भारतीय लोकनाट्यों का उद्भव लगभग तीन हज़ार वर्ष पहले हुआ। विभिन्न धार्मिक और सामाजिक अनुष्ठानों ने नाट्य भावना को जन्म दिया। आरम्भ में ये नाट्यरूप आनुष्ठानिक थे। कालांतर में हुए सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन के साथ इन नाट्यरूपों के स्वरूप में बदलाव आया। यह बदलाव वर्गीय था तथा इनकी दो धाराएँ स्पष्ट परिलक्षित होती है। पहली धारा को राजदरबारों या सामन्तों का संरक्षण मिला। इस धारा की विशेषता थी कि इसने अपने संरक्षक और आश्रयदाताओं की भावनाओं का सम्पोषण किया। ऐसे नाट्यरूपों का केन्द्र भी राजदरबार और तत्कालीन नगर तक सीमित था। इन नाट्यरूपों का जन साधारण से कुछ लेना-देना नहीं था। अतः यह टिकाऊ भी नहीं हो पाया। कालांतर में इन नाट्यरूपों का पतन हो गया। दूसरी नाट्यधारा आनुष्ठानिक आयोजनों और सामाजिक उत्सवों से विकसित हुई थी, जिसका विकास ऐसे लोगों के बीच हुआ जो श्रम और उत्पादन से जुड़े थे। इन नाट्यरूपों ने किसी वर्ग विशेष की अभिरुचि का सम्पोषण नहीं किया, बल्कि यह दर्शकों की अभिरुचि और भावनाओं के अनुकूल विकसित हुआ। इसके प्रस्तोता, प्रयोक्ता और प्रेक्षक थके-हारे श्रमिक थे, जो दिन भर खेतों में श्रम करते थे। इन श्रमिक वर्गों की अपनी आकांक्षाएँ एवं अभिरुचियाँ थी। समय-समय पर ये आकांक्षाएँ एवं अभिरुचियों बदलती रही। बदलाव को इनके द्वारा सृजित कलारूपों ने स्वीकार किया, इसलिए यह परम्परा आज भी जीवन्त है।
यदि हम इन नाट्यरूपों के कथानकों के बारे में विमर्श करें तो आरंभ में यहाँ पौराणिक या धार्मिक कथानकों का मंचन होता था। कालांतर में प्रेम और वीर कथात्मक विषयों का मंचन आरंभ हुआ। प्रेम और वीरता इन श्रमिक वर्गों की दमित भावनाएँ है, जिन्हें अभिव्यक्त करने का अवसर इन्हें सामाजिक ढाँचे ने नहीं दिया। दरअसल मध्यकालीन समाज राजनीतिक रूप से खंडित था। कुछ काल विशेष को छोड़कर बाकी समय में समाज केन्द्रीय सत्ता से अलग-थलग था। राजाओं या सुल्तानों ने सूबे को छोटे-छोटे टुकड़ों में खंडित कर जागीरदार और सामन्तों के अधीन कर दिया था। इन सामन्त और जागीरदारों का सामाजिक सरोकार सिर्फ कर उगाही तक सीमित था। इस व्यवस्था के प्रति कई संगठित और असंगठित विद्रोह भी हुए। इस तरह के विद्रोह निर्ममता से कुचल भी दिए गए, लोकमानस पर इन घटनाओं का गहरा और व्यापक प्रभाव पड़ा। जागीरदारों और सामन्तों के खिलाफ लड़नेवाले समाज के असली नायक हुए। लोक कवियों ने इन नायकों के जीवन चरित्र को लेकर कई संघर्ष गाथाओं की रचना की, जो लोकगाथा के रूप में लोककंठ में प्रवाहमान है।
