आज के संघर्ष-संकुल समाज की विशेषता यह है कि लोग जीवन के सबसे बुनियादी प्रश्नों का उत्तर चाहते हैं, जैसे मानव जाति किधर जा रही है, सामाजिक-विकास के मार्ग और संभावनाएं क्या हैं, इतिहास के समक्ष मनुष्य, सामाजिक समूहों, वर्गों और राज्यों का उत्तरदायित्व किस बात में निहित है, आज के युग की उग्र समस्याओं का हल क्या है, आदि। ऐसी हालत में हिन्दी कहानी के, जिसका काम इन सभी प्रश्नों के मूल में पैठना ही नहीं, वरन उसके समाधान को सक्रिय रूप से प्रभावित करना भी है, विविध क्षेत्रों का महत्त्व असामान्य रूप से बढ़ जाता है। हिन्दी कहानी का सामाजिक समस्याओं से टकराना, संघर्षों से जूझना और वैज्ञानिक चेतना से अनुप्राणित होकर मुक्ति की राह में मशाल की तरह प्रदीप्त हो उठना, यूं ही नहीं है।
चूंकि हमारा युग महती क्रांतिकारी उपलब्धियों का युग है। राजनीति, अर्थव्यवस्था, भौतिक तथा वैचारिक संबंध, सामाजिक तथा आध्यात्मिक जीवन, आधुनिक मनुष्य की जीवन-पद्धति तथा दैनदिन जीवन, सब कुछ पर क्रांतिकारी परिवर्तनों की छाप है और सब कुछ क्रांतिकारी युग-भावना से निदेशित होता है, इसलिए सामाजिक चेतना से समन्वित सृजन का महत्त्व अत्यधिक रूप से बढ़ जाता है।
समाज एक ऐसी व्यवस्था है, जिसका वस्तुनिष्ठ अस्तित्व है और विकास है। सामाजिक परिवर्तन एक अनिवार्य प्रक्रिया है। चूंकि समाज वर्गों में बंटा है और वर्गों के बीच अंतर्विरोध होते हैं, इन अंतर्विरोधों का विकास ही समाज को आगे बढ़ाता है तथा पुराने समाज की जगह नये समाज की स्थापना की प्रक्रिया को गति प्रदान करता है।
जैसे-जैसे समाज का विकास होता है, अनुभव, विचार, दृष्टिकोण, अनुस्थापन आदि में चेतना आती जाती है। यह चेतना धीरे-धीरे सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक स्तरों पर भी लक्षित होने लगती है। परिवर्तन समाज में होता है, लेकिन उसका प्रतिफलन समाज के प्रत्येक अंगों में दिखलाई पड़ने लगता है। फिर गांव से लेकर शहर तक और राष्ट्र से लेकर विश्व तक सामाजिक परिवर्तन की चेतना से लोग अनुप्राणित हो उठते हैं।
क्या कारण है कि गांधी हमारे लिए क्लासिक हो गये, लेकिन प्रेमचंद अभी भी सामयिक हैं। प्रेमचंद का होरी आज भी गांवों में दम तोड़ रहा है और गोबर शहर में आकर संघर्षों से जूझ रहा है। 'ठाकुर का कुआं' आज भी अछूतों के लिए वर्जित पड़ा है, 'सवा सेर गेहूं' के लिए आज भी बंधुआ बनाये जा रहे हैं, 'पूस की रात' आज भी गांवों में उसी तरह किसानों को दुख दे रही है और पेट की आग बुझाने के लिए विवश आदमी आज भी 'कफन' के पैसों से अपनी क्षुधा शांत करने में लगा हुआ है। फर्क कहां आया है ?
ये कहानियां इतिहास की धरोहर नहीं तो और क्या हैं? इतना ही नहीं, ये कहानियां साबित करती हैं कि वास्तविक इतिहास की रचना व्यक्ति नहीं, बल्कि मनुष्यों का. जन-समूह किया करता है। यह बात कि जनता ऐतिहासिक कार्य का विषयवस्तु ही नहीं, पात्र भी है, इतिहास के क्रांतिकारी युगों में विशेष तौर पर स्पष्ट होकर सामने आती है। एकमात्र चीज जो कुछ समय के लिए जनता को इतिहास की विषयवस्तु बना देती है, यह कि शोषण के कारण वह निष्क्रिय, पददलित और अपमानित रहती है। परंतु जब वह अपने हितों के लिए संघर्ष करने के लिये पीठ सीधा करके उठ खड़ी होती है, तब वह अपने क्रिया-कलाप की छाप इतिहास के पूरे मार्ग पर छोड़ देती है।
अतः भारतीय समाज के लिए, भारतीय समाज के तथ्यों पर आधारित यथार्थवादी पृष्ठभूमि में वर्तमान के हृदय-स्पंदन को समझना आज की महती आवश्यकता है। क्योंकि यह पहली दशा है, जिसमें भारत के उपेक्षित गांवों में प्रथाओं और रूढ़ियों के बोझ से दबे मानवता के एक अंग पर प्रकाश डाला जा सकता है। और इसके साथ ही शहरों की गंदी बस्तियों के दुर्गंध और विशाल अट्टालिकाओं के झरोखों से निकलने वाले सुगंध के बीच टकराव का इशारा किया जा सकता है, क्योंकि यह बदलते विश्व-बोध का पहला प्रतीक है।
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