भूमिका
भारतवर्ष महात्माओं और योनियों का देश है। जिस प्रकार योग ज्ञान के बिना योगी को नहीं जाना जा सकता उसी भांति योगी को जाने बिना आध्यात्मिक भारत को नहीं जाना जा सकता। इसीलिये कहा जाता है कि चोग बिना भारत नहीं और भारत बिना योग नहीं। अतः योग साधना सनातन परम्परा है एवं प्रत्येक मनुष्य का आवश्यक कर्तव्य भी। यह खेद का विषय है कि वर्तमान समय के इस सनातन योग के संबंध में अनेक भ्रांतियां व्याप्त है। आजकल यह धारणा है कि कलियुग में योग साधना संभव नहीं। आज का मानव योग साधना क्यों नहीं कर सकता? क्या यह कलियुगी मानव मानब नहीं है ? प्राचीन मानव जिस प्रकार जन्म लेते, जीवित रहते ओर अन्त में मृत्यु को प्राप्त होते थे, क्या आज के मानव के साथ यह सब नहीं होता ? पहले भी मानव के साथ उसके अपने सुख-दुख थे। घर-संसार था, आज भी यह सब है। फिर पार्थक्य कहा है? पार्थक्य केवल विचार व चिन्तन शैली में ही दृष्टिगोचर होती है। प्राचीनकालीन मनुष्य ईश्वर भक्ति में विश्वास रखते थे। योगसाधना के प्रति उनकी तत्परता थी और सादा जीवन यापन करते थे । प्राचीनकाल में आत्मसाधना रहित लोग निन्दा के पात्र होते थे किन्तु आज ठीक विपरीत स्थिति दृष्टिगोचर होती है। आज अधिकांश लोग आरामपसन्द, विलासप्रिय एवं स्वल्पतुष्टि रहित होते हैं। उनमें आध्यात्मिक मनोभाव का अभाव है। आत्मसाधना हीन लोग आज निन्दनीय नहीं माने जाते, बल्कि साधना हीन व वित्तशाली व्यक्ति की समाज में प्रतिष्ठा है। ईश्वर परायणता बिना भक्ति संभव नहीं। आज के ऐसे ईश्वर परायण रहित लोगों को भक्ति मार्ग में धकेल दिया जाय तो क्या इस मार्ग पर चलकर ईस साधना उनके लिये संभव होगा ? भक्तिहीन व्यक्ति को बलात भक्ति मार्ग में धकेलने से उसके अनर्थ होने की संभावना ही अधिक होगी। भक्ति के बिना ईश्वर की साधना संभव नही है। ऐसी दशा में भक्ति अर्जित करनी होगी। यह भक्ति केसे अर्जित की जा सकती है? योग मार्ग प्रारंभ में इसी की शिक्षा देता है। भक्ति भाव आ जाने के पश्चात् ईश्वर साधना भी सहज हो जाता है। अतः योगी श्रेष्ठ भक्त होते हैं। जो अज्ञ हैं तथा जिन्हे आत्मतत्व या ब्रह्म विद्या का ज्ञान नहीं है, केवल वे ही योग व भक्ति मार्ग को भिन्न समझते हैं। योगकर्म ही आत्मलाभ करने का एकमात्र उपाय है। जो योगी नहीं हैं और यदि वे योगमार्ग के विरोध में वक्तव्य दें तो यह न्यायसंगत नहीं होगा । योग विषयक ज्ञान से रहित होकर विज्ञों की भांति बातें करके साधारण अनभिज्ञ लोगों को प्ररोचित मात्र किया जा सकता है, मानव कल्याण नहीं । योगमार्ग का मूल कर्म ही श्वास प्रश्वास से जुड़ा हुआ है। श्वास प्रश्वास की यह क्रिया ही जीव शरीर का प्रमुख अवलम्बन है। इसके बिना जीय देह निर्जीव हो जाता है, फिर इस अवलम्बन के बिना ईश्वर साधन कैसे संभव हो सकता है? इसी श्वास प्रश्वास के कारण ही जीव शरीर में साधना पथ के बाधा कारक काम, क्रोध, लोभ, मोह इत्यादि विराजमान रहते हैं और मन स्वतः ही बहिर्मुखी हो जाता है। बर्हिमुखी मन में ईश्वर भक्ति किस भांति संभव है ? अतः मन को अन्तर्मुखी करके भक्ति लाभ का श्रेष्ठ उपाय है योग । घटाकाश जिस प्रकार महाकाश से वियुक्त नहीं है, उसी भांति जीवात्मा भी परमात्मा से वियुक्त अथवा विच्छिन्न नहीं। अतः समस्त जीव परमात्मा के साथ सदा ही युक्त हैं, किन्तु चंचलतावश तात्कालिक रुप में वियुक्त प्रतीत होते हैं। इसलिए प्रकारान्तर से सभी योगी हैं, परन्तु इस युक्तावस्था की ओर किसी का ध्यान ही नहीं है। प्राणक्रिया रुपी योगकर्म करते रहने से सीधे ही उस युक्तावस्था की ओर लक्ष्य होता है। योगकर्मरत योगी ही इस बात को समझ पाने में समर्थ होते है कि वे किसी भी अवस्था में परमात्मा से वियुक्त नहीं हैं ओर इसीलिए इन्हे योगी कहते हैं। योगी सभी हैं, कोइ जानते हुए ओर कोई अज्ञानतावस नहीं जानते हुए । कुछ लोग इस मत का पोषण करते हैं कि योगमार्ग दुरुह व कठिन होने के कारण सबके