भूमिका
तेल हमारे जीवन का वह द्रव पदार्थ है जो रसोई से लेकर पूजा तक हर भारतीय घर की आत्मा में बसा है। तड़के से लेकर तिलक तक, दीपक से लेकर दीपावली तक तेल केवल भोजन सेवन में ही नहीं, बल्कि संस्कृति, सेहत और अर्थव्यवस्था का भी प्रतीक है। मानव आहार में वसा या लिपिड का अपना खास महत्व है। तेल का इतिहास सभ्यता जितना पुराना है। कभी यह भोजन में स्वाद, शक्ति और पोषण का प्रतीक रहा, तो कभी रोग और अधिकता का कारण समझा जाता रहा है। आज आधुनिक पोषण विज्ञान यह स्पष्ट कर रहा है कि सभी फैट हानिकारक नहीं होती, बल्कि सही प्रकार और संतुलित मात्रा में ली गई फैट सेहत, ऊर्जा और लंबी आयु के लिये जरूरी है। भारत का तेलों से रिश्ता केवल स्वाद या परंपरा का नहीं, बल्कि भावनाओं और जीवनशैली का भी हिस्सा है। सरसों के तेल की तीखी सुगंध, नारियल तेल की शीतलता या घी का सुनहरा रंग ये सब केवल स्वाद नहीं, हर भारतीय की यादों और संस्कार का हिस्सा रही हैं किन्तु आधुनिकता, फास्ट फूड और वैश्विक व्यापार के युग में यह आत्मीय रिश्ता कहीं न कहीं कमज़ोर पड़ने लगा है। यह पुस्तक उसी आत्मीय बंधन को फिर से जोड़ने का एक प्रयास है। प्रारंभिक अध्याय "तेल, घी और मक्खन, भोजन से पूजा तक" में तेलों की सांस्कृतिक और पारंपरिक भूमिका का विवेचन किया गया है। "भोजन में लिपिड का संक्षिप्त इतिहास" और "सेहत और तेल" अध्याय लिपिड के वैज्ञानिक पहलुओं, उनके पाचन और शरीर में उनकी उपयोगिता पर प्रकाश डालते हैं। "समोसा और जलेबी क्यों नहीं ?" पाठक को मुस्कराते हुये यह सोचने पर विवश करता है कि स्वाद और स्वास्थ्य के बीच संतुलन कैसे बनाया जा सकता है? आगे के अध्यायों में विभिन्न तेलबीजों मूँगफली, सोयाबीन, सूर्यमुखी, जैतून, तिल, अलसी, सरसों, नाइजर और अखाद्य तेल जट्रोपा आदि का परिचय दिया गया है। प्रत्येक तेल बीज के वनस्पति, रासायनिक, पोषणीय और इंडस्ट्रियल विवरण को सरल भाषा में समझाया गया है। ये अध्याय मिलकर भारत की एग्रिकल्चर डायवर्सिटी और वैज्ञानिक दृष्टि का एक सुंदर चित्र सरल भाषा में प्रस्तुत करते हैं। भारतीय तेलबीज केवल पोषण का साधन नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता का प्रतीक भी हैं। भारत जैसे विशाल देश के लिये तेलबीज उत्पादन कृषि से कहीं अधिक खाद्य और आर्थिक सुरक्षा का द्योतक है। इस दिशा में किसानों, वैज्ञानिकों, नीति निर्माताओं और जागरूक उपभोक्ताओं की समान भूमिका है। इस पुस्तक का उद्देश्य परंपरा, विज्ञान और स्थायित्व इन तीनों को एक सूत्र में पिरोना है। ताकि पाठक तेल को केवल स्वाद या तृप्ति का साधन न मानें, बल्कि जीवन, स्वास्थ्य और समृद्धि के प्रतीक के रूप में देखें। कामना है कि यह पुस्तक पाठकों को परंपरा और आधुनिकता के बीच एक सेतु प्रदान करे और हर पाठक तेल की हर बूँद में केवल फैट नहीं, बल्कि विरासत, विज्ञान और आशा का संगम देख सके।
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