तत्त्वोपप्लवसिंह, भारतीय दर्शन का आठवीं शताब्दी का ग्रन्थ है, जो जयराशि भट्ट द्वारा कृत है। यह ग्रन्थ मूलतः वितण्डा पद्धति में लिखा गया है। वैतण्डिक पद्धति का अर्थ यह है कि स्वंय के मत का प्रतिस्थापन किये बिना ही विभिन्न दार्शनिक मतों का खण्डन करना अथवा उन्हें अतार्किक सिद्ध करना। तत्त्वोपप्लवसिंह के अनुसार ज्ञान का कोई भी स्रोत वैध नहीं है। अतः हमें किसी भी प्रकार का निश्चित ज्ञान प्राप्त नहीं हो सकता है। तत्त्वोपप्लवसिंह में जयराशि भट्ट का कहना है कि "लक्षण के द्वारा प्रमाण व्यवस्थित होता है और व्यवस्थित प्रमाण के द्वारा प्रमेय की सिद्धि होती है। अतः तार्किकों के कल्पित लक्षणों पर ऐसा मार्मिक प्रहार करना चाहिए कि एक भी लक्षण सिद्ध हो न सके, लक्षण के सिद्ध न हो सकने पर न तो प्रमाण व्यवस्थित हो सकेगा और न प्रमेय वर्ग की सत्ता ही सिद्ध हो सकेगी।" तत्त्वोपप्लवसिंह चार्वाक का ग्रन्थ माना गया है, तथापि वह न्याय, बौद्ध, जैन, सांख्य और मीमांसा के सभी सिद्धान्तों का खण्डन करने के साथ ही चार्वाक द्वारा स्वीकृत प्रत्यक्ष प्रमाण का भी खण्डन करता है। इसी कारणवश इन सभी सिद्धान्तों के खण्डन की समीक्षा करना रुचिकर प्रतीत होता है।
अध्याय प्रथम में जयराशि भट्ट के द्वारा न्याय, बौद्ध, मीमांसक और सांख्य दर्शन के द्वारा प्रत्यक्ष प्रमाण के खण्डन हेतु दिये गये तर्कों का विवरण दिया गया है। जयराशि भट्ट के अनुसार न्याय द्वारा प्रत्यक्ष की, जो परिभाषा 'इन्द्रियार्थसन्निकर्ष' द्वारा दी गई है, जिसके अनुसार इन्द्रियों और अर्थ के सन्निकर्ष से उत्पन्न ज्ञान को प्रत्यक्ष कहा जाता है, जो अव्यपदेश्य, अव्यभिचारी, तथा व्यवसायात्मक होता है, वह तार्किक नहीं है। जयराशि भट्ट का आक्षेप है कि 'अव्यभिचारों पद का यहाँ क्या अर्थ है? क्या दोष से रहित कारक समूह के द्वारा उत्पन्न होने से है? या उसकी प्रवृत्ति की सामर्थ्य के कारण कहा गया है? अथवा किसी अन्य कारण से कहा जाता है।
इसके उपरान्त जयराशि भट्ट बौद्धों के द्वारा प्रत्यक्ष को कल्पनारहित एवं अभ्रान्त स्वीकार करने के विरुद्ध कहते हैं कि यदि कल्पना को ही अपोहित किया जाये तो आपके अनुसार कल्पना क्या है? पुनः अनेक प्रश्नों का उत्पन्न होना स्वाभाविक ही है कि क्या गुण, कर्म, जाति आदि विशेषण के द्वारा उत्पादित ज्ञान को कल्पना कहा जायेगा? या स्मृति द्वारा उत्पन्न जान कल्पना है? या स्मृति ही कल्पना है?