लिए संभव नहीं है। योगमार्ग यदि कलियुगी मानवार्थ दुरुह व कठिन होता तब महापुरुष योगिराज श्री श्यामाचरण लाहिड़ी महाशय ने इस पथ का अनुमोदन क्यों किया? उन्होने योगमार्ग का केवल अनुमोदन ही नही किया वरन स्वयं भी परिवार के बीच रहकर, सम्पूर्ण रुप से गृहस्थ जीवन व्यतीत करते हुए बिना किसी वाह्य त्याग किये अपने जीवन में योग आचरण का शत प्रतिशत सफलतम प्रदर्शन भी किया। क्या वे कलियुगी मानव नहीं थे? आज से लगभग एक सौ वर्ष पूर्व ही उन्होने यह धराधाम छोड़ा था, अतः यह कोई पुरानी बात भी नहीं है। परवर्ती काल में अनेक व्यक्तियों ने उनके मार्ग पर चलकर इस योग कर्म द्वारा योग के उच्चतम शिखर पर पहुंचकर उच्चतम आध्यात्मिक सफलतायें प्राप्त की हैं। अतएव भ्रान्त लोगों की बातों से विभ्रान्त होकर यदि योगकर्म का परित्याग कर दिया
लेखक परिचय
ग्रन्थकार योगाचार्य श्री अशोक कुमार चुट्टोपाध्याय अध्यात्म जगत में एक विश्ववरेण्य व्यक्तित्व है। ये काम परेवा जमत है। समय भारतवर्ष में धर्म निर्विशेष रूप से हिन्दुओं, मुसलमानो, ईसाइयों बौद्धों वैना एवं बांग्ला, हिन्दी, उड़िया, असमिया, तेलगू, मराठी, गुजराती मलयालम भाषाभाषियों में इनके शिश्य अनुगामी भरे पड़े हैं। भारतवर्ष के बाहर भी यथा अमेरिका, इशलेष फाँस, स्पेन, कनाडा, आस्ट्रेलिया ८० कोरिया, बांग्लादेश सह अन्य अनेक देशों में इनके बहुत से भक्त शिल्स हैं। भारतीय सनातन धर्म के व्यवहारा योगिराज ओश्यामाचरण लाहिड़ी महाशय की योगसाधना को रक्रियायोग के नाम से सुपरिचित है, के प्रचार व प्रसार के उद्देश्य से समय भारत सह पृथ्वी के विभिन्न देशों का अक्लान्त भाव से इन्होने भ्रमण किया है। इनके जीवन का एक ही उद्देश्य है और वह है योगिराज के आदर्श, उनकी योगसाधना एवं उनके उपदिष्ट ज्ञान भण्डार को पृथ्वीवासियों के समक्ष प्रस्तुत कर देना ताकि चे सत्यलोक एवं सत्य पथ का संन्धात पा सकें। इसी उद्देश्य से अपने असाधारण पाण्डित्य के बल इन्होंने रचना की है बांग्ला भाषा में विभिन्न ग्रन्थों की यथा-श्पुळण पुरुष योगिराज श्रीश्यामावरण लाहिड़ीश, रप्राणामयम् जगतर, श्श्यामाचरण क्रियायोग व अद्वैतवादश श्योग प्रबन्धे भारतात्माश, श्सत्यलोके सत्यचरणर, श्क एइ श्यामाचरणए एवं सम्यादन किया है पाँच खण्डों में प्रकाशित श्योगिराज श्यामाचरण ग्रन्थावली का। भारत के विभिन्न भाषाओं यथा हिन्दी, उड़िया, तेलगू, मराठी, गुजराती, तमिल सह अंग्रेजी एवं फ्राँसीसी
पुस्तक परिचय
भाषाओं में इनके ग्रन्थ अनुवादित व प्रकाशित हो चुके हैं। लोग सटीक क्रियायोग का संधान पा सके इस उद्देश्य से इन्होंने स्थापना की है द० चौबीस परगना के काकद्वीप में श्योगिराज श्यामाचरण सनातन मिशनश की। परवतीं काल में फ्राँस के लेमों शहर के उपकण्ठ में इसको एक शाखा खोली गयी जिसके में चपजपतनस व्यतमबजयत है। अगणित आर्त एवं पोड़ित जन की सुचिकित्सा एवं उनमें अन्न व वस्त्र वितरण में ये सदा ही नियोजित रहते हैं। फ्राँस के पैल सेंट शुगन शहर में महात्मा दलाई लामा की परिचालना एवं न्नहरु, न्छौळ, के सीधे तात्वावधान में विगत सन् १९९७ में आयोजित विश्व-धर्म महासभा में एकमात आमवित भारतीय प्रतिनिधि के रूप में योगदान कर इन्होंने भारत के सनातन योगधर्म को उदात्त श्कण्ठ से विश्ववासियों के समक्ष प्रतिस्थापित किया। इनके असाधारण पाण्डित्य एवं वाग्मिता से मुग्ध हो सम्मेलन में योगदानकारी भिन्न भिन्न धर्मो के प्रतिनिधियों वैज्ञानिकों, दार्शनिकों एवं समुपस्थित समस्त दर्शकों व श्रोताओं ने इन्हें पेम वतजोल क्यहदपपिमक हम, ममत, टपेपवदंतल के रूप में विभूषित किया था। इस महाज्ञानी की जागतिक मानव सेवा, अध्यात्म सेवा एवं साहित्य सेवा से मुग्ध हो तिरूपति राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय ने हाल ही में इन्हें श्वाचस्पतिर (क. स्पजज.) उपाधि से विभूषित किया है।
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