भूमिका लिखना कोई सामान्य कार्य नहीं है। क्योंकि इसको लिखते समय व्यक्ति का निष्पक्ष होना तथा निर्मल आलोचक की भांति सोचना बहुत जरूरी है। आलोचक की लेखनी को तब और भी अधिक जिम्मेदार हो जाना चाहिए जब वह स्वयं के ग्रन्थ की आलोचना कर रहा हो। ऐसे में लेखक को संवेदनशील होकर अपने सम-विषम विचारों को समालोचना में उपस्थापित करना चाहिए क्योंकि जब उस पुस्तक को विद्वान् और विचारवान् पाठक पढ़ता है तो वह लेखक और उसकी लिखित पुस्तक का भविष्य तय करता है। इसलिए भूमिका लेखन सहज होते हुए दुरूह कार्य है, जिसको लेखक द्वारा अपने व्यक्तित्व की चिन्ता न करते हुए निष्पक्ष लिखना चाहिए। चूंकि प्रकृत पुस्तक मेरे द्वारा लिखी जा रही है, इसलिए पूरी जिम्मेदारी से लिखना मेरा दायित्व है।
इस पुस्तक में कुल दश संस्कृत के ग्रन्थों में वर्णित गुप्तचर के वैशिष्ट्य की मीमांसा की गई है। जिसमें तत्कालीन पौराणिक ऋषियों के बौद्धिक चिन्तन को भी रेखांकित किया गया है, उनकी व्यापक दृष्टि को दिखाया गया है और यह भी बताया गया है कि तात्कालिक आचार्यों ने कैसे अपनी विशिष्ट शेमुषी का सत्प्रयोग करते हुए भारतीय मनीषा का भव्य निर्देशन कराया है।
पण्डित राहुल सांकृत्यायन ने अपनी लघु पुस्तिका 'मानव का विकास, में लिखा है कि सृष्टि के आदि में जब मानव जीवन अपने शुरूआती काल में था, जब वस्त्रहीन लोग व्यवसाय रहित हो कच्चे मांस आदि का सेवन कर जंगल में आदिवासियों की भांति जीवन जी रहे थे। तब वे अपने समाज का निर्माण कर रहे थे, जिसके लिए समूह में रहते थे। मैं समझता हूँ कि वहीं से शनैः शनैः हमारे मानव सभ्यता का विकास हुआ। कहा जाता है कि आवश्यकता आविष्कार की जननी है जिससे हमारे दुष्कर कार्य सरल होते है। तत्कालीन समय में हमारे भारतीय मनीषियों ने भी अपनी मेधा का सत्प्रयोग करते हुए अनेक आविष्कार किए, कदाचित् तत्कालीन मनुष्यों ने अपनी आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए अनेक स्थानीय आविष्कारों को जन्म दिया। यहाँ तक कि समाज के विनिर्माण तथा विस्तार की योजना में, उसके सम्यक् संचालन और संरक्षण की व्यवस्था में तथा व्यावहारिक ज्ञान के लिए नैतिक सिद्धान्तों का निर्माण भी तत्कालीन समय में किया गया। गुप्तचर व्यवस्था भी उसी में से एक है जो आवश्यकता को देखते हुए बनाई गई थी। जिसका उल्लेख वैदिक ग्रन्थों में प्राप्त होता है।
मनुष्य में गुण-अवगुण समान रूप से रहता है जैसे सुख के साथ दुःख, जीवन के साथ मरण, धूप के साथ छाँव, सन्तोष के साथ असंतोष आदि। नैतिक ग्रन्थों में उक्त है-
आयुः कर्म च वित्तं च विद्या निधनमेव च ।
पञ्चैतान्यपि सृज्यन्ते गर्भस्थस्यैव देहिनः ।।
ऐसा ही कुछ विचार तत्कालीन समय में समाज के मठाधीशों की रही होगी, जिनकी निरन्तर सत्तासीन की चाहत, समाज में कलह को जन्म देती होगी जिसके चलते गुप्तचर जैसे पद का प्रादुर्भाव हुआ होगा।
ये गुप्तचर चंचल चित्तवृत्ति से रहित धीर-गम्भीर और उच्च चिन्तन क्षमता वाले होते थे, इनका कोई निश्चित स्वरूप नहीं होता था। ये देश काल और परिस्थिति के अनुसार अपना स्वरूप बदलते थे। ये अलग-अलग समय में विभिन्न स्थानों पर अपना एक अलग भाव प्रस्तुत करते थे।
इस पुस्तक में आदिकाव्य वाल्मीकि रामायण से अम्बिकादत्त व्यास विरचित शिवराजविजय पर्यन्त सभी ग्रन्थों में वर्णित गुप्तचर के अलग-अलग स्वरूप दिखाई पड़ते है। जो विभिन्न विधाओं से अपने स्वामी सहित सम्पूर्ण प्रजा की रक्षा की जिम्मेदारियाँ निभाते है तथा प्रतिवेशी राजा के दुष्ट योजनाओं का भेदन करते है।
मैं इस भूमिका के माध्यम से प्रकृत ग्रन्थ में आएं हुए गुप्तचरों के भिन्न-भिन्न स्वरूप प्रस्तुत करूंगा, जिनका भव्य और व्यापक निदर्शन सम्बन्धित प्रकरण में दृष्ट होगा। महर्षि वाल्मीकिकृत रामायण में गुप्तचर का प्रयोग राजभवन से लेकर युद्ध विराम तक किया गया है। दोनों ही पक्षों ने अपने अपने पक्ष को मजबूत करने हेतु अनेक लौकिक अलौकिक शक्तियों से युक्त गुप्तचरों का प्रयोग किया है। जहाँ अयोध्याधिपति श्री राम के अनुयायी और परम प्रतापी हनुमान् ने अनेक दिव्य शक्तियों से युक्त हो किष्किन्धा पर्वत से लेकर श्रीलंका से प्रत्यावर्तन तक और पुनः लंका से अयोध्या आने तक प्रत्येक स्थान पर अपनी तेजस्विता का परिचय दिया है और सियावरराम की रक्षा की है तो वहीं लंकाधिपति रावण के भी गुप्तचर कम नहीं है वे भी अपने वेश को बदलने में माहिर है। वे भी अलग-अलग स्वरूपों में राम की निगरानी करते है।
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