भूमिका
इतिहास का ज्ञान : वह विद्या है जिसके द्वारा किसी देश या स्थान के राजनैतिक, सांस्कृतिक एवं समाजिक हालात और वहां के राजकीय प्रबंध के बारे में जानकारी प्राप्त होती है। यद्यपि इतिहास के ज्ञान का तात्पर्य यही है कि आम लोगों के हालात और हर प्रकार की घटनाओं से शिक्षा एवं अनुभव प्राप्त किया जाये और जो घटनायें अतीत में घटित हुई उनसे भविष्य में मानवीय भलाई की शिक्षा गृहण की जाये लेकिन अतीत से यह नियम बना लिया गया है कि पुराने ज़माने के राजाओं के युद्धों की घटनाओं और उनकी दास्ताने बयान की जाती हैं अतः इतिहास को अधिकतर राजाओं और उनके शासन प्रबंध से सम्बंधित कर दिया गया है या फिर राज्य के श्रेष्ठ व्यक्ति व धनी बुद्धिमान व्यक्ति और विभिन्न वर्गों के बड़े बड़े लोगों जिन्होने अपने जीवन में कोई खास काम अंजाम दिया है, इसका लिहाज़ करते हुए उनको भी इतिहास में शामिल कर लिया गया लेकिन अब इतिहास लेखन कसौटी में खासा परिवर्तन हो गया है और अब दुनिया की हर चीज़ का अलग अलग इतिहास तैयार होने लगा है। मुसलमानों के लिये इतिहास (तारीख) की जानकारी और दिलचस्पी धर्म में दाखिल है। कुरआन शरीफ में प्राचीन पैग़म्बरों, उनके अनुयाइयों और प्राचीन मानव जीवन की एतिहासिक घटनाओं का बहुत खुले हुए एवं विस्तार पूर्ण बयान किये गये हैं ताकि आगे आने वाली नसलें उनसे पूरा पूरा सबक हासिल कर सकें और जिन बुराइयों और जिन बुरे कर्मो के कारण पुरानी कौमों पर अज़ाब आया और वह तबाह व बरबाद कर दी गई कि आज जिनका नामलेवा भी कोई बाकी नहीं रहा। इन बुराइयों से शिक्षा व सबक् लिया जाये और बचा जाये और जिन नेक कामों के करने से आपसी मेल जोल व भाई चारे से कौमों ने तरक्की की है उनको अपना कर दुनिया व स्वर्ग के फायदे हासिल किये जायें अर्थात ऐतिहासिक घटनाओं का ज्ञान धार्मिक बातों के अलावा शिक्षा, नसीहत, चेतना प्राप्त करना है लेकिन मौलाना अस्लम जीराजपुरी के कथनानुसार "ऐतिहासिक पुस्तक पढ़ते समय हमको यह सोच लेना चाहिये कि हम उन लोगों के हालाते ज़िन्दगी पढ़ रहे हैं जो गुज़र चुके हैं। अगर उन्होने कोई गलती की है तो उसके ज़िम्मेदार वही लोग हैं, हम नहीं हैं और उनमें कोई अच्छाई थी तो हमको उसका कोई लाभ नहीं प्राप्त हो सकता जब तक कि हम खुद अपने अन्दर वही विशेषता न पैदा कर लें"। सच्चाई यही है कि दुनिया में जो आदमी जिस कदर यश प्राप्त करना चाहता है, इतिहास उसके लिये उतना ही अनिवार्य है क्योंकि उसको ज़रूरी है किवह उन लोगों के हालात पड़े जो दुनिया में बड़े बड़े कारनामें छोड़ गये हैं। उनकी कोशिश, हिम्मत, वीरता को देखिये और उनकष्टों और तकलीफों को जो उनको अपने मकसद (लक्ष्य) को प्राप्त करने में बरदाश्त करना पड़ी, सामने रखकर खुद अपनी तकलीफों और मुसीबतों में न घबरायें