभवी बनें। उसमें किसी भी प्रकार की रासायनिक खाद वा कीटनाशक जहरीली दवाओं का प्रयोग किये बिना घर में तैयार की हुई जैविक खाद द्वारा खेती को सशक्त बनायें फिर उसमे योग की सकाश का, आत्मा के सातों गुणों का एकाग्रता और दृढ़ता के साथ प्रयोग करके अपने निजी उपयोग में आने वाले शुद्ध, सात्विक, अन्न, फल वा सब्जियां उपजायें। इसमें सफलता प्राप्त करने के पश्चात् अपने सम्बन्ध सम्पर्क में आने वाले किसान भाई बहिनों को भी प्रेरणा दें ताकि हर एक आध्यात्मिक शक्तियों को पहचाने और सम्पूर्ण विश्व एवं भारत देश पुनः धनधान्य सम्पन्न वन विश्व गुरु की पदवी प्राप्त करे तथा परमात्म कार्य की प्रत्यक्षता हो।
इसी शुभ भावना से यह "शाश्वत यौगिक खेती" नामक पुस्तक तैयार की गयी है। आशा है किसान भाई-बहनों को इस पुस्तक द्वारा खेती करने की नवीन विधि की सही जानकारी प्राप्त होगी।
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