सिद्धान्त एवं रहस्य की बातें: The Talks of  Principles and  Mystery

सिद्धान्त एवं रहस्य की बातें: The Talks of Principles and Mystery

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Item Code: GPA190
Author: जयदयाल गोयन्दका (Jaya Dayal Goyandka)
Publisher: Gita Press, Gorakhpur
Language: Hindi
ISBN: 8129309343
Pages: 156
Cover: Paperback
Other Details: 8 inch x 5.5 inch
Weight 130 gm

निवेदन

परम श्रद्धेय श्रीजयदयालजी गोयन्दका जिन्होंने गीताप्रेसकी स्थापनाकी थी, पारमार्थिक जगत्की एक महान् विभूति हुए हैं । उनपर भगवान्नेविशेष कृपा करके उन्हें प्रकट होकर स्वेच्छासे चतुर्भुजरूपसे दर्शनदिये ।भगवान् प्रकट हुए तब श्रीगोयन्दकाजीके मनमें फुरणा हुई कि भगवान्नेऐसी महान् कृपा किस हेतु की । उनको प्रेरणा हुई कि भगवान् चाहतेहैं कि मेरी निष्काम भक्तिका प्रचार हो । इस उद्देश्यकी पूर्तिहेतु श्रीगोयन्दकाजी द्वारा बड़ा भारी प्रयास हुआ । उनका कहना था कि पारमार्थिक उन्नतिमें चार चीजें विशेष लाभप्रद हैं-सत्संग, ध्यान, नामजप भजनादि तथा निष्काम सेवा-इसमें भी उनका सबसे ज्यादा जोर सत्संगपर था । इसी उदेश्यसे उन्हें कभी सत्संग कराते थकावट नहीं मालूम देती थी, बल्कि वे बड़े उत्साहसे घंटों-घंटों प्रवचन करते रहते थे । गीताभवन स्वर्गाश्रममें लगभग चार महीने सत्संगका समय रहता था । वहाँका वातावरण बड़ा सात्त्विक है, इसलिये वहाँपर दिये गये प्रवचन पाठकोंको विशेष लाभप्रद होंगे । इस भावसे उनके प्रवचनोंको पुस्तकाकार प्रकाशित करनेका विचार हुआ है । किस स्थलपर, किस दिनाङ्कको उनका यह प्रवचन हुआ यह लेखके नीचे दिया गया है । कुछ छोटे प्रवचन एक ही विषयके होनेसे उन्हें एक ही लेखमें संग्रहीत कर दिया गया है । इन प्रवचनोंमें कई ऐसी प्रेरणात्मक बातें हैं जो मनुष्यको परमार्थ-मार्गमें बहुत तेजीसे अग्रसर करती हैं, उदाहरणके तौरपर बताया जाता है कि 'मैंपन' (अहंता) को पकड़नेमें जितना अभ्यास तथा समय लगा है, उतना समय और अभ्यास इसके छोड़नेमें नहीं लगता । जैसे मकानको बनानेमें बहुत समय लगता है, परन्तु उसके तोड़नेमें बहुत कम समय लगता है । ऐसी बहुत-सी अमूल्य बातें इन प्रवचनोंमें आयी हैं । हमें आशा है कि पाठकगण इन प्रवचनोंको एकाग्र मनसे पढ़ेंगे एवं मनन करेंगे । यह निश्चित कहा जा सकता है कि इनसे हमें विशेष आध्यात्मिक लाभ होगा ।

 

विषय-सूची

 

विषय

पृं.सं

1

स्वाभाविक ध्यानकी महत्ता

1

2

महात्माके संगसे लाभ

3

3

महात्माओंकी कृतज्ञता

4

4

स्वार्थ - त्यागकी महिमा

8

5

नामजपका प्र भाव एवं रहस्य

11

6

निर्भरता तथा निष्कामता

16

7

भगवान्की लीलामें तत्व एवं रहस्य

19

8

निरन्तर ध्यानकी युक्ति

27

9

भरतजीका भगवान् राममें प्रेम

31

10

द्रष्टाके ध्यानसे स्वरूपकी प्राप्ति

36

11

भगवान्का तत्त्व – रहस्य

40

12

सिद्धान्त एवं रहस्यकी बातें

42

13

ध्यानकी विधि

48

14

वास्तविक सिद्धान्त

59

15

सगुण-साकार भगवानका ध्यान

60

16

महात्मा और भगवान्की विशेषता

65

17

ज्ञातृत्वरहित चेतन

69

18

महात्माका अनु भव- ''परमात्मा है''

72

19

श्रद्धासे विशेष लाभ

74

20

अहंता - ममता कैसे मिटे

77

21

भगवान्की लीलाका तत्व – रहस्य

87

22

ज्ञाता, ज्ञान तथा ज्ञेयका विवेचन

92

23

भावका फल

97

24

भगवान्का साकार स्वरूप

99

25

राग - द्वेष मिटानेके उपाय

103

26

प्रकृति नित्य है अथवा सान्त

109

27

भरतजीका रामजीमें प्रेम

112

28

समर्पण

123

29

भाव - सुधारकी आवश्यकता

129

30

सार बातें

131

31

प्रश्रोत्तर

142

32

भगवान्के गुण - प्रभावादिका अनुभव

153

 

 

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