और धैर्य के साथ अपनी कोशिश में लगे रहें। कुछ अरसे से मेरे दिल में यह ख्याल पैदा हो रहा था कि हमारे ज़िला बांदा और यहां के प्राचीन राजाओं एवं नवाबीन बांदा के एतिहासिक हालात पर आधारित कोई किताब नहीं है और अधिकतर लोग उनके कारनामों की कोई जानकारी नहीं रखते हैं, खाली किस्सा कहानियों के तौर पर उनकी बनाई हुईयादगारों को देखकर तज़किरा किया करते हैं, इसलिये कोई ऐसी किताब तैयार की जावे जिसमें सही हालात नवाबीन बांदा और उनके समय के प्रतिष्ठित एवं दीगर महानुभाव के दर्ज हों जिनसे मौजूदा व भविष्य में आने वाली नसलों को पूर्ण जानकारी हासिल हो सके और वह इससे लाभ उठावें और एक यादगार भी कायम रहे परन्तु अपनी अज्ञानता के कारण और ज़्यादातर इस वजह से कि कहीं से कोई हस्तलिखित ज्ञानात्मक संग्रह के मिलने की कोई उम्मीद नहीं थी जो इस इरादे को पूरा करने में मदद देती, इसीलिये इस ख़्याल को दिल ही दिल में लिये रहा लेकिन एक मौके पर इसका ज़िक्र अपने मोहतरम मोकर्रम अलहाज मौलाना मु. सिद्दीक अहमद साहब, प्रबंधक जामिया अरबिया हथौरा ज़िला बांदा से इस ख़्याल को ज़ाहिर किया।
लेखक परिचय
पुस्तक तारीख बुन्देलखण्ड मुस्तनद (विश्वस्त) हालत नवाबीन बाँदा के लेखक स्वर्गीय सय्यद मु. इलियास मगरवी साहब का जन्म सन् 1899 में हुआ था। आपके पिता का नाम मु. इस्हाक मगरबी व माता का नाम अहमदी वेगम था। आप अपने माता पिता की बड़ी संतान थे अतः प्रारम्भिक लालन पालन बहुत शान शौकत से हुआ। शुरू की शिक्षा घर में प्राप्त करने के बाद सन् 1916 ई. में आपने मिडिल की परीक्षा प्रथम श्रेणी में पास की। उर्दू फारसी इम्तिहान मुंशी और हाई स्कूल पास करने के बाद आप जी. आई.सी. बांदा में फारसी और अंग्रेजी पढ़ाने के अध्यापक हो गये। अध्यापिकी छोड़ने के बाद आपने मुख्तारी की परीक्षा पास कर वकालत शुरू की और सामाजिक सेवा में लग गये। आपने बाँदा नगर में अंजुमन इस्लामिया संस्था कायम की जिसके रूल्स रेगुलेशन तय्यार कर बतौर सेक्रेट्री लखनऊ से रजिस्ट्रेशन कराया। आपने और अंजुमन के अध्यक्ष श्री रहीम बख्श मुख्तार साहब ने सन् 1933 ई. में उर्दू मीडियम प्राइमरी पाठशाला की स्थापना की जो बाद में जूनियर हाई स्कूल और सन् 1974 में हाई स्कूल और वर्तमान में इण्टर कालेज के रूप में सेवा प्रदान कर रहा है। वृद्धावस्था के कारण आपने सारे सामाजिक कार्यों से सुबुक-दोश होकर घर में ही अल्लाह की इबादत में समय गुजारते हुए उर्दू में हालात खानदान मगरबी के इतिहास पर अपनी दूसरी पुस्तक लिख डाली। 8 अक्टूबर सन् 1985 ई. को बीमारी के कारण इस दुनिया से रूखसत हो गये। बाँदा में अब उनकी सन्तानों में सिर्फ सय्यद अहमद मगरबी जीवित है जो उन की विरासत को कायम रखे हैं।
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