लोकनायक, भारतरत्न, युगपुरुष जैसे सैकड़ों उपाधियों से विभूषित जयप्रकाश नारायण से जन-जन परिचित है। इन्होंने भारत की दो महान क्रान्ति (1942 व 1977) के अग्रणी नेता होने के बावजूद आजीवन सत्ता से दूर रहने के संकल्प का पालन किया। जे०पी० भारतीय स्वतंत्रता के पूर्व ही नहीं, उसके बाद भी अपने कार्यों एवं विचारों से निरन्तर जन सामान्य को लाभान्वित किया। कुछ लोगों का मानना है कि जयप्रकाश को राजनीतिक सत्ता का अवसर नहीं मिला, अन्यथा वे भी सत्ता सुख में संलिप्त हो जाते किन्तु यह धारणा बेहद कमजोर और भ्रांति मात्र है। जयप्रकाश को कई ऐसे अवसर प्राप्त हुए, जब वे सत्ता के शीर्ष पर आसीन हो सकते थे।
सन् 1953 की बात है, जवाहरलाल नेहरू समाजवादी विचारधारा के नेताओं को अपने मंत्रिमंडल में शामिल होने का आग्रह किया किन्तु जयप्रकाश ने लोकहित के सन्दर्भ में 14 शर्ते मानने की पेशकश की, जिस पर सहमति न बनीं और जयप्रकाश मंत्रिमण्डल में शामिल नहीं हुए। जयप्रकाश ने अपने लिए पद नहीं लोककल्याणकारी कार्य को महत्व दिया। 1962 में एक बार पुनः अवसर आया, जब नेहरू की चीनी नीति और चीनी आक्रमण से सरकार के विरूद्ध जन असंतोष था। तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ० राधाकृष्णन ने भी तैयारी कर ली थी। जयप्रकाश को नेतृत्व के लिए आग्रह किया गया किन्तु इन्होंने अस्वीकार ही नहीं किया बल्कि नेहरू के समर्थन में स्वयं आगे आये। यही नहीं, 1964 में नेहरू जी की मृत्यु के बाद प्रधानमंत्री पद के लिए जयप्रकाश का नाम सामने आया। लालबहादुर शास्त्री ने भी जयप्रकाश का ही समर्थन किया किन्तु जयप्रकाश ने सत्ता के लिए कोई दिलचस्पी नहीं दिखायी तो लालबहादुर शास्त्री प्रधानमंत्री बने।
इसी क्रम में 1967 में राष्ट्रपति पद के लिए जयप्रकाश का नाम आगे किया गया। डॉ० राममनोहर लोहिया और मीनू मसानी के सुझाव पर अन्य राजनीतिक दलों के साथ कांग्रेस ने भी स्वीकार कर लिया किन्तु जयप्रकाश ने डॉ० जाकिर हुसैन का समर्थन किया। वे अपने लिए पद के इच्छुक कभी नहीं रहते थे बल्कि संसार के समस्त राष्ट्रों में राजसत्ता की अपेक्षा लोकसत्ता पर बल देते थे। महात्मा गांधी के बाद जयप्रकाश नारायण एकमात्र ऐसे व्यक्ति हैं, जो राजसत्ता के शीर्ष पर हो सकते थे किन्तु लोकसत्ता को महत्व देकर राजसत्ता को भ्रष्ट होने से बचाने का सार्थक प्रयास किया। इन्होंने राजनीति से अधिक लोकनीति पर जोर देकर लोकतंत्र को परिपक्व किया। यही नहीं, भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन में अग्रिम पंक्ति के नेताओं में शुमार रहे अर्थात् राष्ट्रवाद की भावनाओं में सराबोर रहे। जयप्रकाश नारायण ने देश की समस्या एवं समाधान को सामाजिकता की परिधि में रखा।
समग्र विकास, सामुदायिक समाज, पंचायती राज, मानवता की परिपक्वता, सहभागी लोकतंत्र आदि के लिए जिस शक्ति एवं साहस से शंख घोष किया, वह न सिर्फ पूरे भारत में गूजा हैं बल्कि वैश्विक स्तर पर अमिट छाप छोड़ गया है। यही कारण है कि नारायण जी जन-जन में शाश्वत प्रेरणा के पुंज माने जाते हैं और देवताओं की श्रेणी में रखे जाते हैं।
जयप्रकाश की सम्पूर्ण क्रान्ति न सिर्फ मौलिक बल्कि दृढ़ आधार भूमि पर सुविचारित क्रान्ति है, जिसका अध्ययन और मनन हमें नये-नये विचारों की ओर ले जाता है। कुछ लोगों का मानना है कि जयप्रकाश के विचार तारतम्य एवं सुसंगति स्वरूप में नहीं है, वे कभी मार्क्सवाद के पक्षधर रहते थे तो कभी राजनीतिक सत्ता की बात करते थे।
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