लेखक परिचय
अवधलाल मेहता 'अनिल' जन्मः 30 जून 1945, बेलसरा, अंचल-रानीगंज, जिला-अररिया (बिहार) शिक्षाः बी.ए. (ऑनर्स) एम.ए., एम.एड. पेशाः अध्यापन (केन्द्रीय विद्यालय संगठन) सक्रियताः महज स्वाध्याय व्यसनः आत्मचिंतन
पुस्तक परिचय
प्रस्थानत्रयी (गीता, यहासूत्र तथा उपनिषद) में से एक स्तंभ है यह गीता। प्रस्थानत्रर्य में प्रवृत्ति और निवृत्ति दोनों मार्गों का तात्त्विक विवेचन है। मनुष्य जीवन में गीता की अपरिमित उपयोगिता है। आज की भौतिकवादी-उपभोक्तावादी जीवन-शैली में पदे-पदे गीता की उपादेयता है। आज परिवारों का विघटन, संबंधों में बिखराब, नैतिकता, आदर्शवादिता और जीवन मूल्यों का हास हो रहा है और समाज का ढाँचा कमजोर पड़ता जा रहा है। अबाध अनियंत्रित कामनाएँ, यांत्रिक नीरस खोखला जीवन, और भीड़ में भी अकेलापन ने आज आदमी को अशांत एवं आत्मकेंद्रित बना दिया है जिसके कारण वह तरह-तरह की मानसिक बीमारियों से ग्रस्त हो रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के अनुसार वर्तमान में लगभग हर तीसरे व्यक्ति के घर में तनाव, क्रोध एवं अवसाद के शिकार मनोरोगी हैं। लोगों में चिड़चिड़ापन, उन्माद, आक्रामकता, अवसाद, अनिद्रा, भयग्रस्तता, मिर्गी, नशे की आदत बढ़ती ही जा रही हैं। इन सभी समस्याओं में गीता निर्देशन एवं परामर्श मनोविज्ञान (Guidance and Councelling Psychology) का कार्य करती है; परंतु 'गीता मनोविज्ञान' उस अर्थ में मनोविज्ञान नहीं है जिस अर्थ में पाश्चात्य मनोविश्लेणवादियों-फ्रायड, जंग, एडलर, इरिक फ्रॉम, अब्राहम कर्डिनर, केरेन हार्नी, हेरी सुलिवन आदि ने चर्चा की है। पाश्चात्य मनोविज्ञान मन के विश्लेषण पर समाप्त हो जाता है परंतु 'गीता मनोविज्ञान' मनुष्य की परम संभावना को इंगित करता है, चेतना के परम विकास की ओर इशारा करता है।
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