जयराशि भट्ट मीमांसकों के द्वारा स्वीकृत प्रत्यक्ष की अवधारणा का खण्डन करते हैं जिसके अनुसार विषयों के साथ इन्द्रियों के सम्प्रयोग के बाद की बुद्धिवृत्ति को ही प्रत्यक्ष स्वीकार किया गया है। उनके अनुसार इसे कैसे प्रत्यक्ष कहा जा सकता है? क्या यह सूत्र लक्षणपरक है? कारक संख्या है? अथवा अनुवादकपरक है? परन्तु इन तीनों ही अवस्थाओं के ज्ञान को स्मरण करके भी नहीं जाना जा सकता है।
अन्त में, जयराशि भट्ट सांख्य के द्वारा प्रत्यक्ष के लक्षण का खण्डन करते हैं। वह कहते हैं कि जो सांख्य दार्शनिक इन्द्रियों की क्रियाशीलता में उत्पन्न ज्ञान को प्रत्यक्ष स्वीकार करते हैं. परन्तु यह तार्किक नहीं है, क्योंकि यदि इन्द्रियों की वृत्तियों उदाहरणार्थ, कान इत्यादि को प्रत्यक्ष कहा जाता है, तो जो भ्रम आदि होते हैं, उनकी वृत्तियों को भी प्रत्यक्ष कहा जाना चाहिए, परन्तु ऐसा सम्भव नहीं होता है। इसी कारणवश उनके प्रत्यक्ष की परिभाषा को भी संतोषप्रद नहीं समझा जा सकता है। अध्याय के अन्त में जयराशि भट्ट के द्वारा प्रत्यक्ष लक्षण के खण्डन की समीक्षा एवं व्याख्या की गयी है।
अध्याय द्वितीय में जयराशि भट्ट के द्वारा न्याय दार्शनिकों के द्वारा अनुमान प्रमाण की व्याख्या के खण्डन हेतु तर्क दिये गये हैं। न्यायसूत्र में अनुमान की परिभाषा दी गई है कि 'तत्पूर्वक ही अनुमान होता है।' उदाहरणार्थ, रसोईघर में आँख आदि के व्यापार द्वारा धुएँ और आग के मध्य सम्बन्ध की अवधारणा की जाती है। तत्पश्चात् संस्कार, फिर व्याप्ति के स्मरण के बाद हेतु एवं पक्ष के सम्बन्ध से पक्षधर्मता तथा धुएँ के साहचर्य से परामर्श ज्ञान उत्पन्न होता है अर्थात् कहने का तात्पर्य यह है कि प्रत्यक्ष के बाद होने वाले ज्ञान को अनुमान कहा जाता है, परन्तु यहाँ प्रश्न उठता है कि यदि अनुमान का ज्ञान प्रत्यक्ष के ज्ञान के बाद आता है, तो उसे स्वतंत्र प्रमाण स्वीकार करने की आवश्यकता ही क्या है? यदि किसी स्थान पर प्रत्यक्ष का अभाव होगा तो वहाँ अनुमान के अभाव को भी मानना पड़ेगा। उपरोक्त परिभाषा के अनुसार यदि प्रत्यक्ष को कारणरूप माना जाये तो फिर प्रत्यक्ष के अभाव में अनुमान का भी अभाव माना जायेगा। फिर भी यदि कोई यह कहता है कि प्रत्यक्ष के अभाव में अनुमान का अभाव नहीं होगा तब तो फिर जगत में कारण कार्य के सिद्धान्त का खण्डन माना जायेगा और प्रत्येक वस्तु की बिना कारण के उत्पन्न होने की सम्भावना हो जाएगी।
जयराशि भट्ट के अनुसार उपरोक्त व्याख्या के द्वारा अविनाभाव सम्बन्ध को नहीं जाना जा सकता है। अतः अन्य सभी सम्प्रदाय जो व्याप्ति और अनुमान को प्रमाण मानते हैं, उनके द्वारा जयराशि भट्ट को उत्तर दिया जा सकता है।
अध्याय तृतीय में जयराशि भट्ट ने न्याय दार्शनिकों के द्वारा अनुमान को सामान्य लक्षण में होने के कारण, भट्ट मीमांसक के द्वारा उपमान लक्षण को प्रत्यक्षमूलक स्वीकार करने के कारण एवं प्रभाकर मीमांसक के द्वारा उपमान लक्षण को प्रत्यक्ष और स्मृतिमूलक स्वीकार करने के कारण उपमान को स्वतंत्र प्रमाण के रूप में स्वीकार नहीं किया है।
