बौद्ध धर्म में गृहस्थ एवं प्रव्रजित के अलग-अलग नियम हैं। दोनों का उद्देश्य एक होते हुए भी आकल्प, जीविका आदि के अनुसार जीवन के परिपालनीय कर्तव्य भिन्न-भिन्न हैं। गृहस्थ सांसारिक कामभोगों का उपभोग करते हुए निर्वाण-मार्गगामी होता है, किन्तु प्रव्रजित पंचेन्द्रियों में संयम करते हुए सांसारिक बन्धनों एवं विषय-वासनाओं से रहित होकर अमृत-पद निर्वाण को प्राप्त करने का प्रयत्न करता है, अतः दोनों के कर्तव्य एवं पारिपालनीय नियम भिन्न-भिन्न होने स्वाभाविक हैं। गृहस्थ-विनय के सम्बन्ध में बहुत कुछ प्रकाशित हो चुका है। मेरा 'बुद्धधर्म के उपदेश' बौद्ध गार्हस्थ्य-धर्म ही है, किन्तु प्रव्रजित के लिए उपयोगी साहित्य का प्रकाशन हिन्दी भाषा में बहुत ही कम हुआ है। अतः भिक्षु सुगतानन्द जी का आग्रह था कि भिक्षु प्रातिमोक्ष तथा श्रामणेर विनय को प्रकाशित किया जाए। उन्होंने इन ग्रन्थों के प्रकाशन के निमित्त तुरन्त चार हजार रुपये दिये और प्रकाशन की व्यवस्था हो गई। मैंने प्रकाशनमाला का नाम भिक्षु सुगतानन्द जी के ही नाम पर रखना उचित समझा। इसके अन्तर्गत बुद्ध-सन्देश, भिक्षु प्रातिमोक्ष, श्रामणेर विनय और विपश्यना पद्धति- ये चार ग्रन्थ प्रकाशित हो रहे हैं, जिनमें प्रथम दो प्रकाशित हो चुके हैं और यह तृतीय पुष्प प्रस्तुत किया जा रहा है।
इस ग्रन्थ में चार परिच्छेद हैं- (१) वन्दना, (२) परित्रपाठ, (३) प्रव्रज्याविधि और (४) व्रत-स्कन्धक पहले परिच्छेद में पूजा-पाठ की विधियाँ बतलाई गई है। दूसरे में परित्राण के २३ सुत्त एवं गाथायें दी गयी हैं। मैंने कुछ परित्राणों को अनुपयोगी एवं असामयिक समझ कर यहाँ नहीं दिया है किन्तु सभी महत्वपूर्ण परित्र इसमें आ गए हैं। तीसरे परिच्छेद में प्रव्रज्या-विधि के साथ ही श्रामणेर के लिए उपयोगी विपश्यना भावना सम्बन्धी कुछ आवश्यक अंश, श्रामणेर-शिक्षा और ७५ सेखिय भी दे दिए गए हैं। चौथे परिच्छेद में आचार्य-शिष्य के व्यावहारिक कर्तव्य दिए कहते हैं। इनका पालन आवश्यक होता है। कहा है-
वत्तं न परिपूरेन्तो सीलं न परिपूरति। असुद्धसीलो दुप्पो दुक्खा न परिमुञ्चति।।
अर्थात् जो व्रत को पूर्ण नहीं करता, वह शील को भी पूर्ण नहीं करता है। वह अशुद्ध शीलवाला मूर्ख दुःख से नहीं छूटता है।
श्रामणेरों को इन नियमों का जानना आवश्यक है। बिना इन नियमों को जाने न तो व्रतों को पूर्ण किया जा सकता है और न शीलों को ही, अतः सभी श्रामणेरों को आदरपूर्वक श्रामणेर-विनय को पढ़ना, सीखना और अभ्यास करना चाहिए। कहा है-
यो गवं न विजानाति न सो रक्खति गोणकं। एवं सीलं अजानन्तो किं सो रक्खेय्य संवरं ।।
अर्थात् जो गौ को नहीं जानता है वह गौ की रक्षा नहीं करता है, ऐसे ही शील को नहीं जानने वाला भला क्या संयम करेगा?
इस ग्रन्थ में कुछ ऐसी बातें भी अपेक्षित थीं जिन्हें प्रत्येक प्रव्रजित को जानना आवश्यक है, किन्तु वे श्रामणेर विनय के अन्तर्गत न आकर सभी प्रव्रजितों के लिए ज्ञातव्य है अतः उन्हें मैं सबके हितों के लिए यहाँ दे रहा हूँ-
प्रव्रज्या के लिए अयोग्य व्यक्ति
निम्नलिखित प्रकार के व्यक्तियों को प्रव्रज्या देने की मनाही भगवान् ने की है। ऐसे व्यक्तियों को प्रव्रजित करना दुष्कृत माना गया है-
(१) जिन्हें कुष्ठ, फोड़ा, चर्मरोग, शोथ और मृगी हो, (२) जो राजसैनिक हों, (३) जो ध्वजवन्ध डाकू हों, (४) जो जेल तोड़कर निकल भागने वाले डाकू हों, (५) जो लिखित चोर हों, (६) जिन्हें कोड़ा मारने की सजा मिल चुकी हो, (७) जो राजदण्ड से लक्षणागत हों अर्थात् दागे गए हो, (८) जो ऋण लेकर बिना चुकाये ऋणी हों, (९) जो दास हों।
ऐसे भी व्यक्तियों को श्रामणेर बनाना दुष्कृत है-
कटे हाथ, कटे पैर, कटे हाथ-पैर, कटे कान, कटे नाक, कटे नाक-कान, कटी अँगुली, नोक कटी अँगुली, पोर कटी अँगुली, सभी अँगुलियों के कट जाने से फण जैसे हाथ वाले, कुबड़े, बौने, घेघे वाले, बुरे रोग वाले, परिषद् दूषक, काने, लूले, लँगड़े, पक्षाघात वाले, ईर्यापथ-रहित (चल-फिर सकने में असमर्थ), बहुत बूढ़े, अंधे, गूँगे, बहिरे, अंधे और गूँगे, अन्धे और बहिरे तथा आँधे मूँगे।
आयु और अनुमति
जो बच्चा कौवा उड़ाने में समर्थ हो उसे श्रामणेर बनाया जा सकता है, किन्तु उपसम्पदा की आयु प्रतिसन्धि-चित्त ( माँ के पेट में आने के समय) से लेकर २० वर्ष की होनी अनिवार्य है। २० वर्ष की आयु से कम की उपसम्पदा नहीं हो सकती। प्रव्रज्या के लिए माता-पिता की आज्ञा भी अनिवार्य है। जिसे माता-पिता की आज्ञा न मिली हो उसे प्रव्रजित नहीं करना चाहिए। प्रव्रज्या देने से पूर्व मुण्डन-कार्य के लिए भी यह कह कर संघ से अनुमति प्राप्त कर लेनी चाहिए "संङ्घ भन्ते! इमस्स दारकस्स भण्डुकम्मं आपुच्छामि।
अन्य सारी बातें श्रामणेर-विनय में आई हुई हैं। जो बातें इसमें नहीं हैं उन्हें विस्तार-भय से भी नहीं दिया गया है। उनके लिए 'विनयपिटक' अवलोकनीय है।
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