भारत देश की महिमा का बखान करने वाले दो महाकाव्यों में से रामायण काव्य लोगों के बीच सबसे अधिक प्रभावशाली और पूजनीय है। यह न केवल भारत में बल्कि एशिया महाद्वीप के कई देशों में, विशेषकर थाईलैंड, कंबोडिया, इंडोनेशिया जैसे दक्षिण पूर्व एशियाई देशों में भी प्रसिद्ध है।
हमारे देश के सभी लोगों के हृदय में भगवान राम और देवी सीता भावनाओं और जीवन के साथ एक होकर विराजमान हैं। यही कारण है कि हम अपने देश के कोने-कोने में भगवान राम, देवी सीता और रामायण के पात्रों के मंदिर पाते हैं।
तमिकनाडु में राम मंदिरों के बारे में एक दुर्लभ दस्तावेज़ श्री. वलयपेट्टै आर. कृष्णन् ने सुंदर ढंग से प्रस्तुत किया है। इस पुस्तक में उल्लिखित सभी राम मंदिरों में जाकर, उन्होंने मंदिर, भगवान के नाम, मूल देवता, उत्सव मूर्ति और कई अन्य ऐतिहासिक जानकारी एकत्र की है और रंगीन चित्रों के साथ पाठकों के सामने प्रस्तुत किया है। यह पुस्तक पढ़ने वाले को मंदिरों में मौजूद रामायण के पत्थर की मूर्तियाँ, लकड़ी की मूर्तियों और चित्रों के बारे में भी जानकारी देगी, जिससे पाठक एक बार उन मंदिरों को अपनी आँखों से देखने और उनका आनंद लेने की इच्छा महसूस करेंगे।
बलैयप्मेट्टै रा. कृष्णत् वे हैं जो खुद को तिरुमुरे, तिरुप्पुगळ् अनुसंधान और मंदिर जीर्णोद्वार कार्यों में पूरी तरह से समर्पित कर रहे हैं। उन्हें संत अरुणगिरिनायर द्वारा रचित तिरुप्पुगळू सहित सभी पुस्तकों को एक पूर्ण संशोधित संस्करण के रूप में प्रकाशित करने का श्रेय दिया जाता है। उन्होंने 'तिरुप्पुगळू सेल्वम ' नामक एक पुस्तक भी लिखी है, जो तिरुप्पुग का एक विश्वकोश है, साथ ही 'चिंदै निरेक्कुम शिव वडिवंगळ्', 'मुदल वणक्कम् मुदलवनुक्के', 'मुत्तमिळ मुरुगतित् उत्तम तौण्डर्ग', 'तिरुप्पुगळ् अडिच्युवट्टिल - तिरुप्पुगळू तलप्पुराणम', 'मुरुगत्तित् अरुपडे वीडगळ्', 'अडि नड्डु गुडि', 'तिरुत्तलंगळित् तल वरलाऊ', 'द ग्रेट टेंपल ऑफ मदुरै मीनाक्षी' सहित 50 से अधिक पुस्तकें लिखी हैं।
उन्होंने शिलालेखों के आधार पर कई तिरुप्पुगळू मंदिरों का शोध किया है। उन्होंने केरल विश्वविद्यालय में मौजूद 14 तिरुप्पुगळू पांडुलिपियों का अध्ययन किया और 'सॅकुन्ड्रपुरम' नामक मंदिर के लिए तिरुप्पुगळ् प्रकाशित किया।
उन्हें 'तिरुप्मुगळू अमुदत्', 'तिरुप्पुगळु मामणि', 'तिरुप्पुगाळू सीर परवुवार', 'तिरुप्पुगळु कला निधि', 'तिरुप्पुगळ् बतुरर्', 'तिरुप्पुगळू इसै मणि', 'तिरुप्पुगळू ज्ञानभानु', 'तिरुप्पुग तल आराब्धि तिलगम', 'मुरुग नजेरी आसात्', 'चैव तमिळू मणि' जैसे खिताबों से सम्मानित किया गया है।
हिंदी अनुवादक के. रामनाथन, हिंदी और तमिळ साहित्य में स्नातकोत्तर एवं साहित्य रत्न की उपाधि प्राप्त कर चुके हैं। गत पैंतीस सालों से भाषा, साक्षात्कार, समन्वय दक्षिण, गवेषणा जैसी साहित्यिक पत्रिकाओं में तमिळू साहित्य की गरिमा पर शोध आलेख लिखा रहे हैं। आपका तुलनात्मक निबंध, आध्यात्मिक नियंध आदि प्रसिद्ध हैं। आप विभिन्न हिंदी संगोष्ठियों में भाग लेकर प्रशस्ति और सम्मान प्राप्त कर चुके हैं। केंद्रीय तमिळू शोध संस्थान, चेत्रई द्वारा आपसे अनूदित तमिळ साहित्य प्रकाशित हैं। आपसे लिखित आलेख पाठ्य-पुस्तकों में भी स्थान पा चुके हैं। संप्रति हिंदी-तमिळू साहित्य के बीच भावनात्मक सेतुबंधन कार्य में अपने को पूर्ण रूप से अर्पित हैं।