जयराशि भट्ट का मानना है कि उपमान को वैध साधन के रूप में नहीं स्वीकार किया जा सकता है, क्योंकि सादृश्यता प्रत्यक्ष की अनुभूति के बाद उत्पन्न होती है, और यदि दो वस्तुओं के मध्य अंगों की बनावट से सादृश्यता को स्थापित किया जाता है, तो यह प्रश्न उठता है कि ये ज्ञान द्वारा सत्यापित है, अथवा नहीं। यदि जिसे ज्ञान द्वारा सत्यापित किया जायेगा, वह मात्र स्मृति से भिन्न नहीं होगा और यदि ज्ञान द्वारा सत्यापित नहीं है, तो इसे किन्चित भी नहीं जाना जा सकता है, क्योंकि ऐसे तो संसार की सभी वस्तुएँ प्रायः समान ही दर्शित हो जायेंगी। उपमान की प्रक्रिया को ज्ञानेन्द्रियों के द्वारा भी नहीं जाना जा सकता है, क्योंकि यह पुनः स्मृति से भिन्न नहीं होगा। अन्तः यदि दो वस्तुओं में समानता के द्वारा किसी भी ज्ञान के उत्पन्न होने की सम्भावना है, तो ऐसे ज्ञान को उत्पन्न करने के लिए किसी भी वस्तु को देखने की आवश्यकता ही नहीं है, क्योंकि ज्ञान स्वतः ही उत्पादित हो जायेगा।
न्याय दार्शनिकों के अनुसार दो वस्तुओं में समानता उपमान की प्रक्रिया के फलस्वरूप आती है, और इस प्रकार शब्द और अर्थ के मध्य सम्बन्ध का ज्ञान इस प्रक्रिया के फलस्वरूप उत्पन्न होता है। यहाँ जयराशि भट्ट का कहना है कि यदि शब्द और अर्थ के मध्य में सम्बन्ध का ज्ञान निर्धारित है, तो उपमान जैसे अन्य प्रमाण को स्वीकार करने की आवश्यकता ही क्या है? उपमान के अध्याय के अन्त में सभी दार्शनिकों के उपमान सम्बन्धी विचारधारा का विवरण किया गया है।
चतुर्थ अध्याय में जयराशि भट्ट के द्वारा शब्द को प्रमाण के रूप में स्वीकार न करने हेतु तर्क दिये गये हैं। जयराशि भट्ट के अनुसार शब्द को एक प्रमाण के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता है। क्यों? इसका उत्तर देते हुए वह कहते हैं कि न्याय दर्शन में शब्द और अर्थ के मध्य में जो सामयिक सम्बन्ध की स्थापना की जाती है, वह सर्वथा अनुचित है, क्योंकि सांकेतिक शब्द से अर्थज्ञान के काल में अवस्थिति नहीं होती है। शब्द और अर्थ के मध्य में तादात्म्य सम्बन्ध को भी नहीं स्वीकार किया जा सकता है, क्योंकि उनके आकार में भेद का होना पाया जाता है। इसके अतिरिक्त मीमांसकों के द्वारा शब्द और अर्थ के मध्य स्वाभाविक सम्बन्ध को भी नहीं स्वीकार किया जा सकता है, क्योंकि उनकी गति नहीं होती है। कहने का तात्पर्य यह है कि शब्द अर्थ के पास, और अर्थ शब्द के पास नहीं जा सकता है। इसके अतिरिक्त यदि कोई शब्द को प्रत्यक्ष तथा अनुमान से ज्ञात मानता है, तो वह सर्वथा अतार्किक है।
कुछ व्यक्ति आप्तोक्त हेतु में भी शब्द का प्रामाण्य स्वीकार करते हैं, परन्तु यह तार्किक नहीं है, क्योंकि आप्तोक्त में किसी का भी प्रामाण्य नहीं हो सकता है, न कि सत्ता के रूप में और न ही ज्ञान की उत्पत्ति के रूप में। किसी भी ज्ञान के अस्तित्व को साधन के रूप में और ज्ञान के उत्पन्नकर्ता के रूप में नहीं जान सकते हैं। इसी प्रकार मीमांसकों के द्वारा वेद को अपौरुषेय और नित्य माना जाता है, उसका भी तार्किक होना सम्भव नहीं है, क्योंकि नित्य वही है. जिसका आधार हो। अपौरुषेयत्व भी अस्वीकृत है, क्योंकि पुरुष की व्यावृत्ति द्वारा दोषों की व्यावृत्ति मानने पर तो गुणों की व्यावृत्ति भी सम्भव है।
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