लोकनाट्यों के प्रयोक्ता भी उसी वर्ग में हुए, जिस वर्ग के ये लोकनायक और लोककवि थे। उन्होंने बड़ी सहजता से इन गाथाओं को मंच पर प्रस्तुत किया। मंच पर जब ये लोकनायक विभिन्न पात्रों के माध्यम से प्रेम और वीरता का इजहार करते हैं तो वहाँ बैठे दर्शकों का मन हर्षित होता है। उन्हें जीवन की दमित भावनाएँ फलित होती नजर आती है। वे आँखों में रात काट लेते है। जब कोई पात्र मंच पर तिरस्कृत होता है या विवशता में तड़पता है, तो उन्हें समानुभूति होती है और यही अनुभूति कला को दीर्घायु बनाती है।
प्रस्तुत पुस्तक में लोकनाट्यों को कुछ हद तक इन्हीं अर्थों में समझने की कोशिश की गई है। 1996 में पटना विश्वविद्यालय में पी-एच.डी. की उपाधि हेतु प्रो. सुरेन्द्र स्निग्ध के मार्गदर्शन में पूर्वांचल भारत के नाट्यरूपों पर शोध-प्रबंध प्रस्तुत किया था। तब से ही योजना थी, विहार के पारम्परिक नाट्यरूपों को लेकर पुस्तक लिखने की। लेकिन दस वर्ष लग गए। इस दौरान बिहार के पारम्परिक नाट्यरूपों पर शोध आलेख लिखता रहा, जो नटरंग और रंगप्रसंग में प्रकाशित हुए। वैसे तो 1992 से 1997 तक पटना से प्रकाशित होने वाले हिन्दी दैनिक नवभारत टाइम्स और हिन्दुस्तान में भी पारम्परिक नाट्यरूपों प्रस्तुत पुस्तक में लोकनाट्यों को कुछ हद तक इन्हीं अर्थों में समझने की कोशिश की गई है। 1996 में पटना विश्वविद्यालय में पी-एच.डी. की उपाधि हेतु प्रो. सुरेन्द्र स्निग्ध के मार्गदर्शन में पूर्वांचल भारत के नाट्यरूपों पर शोध-प्रबंध प्रस्तुत किया था। तब से ही योजना थी, विहार के पारम्परिक नाट्यरूपों को लेकर पुस्तक लिखने की। लेकिन दस वर्ष लग गए। इस दौरान बिहार के पारम्परिक नाट्यरूपों पर शोध आलेख लिखता रहा, जो नटरंग और रंगप्रसंग में प्रकाशित हुए। वैसे तो 1992 से 1997 तक पटना से प्रकाशित होने वाले हिन्दी दैनिक नवभारत टाइम्स और हिन्दुस्तान में भी पारम्परिक नाट्यरूपों से सम्बन्धित कई आलेख प्रकाशित हुए। 1997 में दिल्ली आया और संगीत नाटक अकादेमी से जुड़ा। वर्ष 2002-03 में अकादेमी द्वारा पूर्वोत्तर भारत में पारम्परिक नाट्य महोत्सव का आयोजन किया गया। यह महोत्सव सिक्किम सहित पूर्वोत्तर भारत के सात राज्यों (असम, अरुणाचल प्रदेश, मिज़ोरम, मणिपुर, मेघालय, नागालैंड तथा त्रिपुरा) में श्रृंखलाबद्ध आयोजित किए गए थे। दो चरणों में यह महोत्सव लगभग तीन महीने तक चला। इस महोत्सव में लगभग 26 पारम्परिक नाट्यरूपों को प्रस्तुत किया गया था। बिहार से नटुआ नाच शामिल था। इस महोत्सव की सबसे बड़ी विशेषता थी प्रदर्शन के बाद आयोजित होने वाली संगोष्ठी, जिसमें विद्वतापूर्ण व्याख्यान के साथ कलाकार प्रदर्शन भी करते थे। मैं तीन महीने इन कलाकारों के साथ रहा। भारत की विशाल लोकरंग परम्परा को देखा, समझा। एक और बात का मैं ईमानदारी से उल्लेख करना चाहूँगा, वह है संगीत नाटक अकादेमी के सचिव श्री जयंत कस्तुआर के बारे में।
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