भारत देश की महिमा का वर्णन करने वाले दो महान महाकव्य हैं। उनमें से लोगो के बीच सबसे अधिक प्रभावशाली और पूजनीय है रामायण महाकाव्य। भारत ही नहीं बल्कि एशिया महाद्वीव के कई देशों में, विशेषकर थाईलैंड, कंबोडिया, इंडोनेशिया आदि दक्षिण-पूर्वी ऐशियाई देशों में रामायण महाकाव्य अत्यंत प्रसिद्ध है। रामायण महाकाव्य के आधार पर राम नाटक कीर्तन, लघु महाकाव्य, शोध ग्रंथ आदि रचे जाते हैं। इसके अलावा हम तो देखते है कि रामायण से प्रेरित संगोष्ठियों, सम्मेलन, कहानियाँ, व्याख्यन, नृत्य नाटिका के मंचन आदि विभिन्न रूपों में देश भर में आयोजन होते रहते हैं।
रामायण धर्म, कला, काल और सभ्यता की सीमाओं को पार कर एक सार्वभौमिक विश्व विरासत के रूप में है। रामायण की कथा घटनाओं और पात्रों को प्राचीन काल से आज तक मंदिरों, राजमहलों, सार्वजनिक सभागारों आदि में मूर्तियों और चित्रों के रूप में आंकित किया गया है, जिससे वह अमरता प्राप्त कर चुका है। अकाट्य सत्य यह है कि वह महाकाव्य न केवल सभी मनुष्यों के जीवन में गहराई से समा हुआ है बल्कि मिट्टी की सुगंध के साथ पूरी तरह एकाकार हो गया है
रामायण भारत देश की सांस्कृतिक आत्मा है। भगवान श्री राम की गाथा, भक्ति में विश्वास रखते हर भारतीय के जीवन के साथ घुल-मिलकर रहती है।
हमारे देश के समस्त लोगों के मन में भगवान राम और देवी सीता जीवंत एवं साकार रूप से विराजमान हैं। यही कारण है कि हम अपने देश के कोने-कोने में श्री राम, देवी सीता और रामायण के अन्य पात्रों के लिए निर्मित मंदिरों को देखते हैं।
तमिळनाडु में निर्मित राम मंदिरों के बारे में एक दुर्लभ दस्तावेज के रूप में श्री वलैयपट्टी आर. कृष्णन ने एक उत्कृष्ट किताब प्रस्तुत की है। इस पुस्तक में उल्लिखित सभी राम मंदिरों का भ्रमण करते हुए उन्होंने मंदिरों के बारे में, भगवान का नाम, मूलमूर्ति एवं उत्सव मूर्तियों के बारे में तथा अन्य ऐतिहासिक तथ्यों के बारे में विस्तृत जानकारी देने के साथ रंगीन चित्रों को पाठकों की आँखों के सामने प्रस्तुत होने के रूप में रचित किया है। यह किताब पढ़ने वाले पाठकों के मन में इन मंदिरों में स्थापित रामायण से संबंधित पाषाण मूर्तियों, लकड़ी की नक्काशियों और चित्रों को अपनी आँखे से देखने की तीव्र इच्छा प्रेरित करेगी।
तमिळनाडु की आध्यात्मिक एवं ऐतिहासिक शोधों में अत्यंत सहायक बनने के रूप में रचित इस किताब को केंद्रीय शास्त्रीय तमिळ शोध संस्थान हर्षित मन से और विशेष ढंग से प्रकाशित करता है। लेखक वलैयप्पट्टी श्री आर. कृष्णन जी को तमिळ समुदाय की ओर से हार्दिक आभार प्रकट करते हैं। इस किताब के निर्माण में बड़ी जिम्मेदारी सहित कार्य में लगे हमारे संस्थान के कनिष्ठ शोध अधिकारी डॉ. इरा. वेंकटेशन्, हिंदी अनुवादक श्री के. रामनाथन और इस पुस्तक को उत्कृष्ट रूप से डिजाइन करने वाले श्री एम. मुनियासामी जी आदि को भी हम आभार व्यक्त करते हैं।
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