भगवान् मनु ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि श्रुतिस्तु वेदो विज्ञेयो धर्मशास्त्रं तु वै स्मृतिः। (मनुस्मृति-2.10) अर्थात् वेद को श्रुति एवं धर्मशास्त्र को स्मृति कहते हैं। वहीं एक प्रश्न उठता है कि यदि कहीं पर श्रुति एवं स्मृति वचनों में विरोध हो तो उस परिस्थिति में कौन सा वचन प्रमाण माना जायेगा? तो इसका उत्तर देते हुए महर्षि जाबाल ने यह प्रतिपादित किया है कि श्रुतिस्मृतिविरोधे तु श्रुतिरेव गरीयसी। (द्रष्टव्य, मनुस्मृति-2.13 की कुल्लूकभट्टव्याख्या) अर्थात् दोनोंमें विरोध होनेपर श्रुतिवचन को ही प्रमाण मानना चाहिये। वस्तुतः वेद ही समस्त ज्ञान एवं विज्ञान का आधार है। अतः श्रुतिप्रतिपादित विषयों के परिपालन हेतु ही समग्र शास्त्रों की प्रवृत्ति हुई है, यह स्पष्टरूपसे कहा जा सकता है। श्रुति से सम्बन्धित साहित्यको श्रौतसाहित्य कहा जाता है। श्रौतसाहित्य अत्यन्त विशाल तथा विविध विषयोंके प्रतिपादनसे युक्त है। श्रौतसाहित्य समुद्रवत् अपार एवं अगाध है। उस श्रौतसमुद्रमें से विविध विषयानुसार नाना मणियों का चयन कर हमारे ऋषि-महर्षियोंने नाना शास्त्रोंको प्रवर्तित किया है। तत्तत् शास्त्रों के अध्ययन, चिन्तन, मनन एवं अन्वेषण से प्राप्त ज्ञानराशियों को कुसुमचयनात्मक वृत्तिसे अञ्जलिमें समेटते हुये मैंने समय-समय पर राष्ट्रभाषा (हिन्दी) में विविध निबन्धों का लेखन किया था। एवंविध नानाविषयगर्भित चौंतीस (34) निबन्धों को प्रस्तुत करने के उद्देश्यसे श्रुतिज्ञान-कुसुमाञ्जलि नामक इस ग्रन्थ का प्रणयन कर विज्ञ पाठकों के समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ।
प्रकृत ग्रन्थ को पाँच खण्डोंमें विभक्त किया गया है। प्रथमखण्ड में दार्शनिकचिन्तन सम्बन्धी निबन्धों को, द्वितीयखण्ड में याज्ञिकचिन्तन सम्बन्धी निबन्धोंको, तृतीयखण्डमें कर्मकाण्डीयचिन्तन सम्बन्धी निबन्धों को, चतुर्थखण्डमें सांस्कृतिकचिन्तन सम्बन्धी निबन्धोंको तथा पञ्चमखण्ड में प्रकीर्णचिन्तन सम्बन्धी निबन्धों को स्थापित किया गया है।
इस प्रकार यह ग्रन्थ श्रौतविषयक ज्ञानानुसन्धान में संलग्न श्रौतज्ञानपिपासुओं की पिपासा को शान्त करने में अपनी भूमिका का निर्वाह कर सकता है। शोधार्थी एवं सामान्य जनता को वेदविषयक विविध रहस्यात्मक विषयों से परिचित कराने में यह ग्रन्थ अत्यन्त उपादेय होगा, ऐसा मुझे विश्वास है।
इस ग्रन्थ के प्रकाशन हेतु श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के माननीय कुलपति महोदय प्रो. मुरलीमनोहर पाठकजी के प्रति अपनी कृतज्ञता ज्ञापित करता हूँ। इसके साथ ही विश्वविद्यालय के कुलसचिव प्रो. पवन कुमार शर्मा एवं वित्ताधिकारी, श्री संतोष कुमार श्रीवास्तव तथा शोधविभाग के पूर्व अध्यक्ष (सम्प्रति महर्षि पाणिनी संस्कृत एवं वैदिक विश्वविद्यालय, उज्जैन के कुलपति) प्रो. शिवशंकर मिश्र एवं वर्तमान अध्यक्ष प्रो. विष्णुपद महापात्र, शोध-सहायक डॉ. ज्ञानधर पाठक, प्रूफ संशोधक डॉ. जीवन कुमार भट्टराई तथा सम्यक् मुद्रण हेतु डी.वी. प्रिन्टर्स को हार्दिक धन्यवाद प्रदान करता हूँ।
इस कार्य को शोध की दृष्टि से परिपुष्ट करने के लिये माननीय प्रो. राजेश्वर प्रसाद मिश्रजी के प्रति आभार व्यक्त करता हूँ। इन महानुभावों के सहयोग के बिना यह कार्य सम्भव न था। इसके अतिरिक्त मैं अपने पूज्य गुरुजनों का स्मरण करना तो कदापि नहीं भूल सकता हूँ। इसी क्रममें लगमा ब्रह्मचर्याश्रम के संस्थापक परमपूज्य साकेतवासी ब्रह्मचारीजी महाराज के पावन चरणारविन्द में प्रणाम पुष्पाञ्जलि समर्पित कर अपने पूज्य माताजी स्वर्गीय श्रीमती हीरा देवी तथा पूज्य पिताजी स्वर्गीय श्रीशशिकान्तझा के श्रीचरणों में प्रणाम पुष्पाञ्जलि समर्पित करता हूँ।
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