तेरहवीं शताब्दी में अपने आविर्भाव से भारतवर्ष के केरल प्रान्त को सनाथित करने वाले श्रीकृष्णबिल्वमंगललीलाशुक मुनि परम वैष्णव थे, जिन्होंने कुल चौबीस अनुष्टुप् छन्दोबद्ध श्लोकों में श्रीभगवच्छरणागति-परक श्रीकृष्णकर्णामृतम् स्वरूप अनुत्तम स्तोत्र को निबद्ध कर वैष्णवों के साथ-साथ सर्वसामान्य जन पर भी महान् उपकार किया है। अर्थबोधन-पूर्वक इस स्तोत्र के पाठक्रम में पाठक इतना अधिक भावविभोर हो उठता है कि मानों लीलाविहारी श्रीकृष्ण का उस समय वह साक्षात् अवलोकन ही कर रहा हो।
नैमिषारण्य-निवासी परम वैष्णव द्वारकादास काठियावावा ने अत्यन्त भावप्रवणता से इस श्रीकृष्णकर्णामृतम् स्तोत्र की हिन्दी व्याख्या करते समय वेदस्वरूप कल्पवृक्ष के पक्व फल-सदृश श्रीमद्भागवत से प्रकृत स्तोत्रों से मिलते-जुलते श्लोकों का अन्वेषण करने के उपरान्त दोनों को ही मिलाकर अपनी सारगर्भित हिन्दी व्याख्या से इसे अलंकृत किया है, जो इसके पाठकों को इन श्लोकों के गूढ़ अर्थों से साक्षात्कार कराने वाला है. इसमें लेशमात्र भी सन्देह नहीं करना चाहिए। इसके साथ ही विद्वान् व्याख्याकार ने पुस्तक के अन्त में सानुवाद श्रीकृष्णशरणापत्ति, गजेन्द्रमोक्ष एवं वेदसाराख्य-गोविन्द स्तोत्र को भी समाहित कर इस अद्भुत ग्रन्थ को समस्त जनों के लिए सर्वथा उपादेय बना दिया है. फलतः श्रीकृष्णकर्णामृतम् का यह अमूल्य संस्करण भगवद्भक्तों के लिए सर्वप्रकारेण वरेण्य हो गया है. यह निःसन्दिग्ध है।
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