भूमिका
यह किताब पहले बोली और फिर लिखी गई है। वेदांत दार्शनिक और शिक्षक के रूप में आचार्य प्रशांत डेढ़ डेढ़ दशक से अधिक समय से विविध श्रोताओं के साथ संवाद करते रहे हैं। प्रत्येक संवाद आमतौर पर प्रश्नोत्तर के रूप में होता है। प्रश्नकर्ता विविध पृष्ठभूमियों से आते हैं और आचार्य प्रशांत उनकी विस्तृत जिज्ञासाओं का समाधान देते हैं। इस तरह की प्रत्येक बातचीत की लंबाई दस मिनट से एक घंटे तक होती है। इस पुस्तक का प्रत्येक अध्याय ऐसे ही बातचीत प्रसंगों पर आधारित है। प्रत्येक अध्याय यद्यपि एक ही केंद्र से आ रहा है, तथापि वक्ता की प्रतिक्रिया प्रस्तुत प्रश्नकर्ता और उनके विशिष्ट जीवन-प्रश्नों पर है। प्रश्नकर्ताओं में वे सभी भिन्नताएँ मौजूद हैं, जो एक व्यक्ति को दूसरे से अलग बनाती हैं, जैसे कि उम्र, लिंग, आयु, विचारधारा इत्यादि। परिणामस्वरूप जैसे-जैसे पाठक आंतरिक स्पष्टता की चाह से मानवीय परिस्थितियों की सीमा, उलझनों और प्रश्नों की ओर बढ़ते हैं, उनको एक समृद्ध बहुरूपदर्शक परिप्रेक्ष्य मिलता है। और इसी आंतरिक स्पष्टता की चाह में पाठक का सामना होता है अपने बंधनों से तथा संभावित समाधानों से। मानव मन में अगर कोई सबसे आकर्षक शब्द रहा है तो वह है मुक्ति। प्रतिपल हम स्वयं को किसी-न-किसी बंधन में पाते हैं, और वहीं हमारी मुक्ति की तलाश शुरू होती है। अकसर हम अपने बंधनों को खोजने पर पाते हैं कि वे बाहरी हैं, इसलिए हमारी मुक्ति की तलाश भी बाहरी ही होती है। यह तलाश, कहने की आवश्यकता नहीं, अपूर्ण ही रह जाती है। आज के जटिल जीवन में मुक्ति भी हमें जटिल लगने लगी है-इस जटिलता को आसान बनाने का प्रयास इस पुस्तक में किया गया है। यह पुस्तक में किया गया है। यह पुस्तक हमें हमारे मूल बंधनों को देखने की दृष्टि प्रदान करेगी। आचार्य प्रशांत कहते हैं कि बाह्य बंधनों से तो हमें मुक्ति चाहिए ही, परंतु आंतरिक बंधनों और कमजोरियों से मुक्ति और ज्यादा आवश्यक है। हम जन्म से ही स्वयं को बद्ध पाते हैं। ऐसे में हमारा एकमात्र उद्देश्य होना चाहिए अपनी बेड़ियों को काटना। भ्रमित जीवन जीना ही बंधन है और विवेकपूर्वक सत्य का साहसिक चुनाव करना ही मुक्ति है। यह चुनाव हमें ही करना है, तो स्वयं को एक मौका दें। स्वयं को असहाय और कमजोर मानकर बंधनों के साथ जीते रहने में कोई समझदारी नहीं। आपका स्वभाव है मुक्ति। अगर आप भी मुक्त गगन में उन्मुक्त उड़ान भरने के इच्छुक हैं, तो यह पुस्तक आपके लिए है। अस्वीकरण : साधकों और उनके प्रश्नों के बीच बहुत सी विविधताएँ होती हैं, इसीलिए आचार्य प्रशांत के उत्तर भी प्रश्नकर्ता की स्थिति और प्रश्नों के अनुकूल ही होंगे। इन्हें मानकीकृत करना उचित नहीं होगा। कुछ जगहों पर एक अध्याय में दिए गए जवाब ऊपरी तौर से दूसरे अध्याय से विरोधाभासी प्रतीत हो सकते हैं। हमारी उम्मीद है कि हमारे विचारशील पाठक सराहने में सक्षम होंगे कि ऐसे सभी भेद एक ही मूल की ओर इशारा करते हुए पृथक् पत्र-पुष्प मात्र हैं।
लेखक परिचय
बेंगलुरु के मूल निवासी। कृषि में स्नातकोत्तर डिग्री धारक। 1985 ई. में केंद्रीय लोक सेवा आयोग के माध्यम से चयनित भारतीय वन सेवा (आईएफएस) अधिकारी। उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड राज्यों में वरिष्ठ बन संरक्षक के रूप में सेवा। भारतीय प्रतिनियुक्ति पर कोयम्बटूर, बेंगलुरु, कोलकाता, नागपुर सहित विभिन्न संस्थानों में सेवा की। विश्व बैंक वन परियोजना के परियोजना नेता और संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम के समन्वयक के रूप में उन्होंने उल्लेखनीय कार्य किया। उत्तर प्रदेश में मुख्य वन संरक्षक/निदेशक के रूप में सेवा करने के बाद सेवानिवृत्त हुए। छात्र जीवन से ही देश और भाषा के प्रति गहरी रुचि रखने वाले उन्होंने कन्नड़ युवा संघ के सचिव, बेंगलुरु कृषि कॉलेज कन्नड़ संघ के अध्यक्ष के रूप में सेवा की और राष्ट्रीय केडेट कोर (एनसीसी), राष्ट्रीय सेवा योजना (एनएसएस) संगठनों में भी सक्रिय रहे। कॉलेज के दिनों में एक खिलाड़ी के रूप में भी उन्होंने ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय युवा परिषद के सचिव और युवा किसान संघ के अध्यक्ष के रूप में भी कार्य किया। विभिन्न पत्रिकाओं में उनके कई लेख और कविताएँ प्रकाशित हुई हैं। उन्होंने समूह गायन और कन्नड़ और हिंदी नाटकों में भी भाग लिया है। उत्तर प्रदेश आकाशवाणी केंद्र में उनके समूह गायन का प्रसारण किया गया है। एक शौकिया फोटोग्राफर के रूप में, उन्होंने नई दिल्ली में आयोजित राष्ट्रीय स्तर की फोटोग्राफी प्रतियोगिता में एक पुरस्कार भी जीता है। उनकी अद्वितीय पर्यावरण चेतना और वन विभाग में सेवा के लिए, उत्तर प्रदेश सरकार ने भारत सरकार को 'इंदिरा प्रियदर्शिनी वृक्ष मित्र' राष्ट्रीय पुरस्कार के लिए सिफारिश की थी। वर्तमान में बेंगलुरु में सेवानिवृत्त जीवन व्यतीत कर रहे हैं
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