प्रस्तावना
लेखन मेरे लिए कल्पना और अनुभूतियों का प्रकटीकरण है। जागृत सुप्त, चेतन अचेतन, स्वप्न या प्रकट में जो अनुभव होता है या जिससे साक्षातकार होता है, वह जो छाप मन-मस्तिष्क में छोड़ जाता है वही इन शब्दों के पहाड़ की पृष्ठभूमि तैयार करता है। को बचपन से ही मन आकाश और उसमें दिखने वाले ग्रह, नक्षत्रों की ओर अनायास आकृष्ट रहता था। उस समय हर बच्चे का आकाश बहुत बड़ा होता था विशेषकर सूर्यास्त के बाद इतने बड़े आकाश में ताकने के लिए बहुत कुछ होता था। चारों ओर क्षितिज देख पाना सबके लिए संभव था पर अब महानगरों क्या, नगरों में भी पूरा आकाश बच्चों के हिस्से में नहीं हैं। हर जगह कंक्रीट के जंगल उग जाए हैं। उस समय कभी-कभी तो खुले, विस्तृत आकाश में दिखने बाली चकाचौंध सब बच्चों में सामूहिक रूप से भय भी उत्पन्न कर देती थी। कुछ समय बाद जब अन्तरिक्ष में मानव ने प्रवेश किया और चन्द्रमा पर अपने कदम रखे तो इन विषयों में उत्सुकता और बढ़ गई। उस समय पुस्तकालय और संग्रहालय ही ज्ञान वर्धन के आधार होते थे। अधिकतर समय उन्हीं स्थानों पर कटने लगा। जितना-जितना सम्बन्धित विषयों की गहराई में जाते उतना-उतना ज्ञान तो मिलता ही, आकर्षण भी बढता जाता। उसी खोजबीन में दूसरे ग्रहों की जानकारी, पुच्छल तारे, उड़न-तश्तरी आदि, कैसे ये आते हैं और क्यों आते हैं, यह सब जानने का दायरा बढता गया। विशेषकर, जब 1969 में अपोलो-11 के यात्रियों द्वारा लाये गये चन्द्रमा के पत्थर को प्रदर्शनी में देखा तो मन में उत्सुकता और बढ़ गयी। इससे ही एक अलग लोक का जन्म मन-ही-मन में हो गया। अचेतन में वह जिज्ञासा दस-पन्द्रह वर्षों तक मानस पटल पर रही और फिर जब समय ने स्वच्छन्दता सन्मुख ला दी तो वह मन की कल्पना शब्दों का सहारा ले मूर्त रूप ले बैठी। यह मेरा दूसरा उपन्यास है। मेरे परिवार का भी इसे लिखने में जो अकथनीय और अप्रकाशित, अनमोल योगदान रहा और लेखन उपरान्त, पठन-पाठन द्वारा जो दिशा और समर्थन मिला उसके लिए मैं परिवार के सभी सदस्यों का ऋणी रहूँगा। पठन उपरान्त यदि पाठक को लगे कि वह बिना थके एक लम्बी यात्रा, चाहे वह दूरी भौतिक हो या समय की, सम्पन्न कर आया है तो इस को में अपनी सफलता समझेगा।
लेखक परिचय
नई दिल्ली में जन्म और शिक्षा। वपचन में ही फुटबॉल से प्रेम और क्रकेट से लगाव। वेंकटेश्वर कॉलेज से स्नातक । स्नातकोत्तर से पूर्व ही जीवन यापन हेतु भारत सरकार के विभिन्न मंत्रालयों से सम्बद्ध । शिक्षा के दौरान ही आकाश्वाणी में अस्थाई उद्घोषक और विभिन्न वार्ताओं, प्रश्नोत्तरी के कार्यक्रमों का प्रस्तुतीकरण। गद्य व पद्य लेखन तथा अनुवाद में रुचि। रूसी और जापानी भाषा का अध्ययन। यूरोप के कुछ देशों और जापान में इच्छानुरूप वास। उपन्यास 'तू या मैं' प्रकाशित और कहानी संग्रह 'छाया' शीघ्र प्रकाशय।
पुस्तक परिचय
अरे, मेरे लिए कोई और इन्तजाम नहीं कर सकता, तो कम-से-कम, खुश तो हो जा कि मैं तुझसे मिलने आ गया। मुस्करा कर मेरी तरफ देख तो, मुझसे तू कोई बात भी नहीं कर रहा है। जब से मैं इस कमरे में तेरे पास आया हूँ तब से तू बस, ऐसे ही बैठा है। अरे! मुझे दिखा तो सही कि ये जगह कैसी है? यहां पर कौन-कौन लोग हैं? यहां तू क्या करता है? तेरे घर में सब कैसे हैं? कुछ बताएगा भी या मैं जाऊँ? तब से केवल अजय ही बोले जा रहा था, अशोक तो लगातार मौन था। 'जाऊँ' शब्द सुनते ही अशोक को न जाने क्या हुआ, वह, एकदम से खडा होकर अजय से लिपट गया।
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