आजसे हजारों वर्ष पूर्व वैदिककालके ऋषिमुनियोंने यह घोषणा कर दो थी कि सारे संसारमें एक ही परम तत्त्व "ना" व्याप्त है। ऋग्वेदमें लिखा है- "यह सब कुछ मा ही है।" (ऋग्वेद ३।१४८१)
यही बात मुण्डकोपनिपद्में भी कही गई है- "यह सब नहा ही है।"
(मुण्डकोपनिषद्)
जीव ब्रह्मसे अलग नहीं है। ज्योंही उसे सत्यका ज्ञान होता है, अपने स्वरूपको पहचान लेता है, त्योंही वह कहता है- "मैं मध्धा हूँ।"
(बृहदारण्यकोपनिषद्)
वास्तवमें ईश्वर एक ही है। लोग उसे चाहे, भिन्न भिन्न नामों से पुकारें। इसीलिए पंडित उसे कहा जाता है, जो सब प्राणियोंमें अपने ही रूप को देखता है। हमारे देशका नाम है. भारत अर्थात् प्रकाश या ज्ञानमें लीन । बास्तवमें यहाँके लोगोंने ज्ञानके मार्गसे अनुष्ठान करके जो संस्कार- सम्पन्नता प्राप्त की, वही भारतीय संम्कृति है। इसकी मूलवृत्ति अन्धकारसे प्रकाश, असत्यसे सत्य और मृत्युसे अमरत्वकी ओर यात्रा है। इसका मूल आधार अध्यात्मवाद है। हमारी संस्कृतिमें समन्वयकी प्रबल भावना है। इसमें त्याग, तप, सत्यान्वेषण पर बल और परोपकार आदि कुछ ऐसे विशिष्ट गुण हैं, जिनके कारण यह विश्वमें आज भी महान बनी हुई है। प्राचीन भारतका वैभव इतना समृद्ध था कि लोग इसे "सोनेकी चिड़ियाँ" के नामसे पुकारते थे। यह बात इस तथ्यको उजागर करतो है कि हमारा देश आत्मिक और सांसारिक सभी दृष्टियोंसे बड़ा संपन्न रहा है। जब विश्व के अन्य प्रदेश जंगली जीवन बिता रहे थे, तब भारतने सत्य और ज्ञान का दिव्य आलोक सर्वत्र प्रसारित करनेका संकल्प लेकर घोषणा की थी-
यह जयघोप केवल कवि कल्पना नहीं। विश्वके विभिन्न भागों और देशोंमें पाये जाने वाले आर्यसंस्कृतिके अवशेष इसके पुष्ट प्रमाण हैं।
भारतपर जितने विदेशी आक्रमण हुए, उतने विश्वके किसी अन्य देशपर नहीं हुए। पर इतिहास साक्षी है कि हमने हिम्मत नहीं हारी। यूनानी, शक, हूण ओर कुषाण आदिका आज हमारे देशमें कहीं नाम भी नहीं है। मुस्लिमकालमें हमारी संस्कृतिपर अनेक कुठाराघात हुए, पर तो भी, सब कुछ झेलते हुए भी. हम डटे रहे. बने रहे। बादमें जब यूरोपकी जातियोंने भारतपर अधिकार कर लिया तो हमने उनके विरुद्ध भी अपना स्वतंत्रता संग्राम पूरे त्याग और बलिदानके साथ चालू रक्खा।
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